भ्रष्टाचार से आज़ादी की लड़ाई

भारत मे भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल विधेयक लाने की मांग कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हुये हैं और उन के द्वारा शुरु किये गये अन्दोलन मे मालूम पूरे देश भर का जन मानस जुड़ गया है. जैसे लोगों को अपनी दबी हुई कुंठा और व्यथा अभिव्यक्त करने के लिए एक मंच, एक आवाज़ मिल गयी हो.

देश भर के कार्यकर्ता इसे आजादी की दूसरी लड़ाई करार कर रहे हैं और इस काम में उनका साथ मेधा पाटकर, किरण बेदी, बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, अरविंद केजरीवाल, एडवोकेट प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, स्वामी अग्निवेश जैसे समाजसेवी भी शामिल हैं।

गांधीवादी नेता 72 वर्षीय हजारे के विरोध के बाद कृषि मंत्री शरद पवार ने भ्रष्टाचार पर गठित मंत्रिसमूह से इस्तीफा दे दिया है. हज़ारे ना कोई नेता और ना ही कोई बहुत बड़े उद्योगपति हैं लेकिन जब उनकी आवाज़ उठने पर सरकार हिल गई। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कल कैबिनेट के अपने कुछ सहयोगियों के साथ बातचीत के बाद हजारे से बातचीत के लिए एक या दो मंत्रियों को नामित करने का संकेत भी दिया है.

अगर देशव्यापी अन्दोलन की बात करें तो महाराष्ट्र में हजारे समर्थक भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। जयपुर, हैदराबाद, लखनऊ, मुंबई, भोपाल, इंदौर, अहमदाबाद आदि शहरों में आंदोलन चालू है। हरिद्वार में बाबा रामदेव की पतंजलि योगपीठ के सभी कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को उनके समर्थन में एक दिन का उपवास रखा और लखनऊ में वकीलों ने धरना दिया। फेसबुक पर करीब 40,000 लोग हज़ारे को अपना समर्थन दे चुके हैं और हर घंटे इस संख्या मे सिर्फ इज़ाफा हो रहा है. विदेशो मे बसे भारतीय और आमिर खान जैसे फिल्मी सितारे भी इस मकसद को अपना हाथ दे रहे हैं. इन समर्थको का मानना है कि आजादी के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है और भ्रष्टाचार से आजादी पाने की लड़ाई अब शुरू हो गई है।

अन्ना हज़ारे भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकार की ओर से प्रस्तावित लोकपाल विधेयक में परिवर्तन की मांग कर रहे हैं. उन्होंने कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर सरकारी विधेयक में व्यापक बदलाव के सुझाव दिए हैं और एक वैकल्पिक विधेयक का मसौदा पेश किया है जिसे जन-लोकपाल विधेयक का नाम दिया गया है. अन्ना के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट व चुनाव आयोग की तर्ज पर स्वतंत्र इकाई गठित हो। इसमें 50 प्रतिशत जनता के नुमाइंदे हों। यही इकाई भ्रष्टाचार मामलों की शिकायत सुने, छह महीने में जांच करें और दोषियों को सजा दे। इसके दायरे में प्रधानमंत्री व चीफ जस्टिस भी आएंगे।

एक आम भारतीय जैसे ये मान चुका था कि भ्रष्टाचार को झेलना उसका भाग्य है, ये एक ऐसी बीमारी है जिस का कोई इलाज नहीं है. आज़ादी के इतने सालो बाद भी हम इस समस्या का निराकरण नहीं कर पाए हैं. टू जी स्पेक्ट्रम, कामनवेल्थ खेल, आदर्श सोसाइटी जैसे बड़े घोटाले आज भी यही सिद्ध करते हैं कि हमारे राजनेताओं के पास इस समस्या पर वार करने के लिए कोई इच्छा शक्ति नहीं है. उलटे शासन में रहने वाले ही इन कुकर्मो को अंजाम देते आ रहे हैं. आम जन मानस में व्यवस्था के प्रति नाराजगी बहुत समय से बनी हुई है पर मानो उस के हाथ बंधे हुए हों. अब उस नाराज़गी को थोड़ी दिशा मिली है। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ये एक नहीं थमने वाला सत्याग्रह है. और सिर्फ जन लोकपाल बिल को अमली जामा पहनाने से इस लड़ाई में जीत नहीं होगी, ये संघर्ष तब तक चलना चाहिए जब तक इस आन्दोलन के असल उद्देश्य की पूर्ती नहीं होती. नेताओं और अधिकारियों को ये समझना होगा की इस देश और देश की जनता के प्रति उनकी एक जवाबदेही है. अपनी जेबें भर के वो देश के साथ लगातार विश्वासघात नहीं कर सकते. देश में व्याप्त भ्रष्टाचार नामक इस चारित्रिक कमी को जड़ से उखाड़ना ही होगा.

- स्निग्धा द्विवेदी