सबित हुआ कि पेड़ नहीं है बांस

हाल ही में केंद्र सरकार ने बांस को पेड़ नहीं, घास की संज्ञा दे दी है. इस आधिकारिक पुष्टि के साथ ही लम्बे समय से बांस को घास घोषित किये जाने के लिए चल रहे अभियान को राहत मिली है. इस आधिकारिक पुष्टि से जंगलो में रहने वाले आदिवासियों के अधिकार भी स्थापित हो सकेंगे.

बांस के घास घोषित होने के साथ ही उम्मीद है कि हमारे जंगलों का नुकसान कुछ कम होगा और देश के करोड़ों लोगों को रोज़गार मिल सकेगा. साथ ही साथ देश के आदिवासियों को अपने जंगलों और उन से मिलने वाले फायदों पर बेहतर इख्तियार मिल सकेगा.

अब बस दरकार है कि भारतीय वन कानून में भी सरकार ज़रूरी संशोधन कर के जल्द से जल्द बांस को उसका असली दर्जा दिलायेगी. बांस समर्थको की मांग रही है कि भारतीय वन कानून (1927) को संशोधित किया जाए और कानून की धारा 2(7) में से बांस को पेड़ों की सूची से हटाया जाए.

बांस के 1500  से ज्यादा प्रमाणित इस्तेमाल हैं और ये भारत का सबसे फायदेमंद नवीकरणीय संसाधन है. भारत में सब से अधिक पैमाने पर बांस की खेती होती है और अगर ढंग से इसकी पैदावार को प्रबंधित किया जाए तो ये सैंकड़ों ग्रामीणों और आदिवासियों के लिए एक स्थायी आय का साधन बन सकता है. इस के प्रयोग से टिम्बर (काष्ठ) पर भी हमारी निर्भरता कम हो जायेगी. बांस के इस्तेमाल से लकड़ी के प्रयोग में कमी लाई जा सकती है, जिससे हमारे बेशकीमती वनों को बचाया जा सकता है. साथ ही कई संवेदनशील इलाके जैसे की देश के पूर्वोत्तर राज्यों में शांति और समृद्धि फ़ैल सकी है.

 

भारतीय वन कानून में बांस के पेड़ की सूची में होने की वजह से अभी तक बांस को काटना, बेचना या उस का व्यापार करना सरकार का एकाधिकार रहा है. और इसी वजह से वन अधिकारियों का इस हज़ारों करोड़ के व्यवसाय पर पूर्ण कंट्रोल रहा. कॉनट्रेक्टरों और निजी व्यवसायियों को बांस के वन पर सरकार करीब 30 सालों की लीज़ देती आई है. तो सालों से जहाँ सरकार बांस व्यापार पर अपना नियंत्रण रखते हुये राज्स्व कमाती आयी है, वहीँ उद्योगों को सस्ता कच्चा माल मिलता रहा है. पर जो लोग इन वनों में रहते आयें हैं, उनके हाथ कुछ नहीं लगा. भारत में बांस करीब 9  मिलियन हेक्टयेर के वन क्षेत्र में उगाया जाता है और इस की सब से अधिक मांग पेपर तथा हाउसिंग और निर्माण सेक्टर से आती है.

बांस के घास घोषित होने से, जंगलों में रहने वाले स्वयं इसकी उपज को काट और बेच सकते हैं. वो बांस के अन्य प्रयोग जैसे फर्नीचर आदि बनाकर अतिरिक्त लाभ भी कमा सकते हैं. बांस उनकी जीविका का एक सशक्त साधन बन सकेगा और उनका जीवन स्तर बेहतर होगा.

बांस लगभग 5 करोड़ लोगों को रोजगार दे सकता है, विशेषकर उन गरीबों को जिनका जीवन वनोंपज पर आश्रित है. भारत में चीन की अपेक्षा प्रति हेक्टेयर बांस की उपज 1/5 है और चीन के बांस क्षेत्र का सालाना टर्नओवर भारत की अपेक्षा 12 गुना अधिक है.  एसोचैम के मुताबिक, अगर भारत सरकार जो भी लकड़ी के उत्पाद खरीदती है उसके बजाय बांस को विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करे तो यह कदम सरकार के सालाना 7,000 करोड़ रु. बचा सकता है और इससे हमारे जंगल भी बचेंगे.

बांस की लगभग 66 फीसदी पैदावार भारत के पूर्वोतर के राज्यों में होती है. इस प्राकृतिक संसाधन के दोहन को लेकर हमारी असफलता इस क्षेत्र को बुरी तरह से प्रभावित कर रही है. यही नहीं, मिजो उग्रवाद सीधे तौर पर बांस पर बौर आने की समस्या को लेकर सरकार के ढुल-मुल रवैये का ही नतीजा था.

- स्निग्धा द्विवेदी

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