क्या है हमारी गरीबी का कारण ?

हम गरीब क्यों हैं? हमारा मुल्क विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां दुनिया के ज्यादातर गरीब भी बसते हैं। लिहाजा कोई भी व्यक्ति यही सोचेगा कि यह सवाल ही हर राजनीतिक बहस के केंद्र में होगा। वह यह भी सोच सकता है कि हम इस तरह के विषयों पर गहन व दिलचस्प बहस-परिचर्चाएं करते होंगे कि गरीबी के क्या कारण हैं ? अमीर बनने के लिए देश के तौर पर हम क्या कर सकते हैं ? तथा दुनिया के बाकी हिस्सों में इस दिशा में क्या कारगर कदम उठाए जा रहे हैं ? आखिरकार भारत के तकरीबन सवा अरब लोगों की सर्वाधिक उत्कट उम्मीदें व आकांक्षाएं किसी न किसी तरह से अपने अमीर होने से ही तो जुड़ी हुई हैं।

लेकिन हमारी राजनीति के बारे में आश्चर्यजनक बात यह है कि हम राजनीतिक मंच पर शायद ही कभी इन मसलों पर बहस करते हैं। आजादी के बाद से लेकर अबतक इन 65 वर्षों में हमने इस तरह के दीगर मुद्दों पर ही भावनात्मक और कदाचित हिंसक बहसें की हैं कि क्या हिंदी को राष्ट्रभाषा होना चाहिए ? क्या पिछड़ी जातियों के लिए और ज्यादा आरक्षण होना चाहिए? क्या तमिलों या सिखों के लिए अलग राज्य हों, या अयोध्या की उस निर्धारित जगह पर मंदिर हो या मस्जिद? या फिर क्या केंद्र सरकार के पास राज्य सरकारों को भंग करने का अधिकार है?

लेकिन ‘हम गरीब क्यों हैं ?’ इस बेहद अहम सवाल (जिस पर हरेक भारतीय का भविष्य निर्भर है) पर कभी कोई जीवंत, ज्ञानवर्द्धक बहस नहीं होती। इसकी बजाए हमें इस सवाल पर एक चिपचिपी, लिसलिसी सी एक-राय नजर आती है, जिसमें आजादी के बाद से अबतक कोई बदलाव नहीं आया है और वह ये कि हम गरीब इसलिए हैं, क्योंकि देशी व विदेशी मुनाफाखोर कंपनियां आज आदमी को लूट रही हैं, और हम अमीर हो सकते हैं यदि सरकार अमीरों से धन लेकर इसे बाकी लोगों के बीच बांट दे।

इस आमराय के दोनों तर्क बोगस हैं। यदि आप मुकेश अंबानी से लेकर अजीम प्रेमजी और कुमार मंगलम बिड़ला तक देश के दस सबसे अमीर व्यक्तियों का धन लेकर बाकी लोगों में बांटे तो हरेक व्यक्ति को एक बार 5041 रुपए मिलेंगे। लिहाजा धन का ज्यादा समतापूर्वक किसी को ज्यादा अमीर नहीं बनाएगा। इसके अलावा समृद्धि की राह पर बढ़ रहा दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, चीन जैसा हरेक देश अमीर इसलिए हो रहा है क्योंकि वहां मुनाफा कमाने वाली निजी कंपनियां प्रतिस्पर्धी बाजारों में अच्छा भुगतान दिलाने वाली नौकरियां सृजित कर रहीं हैं। दुनिया का एक भी देश निजी कारोबारों को पनपने व आगे बढ़ने की गुंजाइश प्रदान किए बगैर गरीबी से उबरने का स्थायी रास्ता नहीं तलाश पाया। न क्यूबा ऐसा कर पाया न उत्तर कोरिया और न ही म्यांमार।

