एक कदम पीछे

समलैंगिकों, किन्नरों और मुख्यधारा से अलग किसी भी सेक्शुअल प्राथमिकता वाले लोगों को लेकर सामाजिक बराबरी का नजरिया संसार के किसी भी देश, किसी भी सभ्यता में नहीं है। लेकिन उन्हें दंडनीय अपराधी मानने की धारणा अगर किसी बड़े लोकतांत्रिक समाज में आज भी जमी हुई है तो वह अपना भारत ही है। देश की सबसे ऊंची अदालत ने साधु-संतों और विभिन्न धार्मिक संगठनों की याचिका पर सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें ऐसे लोगों को इज्जत से जीने का अधिकार दिया गया था। ध्यान रहे कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में कोई नया हक मांगने वाली याचिका को स्वीकृति देने जैसी बात नहीं थी।

नाज फाउंडेशन द्वारा दायर उस याचिका में समलैंगिकता को दंडनीय न मानने की गुजारिश करते हुए सिर्फ ऐसे लोगों को सम्मान के साथ जीने देने का अधिकार मांगा गया था, जो भारतीय संविधान ने देश के हर नागरिक को पहले ही दे रखा है। अगर कोई व्यक्ति अपनी मां के पेट से स्त्री या पुरुष जननांगों के बगैर पैदा हुआ है, तो एक सिपाही को यह हक कहां से मिल जाता है कि दफा 377 की धौंस दिखाकर उसके पैसे छीन ले, जबर्दस्ती उसके साथ हमबिस्तरी करे और यह सब लगातार किए जाने के बाद एतराज जताने पर मारपीट कर हवालात में ठूंस दे? यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं है। पिछले साल निर्भया कांड के बाद दिल्ली के जिन लोगों में आपबीती सुनाने की हिम्मत पैदा हुई, उन्हीं में से एक ने अपनी यह कहानी अखबारों को बताई, जिसे सुनकर इंसान तो क्या पत्थर का भी कलेजा पिघल सकता था।

आईपीसी की धारा 377 में दर्ज यह 'अप्राकृतिक यौनाचार' भी विचित्र चीज है। दो महीने की बच्ची के साथ जानलेवा बलात्कार को भी शायद 'प्राकृतिक' मानकर इसके तहत नहीं लाया जाता। लेकिन दो वयस्क व्यक्ति अगर अपनी मर्जी से साथ-साथ रहते हैं और किसी बंद कमरे में आपसी संबंध बनाते हैं- यहां तक कि कोई उन पर सिर्फ ऐसे संबंध का आरोप लगा देता है और कहीं से एक-दो गवाह पकड़कर अदालत को इसका यकीन दिला देता है- तो उन्हें 'अप्राकृतिक यौनाचार' के जुर्म में दस साल की कैद और जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना बिल्कुल वाजिब है कि सरकार जटिल सामाजिक प्रश्नों पर फैसले के लिए एक पक्ष बनकर अदालत में खड़ी हो जाती है, लेकिन उन पर कानून बनाने के लिए संसद में कोई पहल नहीं करती।

लेकिन भारत सरकार और भारतीय राजनीति की सीमाएं तो पहले से ही जगजाहिर हैं। पिछले दो दशकों में समाज ही नहीं, खुद राजनीति की विकृतियां दूर करने की पहलकदमियां भी अदालत की तरफ से ही हुई हैं। यह ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट अपने स्तर पर आईपीसी की धारा 377 में खुद कोई बदलाव नहीं कर सकता, लेकिन समलैंगिकता को 'पश्चिमी प्रभाव से आई मानसिक विकृति' बताने वाली पोंगा समझ की आलोचना करते हुए संसद से यह 152 साल पुराना औपनिवेशिक कानून बदलने की सलाह तो दे ही सकता था।

 

- साभारः नवभारत टाइम्स