कृषि कानूनों का विरोध और सार्वजनिक चयन सिद्धांत

केंद्र सरकार द्वारा देश में कृषि की दिशा व दशा बदलने तथा किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से देश में दो नए कृषि कानून बनाए गए हैं और एक कानून में संशोधन किया गया है। ये कानून हैं कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। इन कानूनों के विरोध में पंजाब और हरियाणा के किसान आंदोलनरत हैं।

प्रदर्शनरत किसानों का कहना है कि निजी व्यापारियों को कृषि उपज की खरीद बिक्री की अनुमति देने से सरकारी मंडियों की महत्ता कम हो जाएगी और धीरे धीरे सरकार इन्हें बंद कर देगी। कई टीवी चैनलों से बातचीत में किसानों ने खुलकर स्वीकार किया की मंडी के आढ़ती उनके अच्छे और बुरे दिनों में काम आते हैं इसलिए वे नहीं चाहते कि आढ़ती समाप्त हों। आंदोलन को राष्ट्रीय रूप देने के लिए किसानों ने दिल्ली के बॉर्डर पर डेरा डाला है। वे गणतंत्र दिवस के मौके पर ट्रैक्टर मार्च निकालने की अनुमति भी मांग रहे हैं।

हालांकि दशकों से किसान आंदोलनों के केंद्र में आढ़तियों की मनमानी मुख्य मुद्दा रहा है। महाराष्ट्र के किसान संगठन शेतकरी संगठन हो या भारतीय किसान यूनियन (मान) गुट, सबके विरोध में एपीएमसी मंडी और आढ़तिये मुख्य निशाने पर रहे। केंद्र में चाहे जिस भी दल की सरकार रही हो, किसानों के हित में कृषि मंडी व्यवस्था को समाप्त करने पर सहमत रही है। लेकिन नए कृषि कानूनों के विरोध के दौरान अचानक आढ़तियों के प्रति उमड़े प्रेम ने पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट्स को भी आश्चर्यचकित किया है। लेकिन किसानों और राजनैतिक दलों का विरोध क्या सिर्फ कानून और सत्ता पक्ष का विरोध है या कुछ और तथ्य भी कार्य कर रहे हैं। आइए कृषि कानूनों के विरोध के मूल को जानने के लिए इसे सार्वजनिक चयन की कसौटी पर कसकर देखते हैं..

पब्लिक च्वाइसः ए प्राइमर नामक पुस्तक में पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट और इंस्टिट्यूट ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स, लंदन के डायरेक्टर एमॉन बटलर ने ‘रेंट सीकिंग’ टर्म का प्रयोग किया है। सामान्य तौर पर आम लोग रेंट का तात्पर्य किसी भूमि अथवा अन्य संपत्ति के ऐवज में प्राप्त होने वाले किराये से लगाते हैं जिसके लिए मालिक को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। हालांकि अर्थशास्त्री रेंट सीकिंग की परिभाषा को कहीं ज्यादा तकनीकी रुप से परिभाषित करते हैं। उनके अनुसार जब किसी कारोबारी या निवेशक को सामान्य प्रतिस्पर्धा से कहीं ज्यादा रिटर्न मिलता है, तो वह रेंट सीकिंग कहलाती है। रेंट सीकिंग (सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता, सब्सिडी आदि) की परिकल्पना सबसे पहले 1967 में गार्डन ट्यूलॉक ने दी थी। हालांकि कुछ वर्षों बाद इसे मुहावरे के रुप में खुद ऐनी क्रुएगर ने प्रचलित किया।

सामान्य भाषा में कहें तो, बाजार वाली परिस्थितियों में यदि किसी आपूर्तिकर्ता या कारोबारी को दूसरों से प्रतिस्पर्धा नहीं मिलती है और जिससे उसकी ज्यादा आय या कमाई होती है तो वह रेंट सीकिंग कहलाएगी। उदाहरण के तौर पर अगर किसी गांव में एक अकेला किराना कारोबारी है, तो उसे कोई प्रतिस्पर्धा नहीं मिलेगी। ऐसे में वह न केवल उत्पादों की कीमतें मनमाने तरीके से तय करता है बल्कि अपनी सेवाएं भी ग्राहकों को खराब तरीके से देता है। किराना कारोबारी के ज्यादा फायदे को देखते हुए दूसरे लोग भी गांव में कारोबार करने के लिए प्रेरित होते हैं। जो कि दुकान खोलने के लिए स्वतंत्र होते हैं। जब उस बाजार में दूसरे कारोबारी या दुकानदार आ जाते हैं, तो पहले वाले कारोबारी का बाजार पर से एकाधिकार खत्म हो जाता है। ऐसे में वह कीमतें कम करने और बेहतर सेवाओं देने पर मजबूर हो जाता है।

