फ्रीडम, फ्री बेसिक्स और फेसबुक

फेसबुक के जन्मदाता मार्क जुकरबर्ग को वर्तमान पीढ़ी का महानतम व्यक्ति कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। महानता के मामले में निर्विवाद रूप से वह अपने समकक्षों से आगे, बहुत आगे निकल गए हैं। महज एक दशक पूर्व शुरू किए गए फेसबुक नामक अपने स्टार्टअप की बदौलत 31 वर्ष की अत्यंत कम आयु में खरबपति बनने का कारनामा करने और उससे भी बड़ी दरियादिली दिखाते हुए अपनी 99 फीसदी संपत्ति (लगभग 3 लाख करोड़ रूपए) दान देने की घोषणा कर उन्होंने दुनियाभर में प्रशंसा हासिल की है। अपनी दानवीरता के अलावा इन दिनों वह एक अन्य कारण से भी दुनियाभर की मीडिया, विशेषकर भारतीय मीडिया में चर्चा का विषय बने हुए हैं। वह कारण है इंटरनेट की सुविधा से वंचित लोगों को मुफ्त में इंटरनेट की सेवा उपलब्ध कराने की उनकी योजना। इस योजना को उन्होंने नाम दिया है फ्रीबेसिक्स।

फ्रीबेसिक्स अर्थात डाटापैक सब्सक्राईब किए बगैर फेसबुक के माध्यम से कुछ वेबसाइटों तक निशुल्क पहुंच। फ्रीबेसिक्स की इस योजना को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने टीवी व समाचार पत्रों के माध्यम से आक्रामक प्रचार प्रसार भी किया। हालांकि प्रचार प्रसार की इस खर्चीली प्रक्रिया ने कुछ लोगों को सशंकित कर दिया वे फ्रीबेसिक्स योजना को शंका की निगाह से देखने लगे। इसे इंटरनेट डॉट ऑर्ग का परिवर्तित स्वरूप घोषित कर दिया गया। और एकबार फिर नेट न्यूट्रैलिटी की बहस छिड़ गई। सबने इसे इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की आजादी सीमित करने का प्रयास, नए स्टार्ट अप्स के लिए समस्या, इंटरनेट प्रदान करने के खर्च को दूसरे तरीके से वसूलने की साजिश व न जाने क्या क्या साबित कर दिया। लेकिन इन सबके बीच अंजाने डर से ग्रसित आलोचकों ने इंटरनेट की सुविधा से वंचित लोगों को इंटरनेट सेवा से जोड़ने के नेक प्रयास की अनदेखी कर दी।

दरअसल, सशंकित बुद्धिजीवियों को व्यापार के उस मॉडल को समझने में परेशानी हो रही है जिसमें उपभोक्ताओं के लिए निशुल्क उपलब्ध सेवा भी भारी लाभ दिलाती है। पीपीपी मॉडल के तहत निर्मित फाइव स्टार जनसुविधा परिसर इसका एक उदाहरण हैं। इस मॉडल के तहत सर्वसुविधा संपन्न जनसुविधा परिसर उपयोगकर्ताओं के लिए तो निशुल्क होते हैं लेकिन इसके संचालक परिसर पर लगे विज्ञापनों के माध्यम से लाभ अर्जित करते हैं। इस प्रकार कोई सेवा फ्री हो तो इसका तात्पर्य यह नहीं है कि सेवा प्रदाता उससे लाभ नहीं कमाएगा। हां, जुकरबर्ग का बिजनेस मॉडल क्या है इसके बारे में तो उन्हें ही पता होगा लेकिन यह कुछ कुछ वैसे ही हो सकता है जैसे कि फेसबुक इस्तेमाल करने के ऐवज में मार्क को प्रत्यक्ष तौर पर उपभोक्ताओं से कुछ भी प्राप्त नहीं होता बल्कि उसपर आने वाले प्रमोशंस व विज्ञापनों के जरिए ही होता है।

उदाहरण के माध्यम से समझने की जरूरत

मुफ्त सेवा प्रदान करने पर आने वाला खर्च कौन वहन करेगा?

