कमाने की आजादी दो

एक तरफ करोड़ों रु. खर्च कर सरकार विभिन्न रोजगार योजनाएँ चला रही है। जबकि दूसरी ओर ऐसे कई कानून हैं, जो आम आदमी को ईमानदारी से कमाने से रोकती हैं। रिक्शा चलाने वालों से संबंधित कानून इसका जीता जागता उदाहरण है।

दिल्ली में रिक्शा चलाना सरल नहीं है। दिल्ली नगर निगम साइकिल रिक्शा बायलॉज के प्रावधानों तथा सड़क जाम के मद्देनजर रिक्शा चलाने वालों पर तमाम बंदिशें लादी गयीं हैं। जैसे रिक्शा चलाने के लिए लाइसेंस अनिवार्य है। रिक्शा का मालिक ही रिक्शा चालक हो सकता है। एक व्यक्ति एक से अधिक रिक्शा नहीं रख सकता। अर्थात् किराये का रिक्शा चलाना अवैध है।

एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली में लगभग 7 लाख रिक्शा चलाए जा रहे हैं। जबकि लाइसेंस की अधिकतम सीमा 99 हजार ही निर्धारित की गयी है। अर्थात् शेष 6 लाख रिक्शा अवैध हैं। इन अवैध रिक्शा चालकों को नगर निगम अधिकारियों तथा पुलिस को महीना देना पड़ता है। इस तरह से रिक्शा वालों पर पुलिस की स्थायी धौंस कायम हो गयी है। जिसका नमूना आए दिन देखने को मिलता है।

गरीबों की सरकार गरीबों पर भारी है। अब दिल्ली नगर निगम ने ट्रैफिक पुलिस के सहयोग से दिल्ली को तीन क्षेत्रों में बाँट दिया है- मुक्त, निषिद्ध और सीमित क्षेत्र। जहाँ मुक्त क्षेत्र में रिक्शा चलाने की स्वतंत्रता है, वहीं निषिध्द क्षेत्र में बिलकुल मनाही है और सीमित क्षेत्र में रिक्शा चलाने के लिए कुछ शुल्क अदा करना पड़ता है।

निषिध्द और सीमित क्षेत्र बनाने के पीछे नीति निर्माताओं की यह मान्यता है कि रिक्शा से सड़क जाम की समस्या पैदा होती है। लेकिन जिन सड़कों पर रिक्शा नहीं चलते क्या वहाँ जाम नहीं लगता? ऐसे में क्या कार और बसों की संख्या भी सीमित कर दी जाए? अगर कार अथवा अन्य वाहनों की मुक्त आवाजाही के लिए साधारण आदमी के कर से फ्लाइओवर बनाए जा सकते हैं, तो फिर रिक्शा चालकों के लिए भी अलग व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती है? ज्ञात हो कि राजकोष का अधिकांश हिस्सा परोक्ष कर से जमा होता है, जिसमें साधारण गरीब लोगों का अधिक योगदान होता है। इसके साथ ही अगर रिक्शा चालक सस्ती और आरामदायक सेवा दे सकते हैं और लोग रिक्शा की सवारी करना चाहते हैं, तो फिर कहीं भी रिक्शा चलाने पर प्रतिबंध क्यों?

रिक्शा पर गैर जरूरी प्रतिबंध लगाने वाले कानूनों को देखते हुए कहा जा सकता हैं कि देश में अनावश्यक कानूनों के द्वारा जबरदस्ती बेरोजगारी बना कर रखी गयी है। इस देश में मेहनती और अक्लमंद लोगों की कमी नहीं है। लेकिन पग-पग पर सरकार उसका रास्ता रोके खड़ी है। मेहनतकश लोगों को कमाने से रोकने वाले ऐसे कानूनों को बदलना होगा। उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए रिक्शा प्रबंधन में सुधार हेतु निम्नलिखित कदम उठाये जाने चाहिए:

अनुभव से सीख लेते हुए जरूरी है कि अब सरकार प्रतिबंध की नीति छोड़े और प्रोत्साहन की नीति अपनाए, रिक्शा क्षेत्र में भी। और सभी नियम कानूनों को जीविका स्वतंत्रता जाँच की कसौटी पर कस कर देखे कि कहीं इससे किसी गरीब के कमाने का हक तो नहीं मारा जा रहा है। तभी अगले 20 वर्षों में हम विकसित देशों की कतार में खड़े होने का सपना साकार कर पाएंगे।

- संजय सलाज

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