रियायत की राजनीति से हटना होगा कांग्रेस को

एक तरफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से जूझती और दूसरी तरफ बिहार में करारी हार झेलने के बाद, कांग्रेस एक नाज़ुक दौर से गुज़र रही है. इसी माहौल के बीच पार्टी ने अपनी स्थापना के 125 वर्ष भी पूरे किये और अपना 83वां महाधिवेशन दिल्ली में आयोजित किया. भ्रष्टाचार के मामलों पर विपक्ष की घेराबंदी, बिहार में चुनावी पराजय, राहुल गांधी से जुड़े कथित विकिलीक्स खुलासे, कुछ अन्य राज्यों में  आने  वाले विधानसभा चुनाव की तय्यारी और बढ़ती महंगाई समेत कई मुद्दों पर इस अवसर पर चर्चा हुई.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वीकार किया कि पार्टी के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं और कई मामलों पर आत्मचिंतन की आवश्यकता है. उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों को एक तरह फटकार लगाते हुए कहा कि वे पार्टी कार्यकर्ताओं की अनदेखी न करें और कहा कि बिहार चुनाव के नतीजे ये दिखाते हैं कि पार्टी को निचले स्तर पर काम करने की ज़रूरत है. हालांकि देखा जाए तो इस समय विश्वसनीयता के सब से बड़े संकट से जूझने के बावजूद, ये महाधिवेशन हिंदू कट्टरपंथ और भ्रष्टाचार पर सफाई का मंच मात्र बनकर रह गया.

बिहार का उदाहरण लिया जाए तो इतना तय है कि विकास से बड़ा कोई आकर्षण जनता के लिए नहीं है. इतने  साल भारत पर राज करने के बाद कांग्रेस पार्टी को ये समझना चाहिए कि लोक लुभावनी स्कीमो के बजाय आज का वोट बैंक ठोस काम को तवज्जो दे रहा है. आने वाले समय में देखना ये होगा कि कांग्रेस सामाजिक  सुधार से जुड़ी योजनाओं को ही बढ़ावा देता रहेगा या फिर 1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधार के पथ पर आगे जाते हुए कुछ और नए परिवर्तन लाएगा.

कांग्रेस को ये समझना होगा कि महज़ गांधी नाम से, कट्टर समाजवाद या नरसिम्हा राव के समय से पहले चलने वाली आदर्शवादी नीतियों से उसका भला नहीं होने वाला. जिन नारों से पार्टी शायद 1980 तक जनता को लुभाती आई थी, उन से 2014 में होने वाले चुनाव में फायदा नहीं होने वाला. नए ज़माने में जहां देश की एक बड़ी जनसँख्या युवा है, कोई भी राजनैतिक पार्टी सिर्फ खरे प्रगतिशील अजेंडे पर विजयी हो सकती है.

भारत के गरीबों की चर्चा तो हर समय होती है पर प्रश्न ये है कि कांग्रेस पार्टी जिस ने 1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत में सब से अधिक शासन किया है, वो आज तक भारत में भूख की समस्या का निराकरण क्यूँ नहीं कर सकी. सन 2009 की बढ़िया जीत का श्रेय पार्टी वाले सब से अधिक 'मनरेगा' स्कीम और किसानो पर ऋण संबंधी छूट को देते हैं. शायद ही कोई इस बात का ज़िक्र करता है कि देश 8 प्रतिशत विकास की दर पर गुज़रे 5 साल से दौड़ रहा था. यदि छूट और अन्य सुविधाएं देने से ही चुनाव जीते जा सकते, तो कांग्रेस बिहार में हाल में इतनी शर्मनाक हार का सामना ना करती. पिछले लोक सभा चुनावों में भी पार्टी अति पिछड़े राज्य जैसे बिहार, उडीसा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में बहुत कम सीटों पर जीत हासिल कर सकी. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस का हाल किसी से छुपा नहीं है. कांग्रेस को अधिकांश वोट विकसित राज्यों जैसे हरयाणा, दिल्ली, पंजाब, आंध्र प्रदेश, तमिल नाडू, महाराष्ट्र, केरल आदि से मिले जहां की पढी लिखी, अपेक्षाकृत समृद्ध जनता ने आर्थिक विकास का सम्मान करते हुए कांग्रेस गठबंधन को जीत दिलाई.

जैसे जैसे देश विकास के रथ पर और आगे बढेगा, वैसे वैसे गरीबो को मिलने वाले उदार दान से पार्टियों की किस्मत लिखना और मुश्किल होता जाएगा.

हाल के परिणामों से मतदाताओं के व्यवहारों में आ रहे बदलावों को जांचे तो यही लगता है कि नीतीश कुमार जैसे विकास की राजनीति करने वाले मुख्यमंत्रियों को पुरस्कृत किया जाता रहेगा और विकास दे पाने में असफल नेताओं और पार्टियों को हार का सामना करना पड़ेगा. ये घटनाक्रम वाकई में देश और यहाँ की गरीब जनता के लिए एक बहुत अच्छी बात  है।

हमारे राजनातिक नारों और अजेन्डो को अब आर्थिक विकास के आस पास केन्द्रित होना पडेगा. धर्म निरपेक्षता, हिन्दू कट्टरवाद जैसे नारों को छोड़ आगे के चुनाव में अगर कांग्रेस 9 प्रतिशत विकास दर को अपना केंद्रीय मुद्दा बनाए तो उसके लिये अच्छा होगा. सन 1991 में पुराने समाजवाद के अंत के बाद भारत में एक नयी विकास की कहानी ने जन्म लिया, जिसके नतीजतन आज भारत सबसे तेज़ी से विकास करने वाले देशों की लिस्ट में शुमार होता है. राजनैतिक व्यवस्था में भी हमें इसी धारा को केंद्र बिंदु बना कर चलना पडेगा.

- स्निग्धा द्विवेदी