ब्रिटिश कालीन भारत में मुक्त व्यापार

मुक्त व्यापार ने अपना प्रभाव ब्रिटिश कालीन भारत में भी छोड़ा। अंग्रेजों ने प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने से पूर्व तक, सन 1914 तक, मुक्त बाजार-अर्थव्यवस्था को संचालित किया। सन 1914 में भारत, ब्रिटिश कपड़े की अपेक्षा, ब्रिटिश कपड़ा बनाने वाली मशीनों का सबसे बड़ा आयातक देश था। इस प्रकार भारत इंग्लैंड से आयातित मशीनों से उत्पादन कर कपड़े का बड़ा निर्माता बन रहा था।

सन 1919 की ब्रिटिश व्यापार आयुक्त की रिपोर्ट के अनुसार बहुत सी ऐसी बड़ी व्यापारिक संस्थाओं ने, जो ब्रिटेन में बनी अभियांत्रिक वस्तुओं का लेन-देन करती थी, ने भारत में स्वयं का उत्पादन प्रारंभ कर दिया और ब्रिटेन में बनी वस्तुओं की भारत में बिक्री करने के लिए आपत्ति दर्ज की।
उन्होंने ब्रिटेन में बनी वस्तुओं का लेन-देन बंद कर दिया लेकिन अब उन्होंने स्थानीय बाजार स्थापित कर लिए, स्थानीय उत्पादन प्रारंभ कर दिया और स्वयं की बनाई वस्तुओं को अपेक्षाकृत ज्यादा बेचना प्रारंभ कर दिया।

आधुनिक भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था में मुक्त व्यापार भारत को विश्व-स्तरीय उत्पादन केंद्र बनने के अवसरों को बढ़ाएगा। यह प्रवृत्ति अपना प्रभाव पहले ही छोड़ चुकी है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय निर्माता/उत्पादक सबसे बड़े बाजारों के समीप सबसे सस्ते उत्पादक केंद्रों की तलाश करते हैं। विशालकाय खिलौने एवं खिलाड़ियों के जूते बनाने वाली कंपनियां, डिजायन करने एवं विपणन करने वाले छोटे कार्यलय, अमेरिका एवं यूरोप में संचालित करती हैं लेकिन अपना सारा उत्पादन सूदूर पूर्वी देशों में अनुबंध के आधार पर कराती हैं। प्रकाशक संपादन एवं सुधार का कार्य घरों पर कराते हैं तथा सघन मेहनत वाले कार्य (टाइप सेटिंग एवं मुद्रण) अनुबंध के आधार पर ताइवान व सिंगापुर में कराते हैं। भारतीय बाजार एक बड़ा बाजार है। भारत विश्व की एक उत्पादन शक्ति बन सकता है। लेकिन इन सबके लिए उसे मुक्त व्यापार की परिस्थितियां पैदा करने तथा ढांचागत निर्माण में निवेश की आवश्यकता है।

अपने तर्कों को सिद्ध करने के लिए आइए लौंड्री का उदाहरण देखते हैं। विकसित देशों के प्रत्येक शहर में लौंड्री मिलती है। एक लौंड्री में काफी संख्या में बड़ी-बड़ी कपड़े धोने एवं सुखाने की मशीनें लगी होती हैं। लोग अपने गंदे कपड़े लेकर वहां जाते हैं, मशीनों में सिक्के डालते हैं और बिना फालतू समय बेकार किए जल्दी ही साफ एवं सूखे कपड़े लेकर वापस घर आ जाते हैं।
हालांकि इतनी सारी कंपनियों के होने के कारण, घरेलू कपड़े धोने की मशीन के भारतीय बाजार में संतृप्ति आ चुकी है, फिर भी ये बड़ी मशीनें (लौंड्री में प्रयुक्त होने वाली) भारत में नहीं बनायी जातीं। लौंड्री की बजाए भारतीय शहरों में धोबियों का चलन हैं। यदि मुक्त व्यापार की अवस्था में पुरानी वस्तुओं (सेकंड हैंड) के भी मुक्त व्यापार की व्यवस्था हो तो भारत में भी इन लौंड्री मशीनों की भरमार हो सकती है और हमारे अधिकांश धोबी निजी बैंकों से ऋण लेकर इन मशीनों को खरीद व संचालित कर सकते हैं। भारी वर्षा या नमी वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग कपड़े सुखाने वाली मशीनों को पसंद करेंगे एवं शीघ्र ही इन वस्तुओं के लिए एक बाजार तैयार हो जाएगा। न केवल हमारे धोबी आधुनिक युग के साथ चलेंगे वरन बहुत जल्द इन वस्तुओं का स्थानीय स्तर पर निर्माण/उत्पादन प्रारंभ हो जाएगा। वर्तमान में मुक्त व्यापार की अनुपस्थिति में इनका स्थानीय उत्पादन खतरे से खाली नहीं है। अभी बाजार अनिश्चित है और विज्ञापन बहुत महंगा है। यदि व्यापारियों को उत्पादकों/निर्माताओं के लिए बाजार तैयार करने की अनुमति दे दी जाय तो पूरे भारतवर्ष में फैक्टरियों की एकदम से बाढ़ आ जाएगी।

निश्चित रूप से हमें सुदृढ़ ढांचे की आवश्यकता है। कोई भी अपनी फैक्ट्री ऐसी जगह नहीं लगाना चाहेगा जहां कि न सड़कें हों और न बिजली हो और न ही समर्थ बंदरगाह, हवाई अड्डे और रेलवे सुविधा हो। बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां भारत में मौजूद सस्ते श्रम की वजह से यहां अपनी उत्पादन इकाइयां लगाना चाहती हैं परंतु हमारा वर्तमान ढांचा उन्हें पलायन पर मजबूर कर देगा। ढांचागत सुधार के लिए बड़े स्तर पर निजीकरण तथा सार्वजनिक चीजों जैसे- सड़क, कानून व्यवस्था आदि में सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता है। अच्छी पुलिस, फास्ट ट्रैक कोर्ट, अच्छी सड़कें तथा बिजली मुहैया कराने वाले निजी उपक्रम पूरे विश्व को भारत में आकर उत्पादन करने के लिए आकर्षित करेंगे।

हमें विश्व स्तरीय निर्माता देश बनने के लिए आयात पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता नहीं है। 'स्वदेशी' आर्थिक रूप से आत्महत्या करना है। हमें मुक्त व्यापार एवं सदृढ़ मूलभूत ढांचे की आवश्यकता है।

- सौविक चक्रवर्ती द्वारा लिखित, कौशल किशोर द्वारा अनुवादित व सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा वर्ष 2006 में प्रकाशित 'उदारवादः राज, समाज और बाजार का नया पाठ' से साभार