अनाज खरीद का औचित्य (भाग एक)

-    हमारी खाद्य नीति ने निजी क्षेत्र को बाजार से बाहर कर दिया। सरकार अनाज की सबसे बड़ी भंडारणकर्ता बन गई और अनाज सड़ता रहा

अपने देश के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह महान है और महान हैं इसकी परंपराएं। पर इन सबसे ज्यादा महान हैं सरकार की नीतियां जो एक बार बन गई तो बदस्तूर जारी रहती हैं। फिर चाहे उनकी जरूरत हो या न हो। हर साल उन नीतियों पर अरबों रूपए लुटाए जाते हैं। बरसों पुरानी ऐसी ही नीति है – खाद्यान्न की खुली खरीद। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) आधारित यह नीति 1950 में तब लागू की गई थी जब देश भुखमरी झेल रहा था और हम आयात पर निर्भर थे। तब सरकार ने किसानों को गेंहूं, चावल आदि की पैदावार के लिए प्रोत्साहन दिया। एमएसपी पर सरकार ने खुद खरीदारी कर राशन की दुकानों के जरिए रियायती दरों पर जनता को खाद्यान्न उपलब्ध कराया। तब यह नीति ठीक थी, पर अब जब खुद संसदीय समिति और कई आयोग स नीति को बदलने की सिफारिश कर चुके हैं, इस पर हर साल लगभग 80 हजार करोड़ रुपये बर्बाद कर दिए जाते हैं।

तीन वर्ष पहले एक संसदीय समिति ने इस नीति के साथ-साथ एफसीआइ की उपयोगिता पर भी सवाल उठाते हुए उसे खत्म करने की सिफारिश की थी। समिति ने पाया था कि एफसीआइ के पास अधिकारियों व कर्मचारियों की लंबी फौज तो है, पर काम नहीं है। समिति के सदस्यों ने देखा कि एक तरफ तो सरकारी व किराये पर लिए गए गोदाम पिछले सालों के गेहूं (अधिकांशतः सड़े हुए) से ही अटे पड़े हैं, दूसरी ओर सरकार व्यर्थ में हर साल खरीद पर खरीद करती जा रही है। आज हालात और बदतर हैं। सरकार गेंहू व चावल आदि को तो बढ़ावा दे रही है, पर दाल व तिलहन को नहीं। नतीजा यह है कि अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अच्छी गुणवत्ता वाली रबी की फसल हमें मिल नहीं पाती और निर्यात की भरपूर संभावनाओं के बावजूद सारा खाद्यान्न सड़कर या तो चौथाई दामों में शराब कंपनियों को देना पड़ता है या फिर पशुओं के चारे के रूप में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका जैसे देश बेहद कम दामों में ले लेते हैं। दाल व तिलहन के मामले में हम आज भी आयातक ही हैं।

सरकार ने इस साल 4.4 करोड़ टन गेंहू खरीदने का फैसला किया है, जो पिछले साल की 3.8 करोड़ टन की रिकॉर्ड खरीद से भी ज्यादा है। करीब 9.2 करोड़ टन गेंहू की अनुमानित पैदावार का आधा हिस्सा खरीदकर सरकार न केवल 60 हजार करोड़ रुपये की विशाल राशि बर्बाद करेगी, बल्कि बाजार में पर्याप्त आपूर्ति की राह अवरूद्ध कर कीमत बेलगाम कर देगी। इतना ऊंचा खरीद लक्ष्य रखने का औचित्य समझ से बाहर इसलिए भी है, क्योंकि सरकारी गोदाम पहले से ही भरे पड़े हैं। गोदामों में फिलहाल 6.6 करोड़ टन अनाज जमा है जो बफर स्टॉक के लिए निर्धारित 2.1 करोड़ टन क्षमता से तीन गुना से भी ज्यादा है। सरकार की सकल भंडारण क्षमता 7.15 करोड़ टन है, जबकि कुल स्टॉक करीब 11 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। यानी चार करोड़ टन अनाज खुले में सड़ेगा। सरकार की इस नीति से आम जनता को क्या फायदा है, समझ से परे है। हां बड़े किसानों को इससे फायदा जरूर है। किसानों को तो सरकार ने इतनी सुविधाएं, छूट, रियायतें व सब्सिडी दे रखी हैं, जितनी दुनिया के किसी भी मुल्क में नहीं है।

जारी है...

 

- कपिल अग्रवाल (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

सभारः दैनिक जागरण