हमारे आसपास ऐसे तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं जहां फ्री बेसिक्स जैसी व्यवस्था न केवल पहले से मौजूद है बल्कि लोग उसका लाभ भी उठा रहे हैं। जैसे कि समाचार पत्रों का सब्सक्रिप्शन अथवा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया फंक्शनिंग । समाचार पत्रों की प्रिंटिंग की लागत पाठकों द्वारा चुकाए जाने वाली कीमत से अधिक होती है किंतु विज्ञापन के माध्यम से लागत व कीमत के अंतर को मिटाया जाता है। अधिकांश सेटेलाइट चैनल फ्री टू एयर होते हैं जबकि उनके प्रसारण व कार्यक्रमों के निर्माण पर बड़ी धनराशि खर्च होती है फिर भी केबल ऑपरेटर अथवा डीटीएस सेवा प्रदाता को कुछ शुल्क अदा कर हम उन्हें देखते हैं। चैनलों के प्रसारण व कार्यक्रम निर्माण की लागत भी विज्ञापनों से आती है। फेसबुक अपने प्लेटफार्म से सर्फ किए जा सकने वाली वेबसाइटों से शुल्क वसूल कर सकता है। वेबसाइटों को सर्फ करने की सीमितता गलत है।

किसी भी वेबसाइट को सर्फ करने की आजादी होनी चाहिए

डीटीएच या सेट टॉप के माध्यम से टीवी चैनल देखने वाले पैकेज के हिसाब से उसमें शामिल चैनल देख पाते हैं। पैकेज के बाहर के चैनल को देखने के लिए अलग से पैसे चुकाने पड़ते हैं। मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियां भी तमाम स्कीम्स चलाती हैं जिसमें उनकी कंपनी के नंबर पर फ्री में बात करना, लोकल एसएमएस अथवा अपनी कंपनी के नंबर पर फ्री एसएमएस भेजना आदि शामिल होता है। इससे किसी को कोई समस्या नहीं होती। प्रतिस्पर्धा युक्त खुले बाजार में दूसरी कंपनियों के पास भी तमाम ऑफर्स होते हैं। संभव है कि कोई और प्लेटफार्म किसी अन्य सेवा प्रदाता के साथ टाइअप कर पहले प्लेटफार्म पर नामौजूद वेबसाइट्स सर्फ करने की सुविधा प्रदान करें। न से सीमित सुविधा हर हाल में बेहतर होती है।

फ्रीबेसिक्स प्लेटफार्म किसी वेबसाइट के डाऊनलोड होने की स्पीड घटा या बढ़ा सकती है

यह कोई नई बात नहीं। इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों के पास पहले से ही टूजी, थ्रीजी, फोरजी जैसे कई विकल्प मौजूद हैं। अलग अलग स्पीड के लिए अलग अलग पैसे चुकाकर वेबसाइट डाऊनलोड होने की स्पीड परिवर्तित की जा सकती है। अलग अलग वेबसाइट/ऐप्प के लिए अलग अलग कीमत चुकाना महंगा पड़ेगा। अलग अलग कीमत चुकाना सस्ता पड़ेगा। वर्ल्ड वाइड वेब पर मौजूद सभी वेबसाइट्स को सर्फ करने के लिए हाई ब्रैंडविथ की जरूरत नहीं पड़ती व वीडियो अथवा यू ट्यूब अथवा बड़ी फाइलों को अटैच करने की सुविधा वाले एप्लिकेशंस को ही हाई ब्रैंडविथ की जरूरत होती है। सामान्य जरूरतों के लिए उपभोक्ता का काम बेसिक स्पीड वाले नेट कनेक्शन से ही हो जाएगा जिसके लिए उसे थ्रीजी अथवा फोरजी की तुलना में काफी कम पैसा चुकाना पड़ेगा। यूट्यूब अथवा वीडियो देखने के लिए अलग से कम कीमत का टैरिफ लेकर अच्छी सेवा प्राप्त किया जाना संभव हो सकेगा। कुल मिलाकर यह एकमुश्त हाई स्पीड कनेक्शन से सस्ता पड़ेगा।

नए व छोटे स्टार्ट अप्स के लिए बड़ी समस्या होगी

इंटरनेट से वंचित लोगों तक स्टार्टअप्स की पहुंच अब भी नहीं है। बेसिक सेवा से जुड़ने वाले उपभोक्ता को यदि एक बार इंटरनेट से होने वाले नफा-नुकसान, सुविधा-असुविधा का पता लग जाए तो वह अपनी जरूरत के हिसाब से कम एमबी का नेट पैक लेकर फ्रीबेसिक्स के पैक के बाहर के ऐप्प व साइट्स को भी एक्सेस कर सकेगा।

 

- अविनाश चंद्र,  आजादी.मी