किसानों के प्रदर्शन को रेंट सीकिंग सिद्धांत की कसौटी पर कस कर देखें तो स्पष्ट होता है कि कानूनों की वापसी होने पर दो वर्गों का फायदा है। एक, कृषि मंडी के आढ़तीए और दूसरा राज्य सरकारें। ऐसा इसलिए क्योंकि यदि निजी व्यापारी और खाद्यान्न उत्पादक यदि सीधे एक दूसरे के साथ व्यापार करना शुरु कर देते हैं तो इससे सीधा सीधा नुकसान आढ़तीयों का होगा क्योंकि उन्हें बतौर मध्यस्थ किसानों और व्यापारी दोनों से कमीशन प्राप्त होता है। कमीशन की प्रतिशतता कुल मिलाकर 15 से 20 प्रतिशत तक होती है। इसके अलावा कृषि मंडियों से राज्य सरकारों को भी राजस्व प्राप्त होता है जो कई हजार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष तक होता है। अब यदि नए कानून वापस नहीं होते हैं और अपने वर्तमान स्वरूप में ही जारी रहते हैं तो नए व्यापारियों से सरकारी मंडियों के आढ़तीयों और राज्य सरकार दोनों का नुकसान होना तय है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रतिस्पर्धा के कारण निजी व्यापारी किसानों को कुछ न कुछ ‘अतिरिक्त’ अवश्य प्रदान करेंगे। किसान उस ‘अतिरिक्त’ को प्राप्त करने के लिए मंडी छोड़ व्यापारियों के साथ लेनदेन करेगा। इससे आढ़तीयों को भी मजबूरन अपने लाभ में कमी लाना होगा। यही कारण है कि किसानों के आंदोलन को आढ़तीयों और कुछ राज्य सरकारों का पूरा समर्थन (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में) प्राप्त है।   

पब्लिक च्वाइसः ए प्राइमर किताब में रेंट सीकिंग की व्याख्या करते हुए बटलर आगे बताते हैं कि इस व्यवस्था में प्रचूर फायदा वहीं मिला है, जहां राजनैतिक सत्ता चाहती है। वह उस उस क्षेत्र में नए प्रतिस्पर्धियों के लिये बाजार में प्रवेश व प्रतिस्पर्धा को दुष्कर या असंभव बना देती है और इच्छित व्यक्ति अथवा संस्था को अनुचित लाभ प्रदान कराती है। बटलर इसे न्यूयार्क में टैक्सियों के लिए लाए गए कानून के उदाहरण से समझाते हैं। जिसके तहत शहर में अधिकतम टैक्सी चलने की संख्या 13 हजार तय कर दी गई थी। जो कि महामंदी के दौर में चलने वाली टैक्सियों की संख्या से भी आधी थी। इस फैसले का परिणाम यह हुआ कि टैक्सी बाजार में प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई और टैक्सी ड्राइवर कहीं ज्यादा कमाई करने लगे। लेकिन इसके साथ ही टैक्सी का इस्तेमाल करने वालों की दिक्कतें बढ़ गई। लोगों का टैक्सी के लिए इंतजार लंबा हो गया। नए न्यूयार्क टैक्सी लाइसेंस ने टैक्सी ड्राइवरों की कमाई में 10 लाख डॉलर का अतिरिक्त फायदा पहुंचाया। ऐसे में रेंट सीकिंग से होने वाली कमाई को उसे मिलने वाले संरक्षण के रुप में देखना चाहिए।

यह भी समझना जरूरी है कि रेंट सीकिंग से पड़ने वाले आर्थिक बोझ की भरपाई सरकारें आम आदमी से ही करती है। ऐसे में अगर लोगों को लगता है कि उनकी मेहनत से की गई कमाई और बचत ज्यादा टैक्स देने या ऊंची कीमतें चुकाने में चली जा रही है तो वह कम मेहनत करते हैं। और अपनी बचत को ऐसी जगह निवेश करने से परहेज करने लगते हैं, जहां पर निवेश से पूंजी का निर्माण होता है। ऐसे में पूंजी निर्माण करने वाली कंपनियों के पास नकदी का संकट बढ़ जाता है। इसका नुकसान एक बार फिर आम जनता को ही उठाना पड़ता है।

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https://azadi.me/sites/default/files/Public-Choice-Hindi.pdf (यह पुस्तक नेटवर्क फॉर ए फ्री सोसायटी के सहयोग से सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा हिंदी में निशुल्क उपलब्ध कराया जा रही है)

- अविनाश चंद्र (लेखक आजादी.मी के संपादक हैं)