एफडीआई घाटे का नहीं, बड़े फायदे का सौदा साबित होगा

खुदरा व्यवसाय देश में निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा उद्योग है। यह खेती के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता क्षेत्र भी है। देश की जीडीपी में लगभग 10 प्रतिशत और रोजगार के अवसर प्रदान करने में 6-7 प्रतिशत हिस्सेदारी खुदरा व्यवसाय की है। लगभग डेढ करोड़ रिटेल आऊटलेट्स के साथ भारत विश्व में सबसे ज्यादा आऊटलेट्स घनत्व वाला देश है। चाहे असंगठित रूप से एक परिवार द्वारा छोटे स्तर पर किया जाने वाले खुदरा व्यवसाय के स्वरूप में हो अथवा संगठित रूप में पिछले दस वर्षों में यह क्षेत्र महत्वपूर्ण विकास का साक्षी बना है। उदारवादी अर्थ व्यवस्था, प्रतिव्यक्ति आय और उपभोक्तावाद में वृद्धि ने बड़े व्यावसायिक घरानों और उत्पादकों को इस क्षेत्र में निवेश करने को प्रोत्साहित किया है। रियल स्टेट और पूंजीपती भी इस ओर निवेश कर रहें हैं। कई विदेशी रिटेलर्स ने थोक, कैश-एंड-कैरी, स्थानीय विनिर्माण, फ्रैंचाईजी, टेस्ट मार्केटिंग आदि जैसे पीछे के रास्तों से बाजार में अपनी उपस्थिति दर्ज भी करा चुकी हैं। संगठित खुदरा व्यवसाय में वृद्धि को देख प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए असंगठित खुदरा व्यवसायी भी अपने व्यावसायिक ढांचे को नई तकनीक और नए बिजनेस मॉडल्स को अपनाकर तेजी से बदल रहें हैं।

हाल के समय में रिटेल क्षेत्र में इतने बदलाव और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद भारत में यह सबसे कम विकसित और विश्व के अन्य देशों की तुलना में सबसे कम विकास दर हासिल करने वाला संगठित क्षेत्र बना हुआ है। पिछले दस वर्षों में कुल खुदरा व्यापार में संगठित खुदरा व्यापार के विकास की दर ब्राजील और चीन में 10 प्रतिशत से बढ़कर क्रमशः 40 और 20 प्रतिशत हो गई है। जबकि भारत में 1995-2005 के बीच दस वर्षों में इसके वृद्धि की दर महज 2 प्रतिशत रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह कि रिटेल देश के उन गिने चुने क्षेत्रों में से एक है जहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की इजाजत नहीं है। वो इसलिए क्योंकि विपक्षी दलों सहित चंद राजनैतिक दल और उनके नेतृत्व में मुट्ठीभर लोग इसकी खिलाफत में जी जान से जुटे हैं। एफडीआई के विरोध में कुछ प्रदेश सरकारें और कुछ दिनों पूर्व तक केंद्र सरकार में मुख्य दल के रूप में शामिल रही पार्टियां भी उतर आयी हैं। यह जानते हुए भी कि उनके पास अपने प्रदेश में विदेशी निवेश को रोकने का पूरा अधिकार है। वो चाहें तो अन्य प्रदेशों में विदेशी निवेश के नफे नुकसान को देखते हुए इसके अपने प्रदेश में लागू कर सकती हैं। लेकिन नहीं, उन्हें विरोध जो करना है। आम आदमी, फुटकर व्यवसायियों और बेरोजगारी का डर दिखाकर पार्टियां लोगों को लामबंद करने में जुटी हुई है। हालांकि इन सब के दौरान वर्तमान केंद्र सरकार की भी कमी उजागर हुई है। सरकार विपक्ष सहित आम जनता को एफडीआई के फायदों को समझाने में बुरी तरह नाकाम रही है। दरअसल हाल फिलहाल में हुए भ्रष्टाचार के मामलों के खुलासे ने सरकार के प्रति आम आदमी के विश्वास को हिलाकर रख दिया है। कोई भी सरकार की बात सुनने को तैयार नहीं है यहा तक कि मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी भी अड़ियल रवैया अपनाए बैठी है।

