कहां गए वो नारे???

विगत दिनों छत्तीसगढ़ में वोटिंग के साथ दिल्ली सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की शुरूआत हो गयी है। चुनावों की तिथियों की घोषणा होने के साथ ही विभिन्न राजनैतिक दलों के भावी व घोषित प्रत्याशियों द्वारा मतदाताओं के घर घर जाकर चुनावी कैंपेनिंग की प्रक्रिया एकबार फिर से दोहरायी जाने लगी है। हालांकि कुछ वर्षों पूर्व तक चुनावी चकल्लस का महत्वपूर्ण हिस्सा रहने वाले पार्टियों के ‘नारे’ कहीं गुम से हो गए हैं। नारों की गुम होती परंपरा पर आजादी पर पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदर्शित एक लेख पुनः प्रकाशित की जा रही हैः
 
अभी पांच विधानसभाओं के चुनाव हुए लेकिन एक भी नारा ऐसा नहीं सुनाई दिया जो याद रह जाए जनता को रोमांचित कर दे। लगा कि चुनावों में वह मजा नहीं रहा। बिना नारों का चुनाव भी क्या चुनाव हुआ भला। चुनावों में नारों का महत्व अपरंपार है। बिना नारे के तो चुनाव ऐसे बेमजा लगता है जैसे बिना नमक की सब्जी। असल में चुनाव में नारे ही माहौल बनाते हैं। नारे ही पार्टियों के चुनाव अभियान में दम और कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम करते हैं। कभी–कभी तो नारे ही चुनाव जीता भी देते हैं जैसे गरीबी हटाओं का नारा था। इसलिए हर पार्टी एक ऐसा नारा अपने लिए चाहती है जिससे वह वोटरों का दिल जीत सके। एक समय ऐसा था चुनाव आते ही बस्ती के हर मोहल्ले में गूंजने लगते थे। ये नारे पार्टी की रीति, नीति और लक्ष्य और मुद्दों को थोड़े से शब्दों में ऐसे समेट देते थे कि लगता था कि गागर में सागर भर दिया। जेब पर लगा पार्टी का 'बिल्ला', जुबां पर नारों की मिठास और लड़कों की टोलियां संबंधित पार्टी के पक्ष में चुनावी माहौल तैयार करने मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। 
भारत की चुनावी राजनीति में नारों ने हमेशा ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। आजादी के बाद कम्युनिस्टों ने एक नारा दिया था–देश की जनता भूखी है यह आजादी झूठी है। उनका एक और नारा बहुत लोकप्रिय था– लाल किले पर लाल निशान मांग रहा है हिन्दुस्तान। कभी-कभी तो राजनीतिक दलों बहुत कमाल की नारों की जुगलबंदी होती थी। साठ के दशक में भाजपा का पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ हुआ करता था। उसके कार्यकर्ता नारे लगाते थे -
जली झोंपडी़ भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल
इसका करारा जवाब हुए कांग्रेस ने  नारा  दिया था -
इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं
समाजवादी पार्टी के नेता डा. राम मनोहर लोहिया ने देश की राजनीति को बहुत से ऐसे नारे दिए जिन्हें आज भी याद किया जाता है। पिछड़ों को सत्ता में पर्याप्त भागीदारी देने के लिए लोहिया का वह नारा आज भी याद किया जाता है जिसमें उन्होंने कहा था- संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ। इस नारे ने पिछड़ों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई थी। गोरक्षा आंदोलन के दौरान जनसंघ का यह नारा लोगों की जुबान पर चढ़ गया था -'गाय हमारी माता है, देश धर्म का नाता है'। समाजवादियों और साम्यवादियों की ओर से 1960 के दशक में धन और धरती बंट के रहेगी, भूखी जनता चुप न रहेगी जैसे नारे उछाले गए थे। चुनावों में खुला दाखिला सस्ती शिक्षा लोकतंत्र की यही परीक्षा जैसे नारे भी लगते रहे हैं।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 का लोकसभा चुनाव 'गरीबी हटाओ' के नारे पर लड़ा और सफलता पाई। 1974 में जब बिहार में जेपी का आंदोलन शुरू हुआ तो उसने जन-जन को झकझोर दिया। कैसा अजीब संयोग है राष्ट्रकवि के रूप में जाने जाने वाले रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियाँ जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति का नारा बनीं
सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास तुम्हारा है, ये नखत अमा के बुझते हैं, सारा आकाश तुम्हारा है।
उनकी ही कविता थी- दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो/ सिंहासन खाली करो कि जनता आती है. उनकी कविता की ये पंक्तियाँ इमरजेंसी के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनी। उनका नारे की तरह इस्तेमाल हुआ।
इमरजेंसी और संजय गांधी के समय यह नारे खूब चले थे- 
"जमीन गई चकबंदी मे, मकान गया हदबंदी में, द्वार खड़ी औरत चिल्लायए, मेरा मर्द गया नसबंदी में।"
एक और देखिए ...
"जगजीवन राम की आई आंधी, उड़ जाएगी इंदिरा गांधी, आकाश से कहें नेहरू पुकार, मत कर बेटी अत्याचार।" 
जनता पार्टी के ढाई साल के शासन से त्रस्त जनता की भावनाओं को भुनाकर कांग्रेस ने अपने पक्ष में माहौल तैयार करने के लिए नारा दिया- आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा जी को लाएंगे।' इसी के साथ और 'इंदिरा लाओ, देश बचाओ' नारा भी खूब चला। इसी तरह कांग्रेस के लिए साहित्यकार श्रीकांत वर्मा का लिखा यह नारा भी काफी बहुत चर्चित रहा - जात पर न पात पर इंदिराजी की बात पर मुहर लगाना हाथ पर। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिराजी तेरा नाम रहेगा, जैसे नारे ने पूरे देश में सहानुभूति लहर पैदा की, और कांग्रेस को बड़ी भारी जीत हासिल हुई। 1984-85 में राजीव गांधी जब पहला चुनाव लड़े तो उनकी सभाओं में जुटी भीड़ एक तरफ हाथ उठाती तो दूसरी तरफ यह नारा गूंजता था - 'उठे करोड़ों हाथ हैं, राजीव जी के साथ हैं।' अमेठी में कांग्रेस की स्टार प्रचारक के तौर पर जब प्रियंका गांधी प्रचार करने पहुंचीं तो वहां के लोगों की जुबां पर बस एक ही नारा था - अमेठी का डंका, बेटी प्रियंका।
कुछ नारे ऐसे निकल आते हैं, जो कई साल तक लोगों की जुबान पर चढे रह जाते हैं। भाजपा के पूर्व अवतार जनसंघ ने भी राजनीति में कुछ अच्छे नारों का योगदान दिया है। इनमें से एक प्रमुख नारा था – हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, हर घर में दीपक, जनसंघ की निशानी। अटल जी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करने के साथ ही भाजपा ने इस नारे को अपने पक्ष में खूब भुनाया अबकी बारी, अटल बिहारी। केंद्र में भाजपा की सरकार गई तो फिर भाजपा ने नारा दिया- 'कहो दिल से, अटल फिर से' जो उत्तर भारत में काफी लोकप्रिय रहा। लेकिन भाजपा का सबसे फ्लाप नारा रहा – इंडिया शाइंनिंग। ...............इस नारे ने एनडीए की चमक उतार दी थी। हिन्दी में इसका अनुवाद किया गया था भारत उदय लेकिन इस नारे की वजह से भाजपा अस्त हो गई थी। स्लमडॉग... के गाने जय हो का पट्टा कांग्रेस को मिल गया था, जो बीजेपी ने उसकी पैरोडी करते हुए फिर भी जय हो और भय हो जैसे नारे उतारे थे। भाजपा ने अस्तित्व में आने के बाद कई चुनावी नारे दिए,जिनमें लाल गुलामी छोड़कर बोलो बंदेमातरम तथा 'सबको परखा बार-बार हमको परखो एक बार' जैसे नारे शामिल हैं। इससे पहले, जनसंघ की ओर से आपातकाल के बाद अटल बोला इंदिरा का शासन डोला जैसे नारे लगाए गए।
 
