विदेशी पूंजी से बदलेंगे हालात

आर्थिक सुधारों के मद्देनजर एफडीआइ के फैसले ने विपक्ष को भले आक्रामक किया हो, लेकिन सरकार ने भी यह तय कर लिया है कि नहीं झुकेगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी साफ कह दिया है कि देश को वे 1991 की स्थिति में नहीं ले जाना चाहते। उनके इस बयान से सरकार का आत्मविश्वास भी झलक रहा है। तमाम विरोधों के बीच सरकार के बढ़ते कदम यह बताने के लिए काफी हैं कि उसके ऊपर इन विरोधों का कोई असर नहीं होने वाला। आर्थिक सुधार लागू करने के लिए सरकार तटस्थ है और वह करके रहेगी। जानकारों की मानें तो सरकार अभी और कई नए फैसले लेने वाली है, जो देश को हतप्रभ कर सकता है। रिटेल में एफडीआइ को मंजूरी दिए जाने के बाद जब विपक्ष ने हल्ला-हंगामा शुरू किया तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि बड़े सुधारों का वक्त आ गया है। अगर हमें जाना भी पड़ा तो हम लड़ते हुए जाएंगे।

एफडीआइ से किसानों का फायदा होगा और नौकरियां भी बढ़ेंगी। आर्थिक विश्लेषक भी मानते हैं कि सरकार का यह कदम विदेशी पूंजी निवेश को दोबारा भारतीय बाजार की ओर लाने का अहम प्रयास है। इस कदम से खुदरा व्यापार में सक्रिय टेस्को, वॉलमार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में अपने स्टोर खोलने की इजाजत मिल जाएगी। इसका मकसद यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय ब्रांड से देश में विदेशी पूंजी निवेश हासिल हो। भारत सरकार सिंगल ब्रांड व्यापार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश को पहले ही हरी झंडी दिखा चुकी है। सालों पहले हुए एक फैसले से जूतों की कंपनी रीबॉक, फर्नीचर की आइकिया, लाइफस्टाइल साजो-सामान की गुची जैसे बड़े विदेशी ब्रांड्स भारत में पूरे मालिकाना हक के साथ दुकानें खोल पाने में सक्षम हो गए थे। तब सरकार मल्टी ब्रांड रिटेल को मंजूरी नहीं दे पाई थी तो उसकी उद्योग संगठनों ने कड़ी आलोचना की थी। पिछले महीने अमेरिकी पत्रिका टाइम ने मनमोहन सिंह को फिसड्डी करार दिया था। इसके बाद 5 सितंबर को अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट ने उन्हें भारत का खामोश प्रधानमंत्री बताया था। इसके ठीक नौ दिन बाद यानी 14 सितंबर को मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल ने खुदरा क्षेत्र, उड्डयन और प्रसारण के क्षेत्र में विदेशी पूंजी के लिए दरवाजे खोलने की वे घोषणाएं कर डालीं, जिन्हें उनकी सरकार पिछले लंबे अर्से से टालती आ रही थी।

जानकारों की राय में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास इसके अलावा कोई और चारा भी नहीं था। जिस आर्थिक विकास की दर के लिए दुनिया ने उनका लोहा माना, वह सुस्त पड़ी है। ताजा घटनाक्रम यानी एफडीआइ को मंजूरी मिलते ही सेंसेक्स छलांगे लगा रहा था, निफ्टी खुशी से उछल रहा था, रुपया चार महीने के सबसे मजबूत स्तर पर पहुंच चुका था। उद्योगपति एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। बाजार ममता की विदाई पर जश्न मना रहा था, राजनीतिक गलियारों में सहयोगी सरकार को समर्थन देने और निभाने की कसमें खा रहे थे। इसी दरम्यान हर तरफ से दो संदेश परिलक्षित हो रहे थे। पहला, आर्थिक सुधारों पर अड़ी मनमोहन सरकार को फिलहाल कोई खतरा नहीं है। दूसरा, सरकार अब आर्थिक सुधारों की राह से कतई पीछे नहीं हटेगी। यानी अब रिटेल, एविएशन, ब्रॉडकास्ट, पॉवर एक्सचेंज में विदेशी निवेश और चार सार्वजनिक कंपनियों के विनिवेश के बाद सरकार अब कुछ नए कदम उठाने वाली है। साथ ही वित्तमंत्री पी.चिंदबरम ने छोटे निवेशकों को शेयर बाजार की तरफ आकर्षित करने के लिए राजीव गांधी इक्विटी फंड को मंजूरी दे दी। इसमें 10 लाख की सालाना आमदनी वाला आम निवेशक अगर पूंजी बाजार में पैसे लगाता है तो उसे पचास हजार रुपये तक के निवेश पर टैक्स छूट मिलेगी। सरकार ने इसमें म्युचुअल फंड जोड़कर इसकी पहुंच और बढ़ाने की कोशिश की है।

यों कहें कि सरकार एक के बाद एक तेजी से आर्थिक फैसले ले रही है। ये वर्षो से फाइलों में बंद थे। सरकार ने विदेशी कर्ज पर टैक्स 20 फीसद से घटाकर 5 फीसद कर दिया है। यह उद्योगों के लिए बड़ी राहत है। सरकार इसे देश में विदेशी धन लाने के कदम के तौर पर देख रही है। हो सकता है कि सरकार बीमा क्षेत्र में 49 फीसद विदेशी निवेश का ऐलान करे। पेंशन बिल में भी सुधार करे यानी इसमें भी 49 फीसद विदेशी निवेश को मंजूरी मिल जाए। भू-अधिग्रहण बिल पर कोई बड़ा ऐलान करे। कई चीजों पर से सब्सिडी हट जाए। सबके बावजूद सरकार सुरक्षित नजर आ रही है। यही वजह है कि वह आर्थिक सुधार की दिशा में तेजी से कदम उठा रही है।

- राजीव रंजन तिवारी (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार है)
साभारः दैनिक जागरण
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-09-24&pageno=9#id=111750782433264794_49_2012-09-24