खाद्य बिल बढ़ा सकता है आर्थिक भार

कैबिनेट ने खाद्य सुरक्षा बिल को रविवार को स्वीकृति दी, लेकिन भारतीय जनसाधारण को सस्ते भोजन की गारंटी देने वाले इस बिल पर मुहर लगना फिलहाल दूर की कौड़ी लगता है। फिर भी यह बिल  अभी से ही उन अर्थशास्त्रियों को भयभीत कर रहा है, जो इसे खास तौर पर इस समय सरकार पर एक बड़े आर्थिक भार के रूप में देखते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि कैबिनेट ने इस बिल को हरी झंडी अगले साल की शुरूआत में पांच राज्यों में होने वाले चुनावों के मद्देनज़र दिखाई। भारतीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक विधायिका को विचार करने हेतु ज्यादा वक्त देने के लिए एक असाधारण कदम उठाते हुए, संसद सत्र सोमवार को और तीन दिनों तक बढ़ा दिया गया, जो अगले हफ्ते की शुरुआत में खत्म होगा।

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि इसके बावजूद खाद्य सुरक्षा बिल इस सत्र के अंत तक कदाचित पारित नहीं हो पाएगा, क्योंकि संसद का ध्यान विवादास्पद भ्रष्टाचार-विरोधी बिल पर बने रहने की संभावना है। प्रस्तुत किए जाने के बाद, खाद्य बिल को इसके आगे विचार-विमर्श के लिए स्थायी समिति में भेजे जाने की संभावना है, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें औसतन हफ्तों लगते हैं।

एक बार अगर यह वोटिंग स्तर तक पहुंच गया, सभी दलों द्वारा इसका समर्थन करने की उम्मीद है। गौरतलब है कि इस बिल के पारित होने के पश्चात ग्रामीण जनसंख्या के 75 फीसदी हिस्से और शहर के आधे लोगों को सब्सिडाइज्ड दामों पर अनाज उपलब्ध कराया जाएगा।

“कोई भी राजनैतिक दल गरीबों के हित में उठाए कदमों की खुलेआम आलोचना करने की स्थिति में नहीं है,” नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसर चिंतामणी महापात्र ने कहा। लेकिन विश्लेषकों ने ये कहते हुए इस बिल की निंदा की है कि यह आर्थिक विकास को प्रोत्साहित नहीं करेगा, उल्टा सरकार पर वित्तीय भार बढ़ा देगा। “वो उपाय जो आर्थिक नीतियों के मद्देनज़र किए जाने चाहिए वो राजनैतिक गणनाओं के आधार पर किए जा रहे हैं,” श्री महापात्र ने कहा।

आर्थिक और पूंजी बाज़ार के मोर्चे पर भारत इस साल कई बुरी खबरों के चलते लड़खड़ाया। देश के आर्थिक विकास के 31 मार्च तक 7 फीसदी या उससे कम रहने का अनुमान लगाया गया है, जिसके पीछे कई दफा की गई ब्याज़ दर बढ़ोतरी, सरकार द्वारा सुधारों में कमी और इसके साथ-साथ यूरोपियन वित्तीय संकट आघात का हाथ रहा। भारत के मानदंड शेयर बाज़ार सूचकांक को इस साल 24 फीसदी घाटा उठाना पड़ा और रूपया डॉलर के मुकाबले करीब 20 फीसदी कमज़ोर पड़ा।

31 मार्च तक के लिए भारत के राजस्व घाटे के सकल घरेलू उत्पाद का 5.5 फीसदी रहने का अनुमान है, जो अन्य एशियाई देशों से ज्यादा है और भारत के आधिकारिक लक्ष्य 4.6 फीसदी से ऊपर है। अर्थशास्त्री कहते हैं कि भारत लंबे समय तक इतना ज्यादा राजस्व घाटा वहन नहीं कर सकता।

“खाद्य सुरक्षा बिल के तहत प्रस्तावित खर्च से राजस्व घाटा और ज्यादा ही बढ़ेगा,” सिंगापुर की सुरक्षा फर्म सीएलएसए एशिया-पेसिफिक के वरिष्ठ अर्थशास्त्री राजीव मलिक ने कहा। “मुझे यह बात कहते हुए संकोच हो रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसे प्रशिक्षित अर्थशास्त्री अपनी आंखों के सामने कैसे इन सब गैरजिम्मेदाराना कदमों को स्वीकृति दे सकते हैं,” श्री मलिक ने कहा।

खाद्य सुरक्षा बिल की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए, भारत को सालाना 60 से 61 मिलियन टन अनाज की आवश्यकता है, जिससे इस योजना के अंतर्गत वांछनीय लोगों का भरण पोषण किया जा सके, जबकि 55 मिलियन टन से ज्यादा की दरकार उसे राज्य द्वारा चलाए जाने वाले कार्यक्रमों के लिए है।

खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को अमली जामा पहनाए जाने वाले पहले साल में 949.73 बिलियन रूपए (18.05 बिलियन डॉलर) खर्चे का अनुमान है, जो फिलहाल खर्च किए जाने वाले 673 बिलियन रूपए से कहीं ज्यादा है। सरकार को अगले कुछ सालों में कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए 1.1 ट्रिलियन रूपए निवेश करने की आवश्यकता है।

“यह एक बड़ी चुनौती है। देश को भारी मात्रा में अनाज पैदा करने की ज़िम्मेदारी उठानी होगी,” शुरुआत में इस बिल का विरोध करने वाले भारत के कृषि मंत्री शरद पवार ने रविवार को कैबिनेट में बिल पास हो जाने के बाद टीवी चैनलों को कहा।

साभार: इंडिया रियल टाइम