उसी दौरान रायबरेली से इंदिरा को हराने में भी नारों की अहम भूमिका रही। हालांकि चिकमंगलूर से उपचुनाव भी उन्होंने नारो के रथ पर ही जीता। उसमें से एक नारा था - एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर, चिकमंगलूर। जनता पार्टी की सरकार के पतन के बाद 1970 के दशक में हुए मध्यावधि चुनाव में इंदिरा ने सरकार की स्थिरता को मुद्दा बनाते हुए एक और नारा दिया जो लोगों को भाया और वह सत्ता में लौटीं। यह नारा था, चुनिए उन्हें जो सरकार चला सके। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिराजी तेरा नाम रहेगा, जैसे नारे ने पूरे देश में सहानुभूति लहर पैदा की, और कांग्रेस को बड़ी भारी जीत हासिल हुई। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद राजीव तेरा ये बलिदान याद करेगा हिंदुस्तान खूब गूंजा और इसका असर भी वोटिंग पर देखा गया।
राम मंदिर आंदोलन के दौरान के कई नारों ने जनता को बहुत आंदोलित किया जैसे, सौगंध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं बनाएंगे, और बाबरी ध्वंस के बाद - ये तो पहली झांकी है, काशी मथुरा बाकी है (हालांकि ये चुनावी नारा नहीं था) तो वीपी सिंह को नारों में - राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है - बताया गया। तो समाजवादी पार्टी ने जिसने कभी न झुकना सीखा उसका नाम मुलायम है नारा लगाकर मुलायम के समर्थकों को खूब हौसला दिया था। 1990 के आसपास तो कई जातिवादी नारे भी गूंजे। तभी ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का उदघोष हुआ। 
बिहार में नारों की हर चुनाव में अच्छी खासी फसल होती रही है। जनता दल युनाइटेड का नारा था - बोल रहा है टी वी अखबार, सबसे आगे नीतीश कुमार, बढ़ता बिहार, नीतीश कुमार और "पांच साल बनाम 55 साल" जैसे नारों से लोगों को आकर्षित करने की कोशिश की तो सहयोगी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने मतदाताओं को आकर्षित करने के नारा लगाया अपना वोट विकास को, बढ़ता बिहार, बनता बिहार", पांच साल, बिहार खुशहाल" जैसे नारों से लोगों को रिझाने में जुटी। भारतीय राजनीति के नाराकोष में बसपा के भड़काऊ नारे अपना अलग स्थान रखते हैं। तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार, ठाकुर बाभन बनिया चोर बाकी सारे डीएस फोर, बनिया माफ, ठाकुर हाफ और ब्राह्मण साफ, जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी ने जातीय चेतना फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अपने चुनाव चिन्ह 'हाथी' की प्रतिष्ठा में बसपा के इस नारे ने भी काफी धूम मचायी थी - 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है।' यह नारा ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी काफी लोकप्रिय है। कुछ क्षेत्रों में इसके सवर्ण प्रत्याशियों ने पार्टी के परम्परागत वोटों के साथ ही अपनी बिरादरी के वोट बटोरने के लिए किसी और माध्यम के बजाय इस नारे का सहारा लिया 'पत्थर रख लो छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर।' जो काफी चर्चित रहा।
इस तरह कभी नारों ने जनता को राजनीतिक रूप से शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लोगों को आंदोलित करनेवाले इन नारों का इतिहास देखने के बाद इस चुनाव में ऐसा लगा कि क्या हमारे देश की राजनीति की नारों की समृद्ध परंपरा कहीं लुप्त तो नहीं हो रही।
 
- सतीश पेडणेकर
 

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.