मूल्यवृद्धि की मार

पेट्रोल के मूल्यों में अप्रत्याशित वृद्धि से आम जनता का तिलमिलाना भी स्वाभाविक है और विपक्षी दलों का सरकार पर हमलावर होना भी, क्योंकि इस फैसले के पीछे पर्याप्त उचित आधार नहीं नजर आते। यह किसी आघात से कम नहीं कि पेट्रोल के मूल्यों में संभावित वृद्धि की खबरों के बीच पेट्रोलियम मंत्री यह कहकर देश को दिलासा देते हैं कि मुद्रास्फीति में तेजी के रुख को देखते हुए ऐसा करना मुश्किल होगा, लेकिन इस बयान की स्याही सूखने के साथ ही पेट्रोल महंगा हो जाता है। आम जनता इसलिए भी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है, क्योंकि सरकार का यह तर्क पूरी तरह सही नहीं कि तेल कंपनियों के घाटे के कारण पेट्रोल के मूल्य बढ़ाने पड़े।

सच्चाई यह है कि तेल कंपनियों को पेट्रोल बिक्री से कोई घाटा नहीं हो रहा था। पेट्रोल तो इसलिए महंगा किया गया है ताकि सरकार अन्य क्षेत्रों में हो रहे अपने घाटे को पूरा कर सके। पेट्रोल के दामों में वृद्धि एक ऐसे समय की गई है जब खाद्य महंगाई 12 फीसदी के आंकड़े को पार कर गई है। यह हास्यास्पद है कि सरकार एक ओर तो बढ़ती मुद्रास्फीति पर चिंता जाहिर करती है और दूसरी ओर पेट्रोल के दाम बढ़ाकर यह सुनिश्चित करती है कि मुद्रास्फीति का बढ़ना जारी रहे। खाद्य महंगाई को गंभीर समस्या बताने वाले वित्तमंत्री ने जिस तरह यह माना कि पेट्रोल के दाम बढ़ने से मुद्रास्फीति पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा उससे यह साफ हो जाता है कि केंद्र सरकार के पास न तो महंगाई रोकने का कोई उपाय है और न ही पेट्रोल के मूल्यों में वृद्धि को थामने का।

यदि वह किसी मामले में सक्षम है तो तरह-तरह के बहाने बनाने और खोखले आश्वासन देने में। खाद्य महंगाई के पीछे ताजा कारण यह गिनाया गया है कि ऐसा त्योहारों के कारण हुआ। सच्चाई यह है कि खाद्य पदार्थो के उत्पादन में वृद्धि और आपूर्ति व्यवस्था में सुधार के बिना महंगाई थमने वाली नहीं है, लेकिन सरकार इस ओर ध्यान ही नहीं दे पा रही है। स्थिति इसलिए अधिक दयनीय और निराशाजनक है, क्योंकि सरकार भविष्य के बारे में सामान्य अनुमान तक लगा पाने में नाकाम रहती है।

केंद्र सरकार ने अपने आर्थिक कुप्रबंधन और अदूरदर्शिता से खुद के साथ-साथ देश को भी एक दुष्चक्र में फंसा लिया है। फिलहाल ऐसे कोई संकेत नहीं नजर आते कि केंद्र सरकार के नीति-नियंता देश को इस दुष्चक्र से बाहर निकाल सकेंगे। भले ही केंद्र सरकार आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों से लैस हो, लेकिन वह जिस ढंग से काम कर रही है उससे उसकी विश्वसनीयता खोती जा रही है और यही कारण है कि अब तो उसके घटक दल भी उसकी सार्वजनिक रूप से आलोचना करने के लिए विवश हैं। इस पर आश्चर्य नहीं कि पेट्रोल के मूल्यों में वृद्धि से खफा तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने संप्रग का साथ छोड़ने तक के संकेत दे दिए। यदि इन संकेतों के पीछे अपने वोट बैंक को संतुष्ट करने का इरादा नहीं है तो इसका मतलब है कि केंद्र सरकार एक गंभीर खतरे की ओर बढ़ रही है। यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और नेशनल कांफ्रेंस ने भी पेट्रोल मूल्यवृद्धि पर चिंता जताई है और विपक्षी दलों ने तो केंद्र सरकार को नाकारा ही घोषित कर दिया। चूंकि अपनी ऐसी स्थिति के लिए केंद्र सरकार खुद जिम्मेदार है इसलिए वह सहानुभूति की पात्र नहीं बन सकती, लेकिन यदि संप्रग के घटक दल और विपक्षी दल पेट्रोल मूल्यवृद्धि से वास्तव में दुखी हैं तो उन्हें ऐसे उपाय भी सुझाने चाहिए जिससे आम जनता को महंगाई की मार से बचाया जा सके।

- साभार: दैनिक जागरण