यह हालात ठीक वैसे ही माहौल को जन्म दे रहा है जैसा माहौल इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने, राजीव गांधी के कार्यकाल में देश में कम्प्यूटरीकरण को बढ़ावा देने, नरसिंहा राव के कार्यकाल में विदेशी कंपनियों के लिए बाजार के रास्ते खोलने और विदेशी बैंकों को देश में कारोबार करने की अनुमति देते समय तैयार हुआ था। याद करिए उस समय को जब कम्प्यूटर के सरकारी कार्यालयों में प्रयोग का जबर्दस्त विरोध हुआ था। दरअसल, उस समय भी विपक्ष ने जनता को रोजगार छिनने, विदेशी कंपनियों के गुलाम बनने जैसे तमाम डर का सहारा लिया था। उस समय भी सरकार जनता को यह समझाने में नाकाम रही कि कम्प्यूटर मुसीबत का सबब नहीं तरक्की की इबादत लेकर आएगा। हालांकि धीरे-धीरे आज वे सभी मुद्दे पीछे छूट चुके हैं। इसका कारण यह कि देश ने न केवल बैंकों के राष्ट्रीयकरण और कम्प्यूटरीकरण का फायदा देखा बल्कि विदेशी निवेश के कारण देश में रोजगार और विकास के नए आयामों को आकार लेते देखा। आज कम्प्यूटर के कारण रोजगार घटने की बजाए रोजगार के नए-नए क्षेत्र खुलते हुए देखे जा सकतें है। याद कीजिए बैंकिंग के क्षेत्र में विदेशी खिलाड़ियों के आ जाने से इस क्षेत्र में कितना क्रांतिकारी बदलाव आया है। एटीएम/ क्रेडिट कार्ड, ई बैंकिंग, ई-एकाउंट्स, मोबाइल बैंकिंग जैसी कितनी सुविधाएं शुरू करने का श्रेय विदेशी बैंको को ही जाता है। इसी प्रकार, दूर संचार के क्षेत्र में बड़ी विदेशी कंपनियों के प्रवेश का ही परिणाम है कि आज मोबाइल सेट, आऊट गोईंग, रोमिंग, एसएमएस, एमएमएस रेट आदि पूर्व की तुलना में काफी सस्ते हो रहे हैं। शॉपिंग मॉल्स व रिलायंस फ्रेश के आऊटलेट्स खुलते समय भी ऐसे ही विरोध देखने को मिले थे। कितनी दुकानें बंद हुई? कितने लोग बेरोजगार हुए? कितने किसानों का हक मारा गया? शायद इसका जवाब न किसी राजनैतिक दल के पास है और ना ही विद्रोह का विगुल फूंके बैठे लोगों का। यहां तक कि चीन जैसे कट्टर कम्यूनिस्ट देश में भी डेढ़ दशक पहले से रिटेल में एफडीआई की अनुमति दे दी गई जिसके बाद वहां के रोजगार की परिस्थितयों, उत्पादन, कीमतों में जबरदस्त सकारात्मक परिवर्तन देखा जा सकता है।

यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि खुदरा व्यापारी भी इस बात को स्वीकार कर रहें हैं कि वर्तमान परिस्थितयों में भले ही उनके लाभ में थोड़ी कमी आ जाए लेकिन रोजगार चौपट हो जाएगा ऐसा कतई नहीं है। दरअसल, इस विश्वास के पीछे भारतीय ग्राहकों की क्रयशीलता, उनका व्यवहार, पसंद नापसंद आदि कारण शामिल है। दुकानदार यह भी जानते हैं कि जितने बड़े पैमाने पर स्टोर खोलने की तैयारी है उतना बड़ी भूखंड शहर से बाहर मिल पाना ही संभव है। और पेट्रोल की बढ़ती कीमतें, परिवहन व्यवस्था व खर्च, समय की बचत आदि ऐसे तमाम कारण हैं जो ग्राहकों को पड़ोस की दुकान तक लाने के लिए काफी है। इसके अलावा विदेशी रिटेलर्स के बाजार में उतरने से बढ़ने वाली प्रतिस्पर्धा के चलते कृषि उत्पादों के खरीददारों के किसानों के दरवाजे तक पहुंचने, किसानों को मिलने वाले अधिकतम लाभ, मंडी तक सामान ले जाने पर होने वाले परिवहन खर्च आदि की बचत व सबसे बड़ी बात उपभोक्ताओं को होने वाले फायदों को ध्यान में रखने पर एफडीआई घाटे का नहीं बड़े फायदे का सौदा साबित होगा। विरोधियों और राजनैतिक दलों को चाहिए कि यदि वास्तव में एफडीआई को लेकर उनके पास चिंता के वास्तविक कारण हैं तो इसपर चर्चा करे न कि सड़कों पर उतरकर लोगों को भ्रमित करे।

- अविनाश चंद्र