कारोबारों व कंपनियों के प्रति भारतीय अविश्वास के पीछे कुछ हद तक यह ऐतिहासिक तथ्य भी जिम्मेदार है कि भारत को एक निजी कंपनी द्वारा उपनिवेश बना लिया गया था। लेकिन इस अविश्वास का सिर्फ यही एक कारण नहीं है। ऐसे देश में जहां पर ज्यादातर लोग गरीब हैं, तमाम राजनैतिक दलों को असंतोष की भावना को भड़काना मुफीद लगता है। संभवतः इसी वजह से नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने भारतीयों को ‘तार्किक’ कहा, लेकिन जब कुछ बुनियादी सवालों की बात आती है तो हमारी तार्किकता भाप बनकर उड़ जाती है।

विडंबना यह है कि हमारे पड़ोसी देश चीन में अपने यहां की गरीबी के कारणों के लेकर ज्यादा जानदार बहसें होती रही हैं, भले ही वहां कम्युनिस्ट डिक्टेटरशिप रही हो। पूर्व पार्टी अध्यक्ष डेंग जियाओपिंग ने सत्तर व अस्सी के दशक में अपनी ऐसी टिप्पणियों के साथ इन गहन बहसों की अगुआई की कि ‘अमीर हो जाना वैभवशाली है’ और ‘इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बिल्ली का रंग कैसा है, बशर्ते यह चूहों को पकड़ती रहे’। उनका यह कहना था कि जब तक चीन अमीर हो रहा है, व्यवस्था को इस बात की परवाह नहीं है कि आर्थिक नीतियां समाजवादी हैं या नहीं।

हम कभी किसी भारतीय नेता के मुख से इस तरह की बात सुनने की कल्पना नहीं कर सकते कि ‘बिल्ली चूहों को पकड़ती रहे, इसके रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता’। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय व्यवहारिक समाधानों की बजाए सैद्धांतिक शुचिता के प्रति अपने जबरदस्त लगाव के चलते ठीक इसके उलट बोल सकते हैं। उनका कहना होगा- ‘जब बिल्ली काली है, इस बात को कोई फर्क नही पड़ता कि यह चूहे पकड़े या नहीं।’ ऐसा तब है जबकि हमारा पिछले 65 वर्षों का अनुभव दर्शाता है कि गरीबी तभी तेजी से घटती है, जब देश तीव्र गति से विकास करता है और देश तभी तेजी से आगे बढ़ता है, जब कारोबारों को ज्यादा मुक्त बनाया जाता है।

लिहाजा अपनी गरीबी के बारे में चिपचिपी, लिसलिसी आमराय का दायरा बढता जा रहा है और इसकी हमें विकास थमने के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। इस साल भारत की विकास दर 5.5 फीसदी रह सकती है, जबकि कुछ साल पहले तक हम 9 फीसदी से ज्यादा के दर से विकास कर रहे थे। यह दशक की सबसे निम्न विकास दर है। केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम का भी यही कहना है कि हमें इससे उबरने में कुछ साल लग सकते हैं। इस गिरावट का एक ही कारण है। यूपीए सरकार के मन में यह डर बना हुआ है कि कारोबारी जगत को ज्यादा उदार बनाना अलोकप्रिय हो सकता है।

दुखद यह है कि गरीबी को लेकर बनी राष्ट्रीय आमराय को हवा देने वाले राजनीतिक खिलाड़ियों की तादाद बढ़ रही है। पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों को हराने के बाद ममता बनर्जी वामपंथियों से भी ज्यादा वामपंथी हो गई हैं। इसके अलावा परिदृश्य में उभरा अरविंद केजरीवाल का नवीनतम राजनीतिक दल एक और धर्मयोद्धा की तरह चित्रित करता है। जबतक कोई इस दूषित राष्ट्रीय आमराय को खलबलाने का राजनीतिक साहस नहीं दिखाएगा, देश 5 फीसदी विकास दर और 30 फीसदी गरीबी के साथ ही जकड़ा रहेगा।

- साभारः दैनिक भास्कर
टोनी जोसेफ (लेखक, बिजनेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और मीडिया सर्विस फर्म के चेयरमैन हैं)