आंदोलन के माध्यम से किसान उपनिवेशकालीन कानून को जारी रखने का समर्थन कर रहे हैं

एक पुरानी कहावत है - अमेरिकी लोगों की बुद्धिमता को कम आंक कर किसी का आर्थिक नुकसान नहीं हुआ अर्थात अमेरिकियों को आसानी से फुसलाकर पैसे कमाए जा सकते हैं। यदि आप इस पर आगे विचार करें तो उन्हें अधिक बुद्धिमान आंकना संभवतः ज्यादा कारगर होगा। यदि आप इस विषय पर और अधिक विचार करें तो पाएंगे कि ऐसी स्थिति सभी लोकतंत्रों के साथ है। और यदि आप में थोड़ा अधिक धैर्य है और आप और अधिक विचार करते हैं तो आप पाएंगे कि कहावत में ‘अमेरिकी लोगों’ के स्थान पर ‘भारतीय लोग’ ज्यादा सटीक बैठता है। विशेषकर वर्तमान में जारी उन बहसों के परिपेक्ष्य में जो बहु प्रतीक्षित, बहु चर्चित और लंबे समय से बकाया रहे कृषि कानूनों को लेकर हो रहे हैं।

इन कानूनों को थोड़ा विस्तार में जान लेते हैः पुराने कृषि उपज कानून (कृषि उपज मंडी समिति अर्थात एपीएमसी का गठन) लगभग 150 वर्ष पूर्व औपनिवेशक आकाओं के मैनचेस्टर स्थित मिलों की कच्चे कपास की जरूरत को पूरा करने के लिए अस्तित्व में लाए गए थे। इन मिलों में तैयार उत्पादों को बाद में मोटे मुनाफे के साथ वापस स्थानीय लोगों को ही बेचा जाता था। किसान लाचार थे, जरूरतमंद थे और अपने उत्पादों को एक नियंत्रित बाजार में बेचने के लिए बाध्य थे। और जैसा कि आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं, नियमन के इन प्रावधानों को तैयार भी औपनिवेशक आकाओं के द्वारा ही किया गया था। इस बात की पूरी संभावना है कि ‘गरीब’ किसानों का तन्मयता से समर्थन कर रहे लोग (जिन्हें हाल ही में प्रदर्शन में आने वाले लोगों को महंगे सूखे मेवे वितरित करते हुए देखा गया था) इस जाहिर तथ्य से अनभिज्ञ हैं। इन (तुलनात्मक रूप से) अधिक अमीर किसानों का समर्थन कर, प्रदर्शनकारी दरअसल उन उपनिवेश कालीन कानूनों को जारी रखने जिद ही कर रहे हैं।

इस ऐतिहासिक अध्याय से थोड़ा आगे बढ़ते हैं। एपीएमसी को प्राप्त संक्षारण एकाधिकार युक्त शक्तियों की पहचान लगभग सभी राजनैतिक दलों और किसान संगठनों है। उदाहरण के लिए भारत किसान यूनियन ने वर्ष 2008 में किसानों को अपने उत्पादों को कॉरपोरेट्स को बेचने का अधिकार दिलाने के समर्थन में प्रदर्शन किया गया। कांग्रेस पार्टी द्वारा उसी कानून को वर्ष 2019 के अपने घोषणा पत्र में शामिल किया गया था।

आइए किसान आंदोलन के समर्थकों के तर्कों की श्रृंखला को समझते हैं। वर्ष 1991 में सरकार ने उद्योगों को उसके पिंजरे से आजाद कर दिया और आज उसका परिणाम सबके समक्ष है। इसे सभी देखते हैं और उसकी तारीफ करते हैं (बेशक जानबूझ कर अंधे बने लोगों को छोड़कर)। भारत में जीडीपी में वृद्धि की दर पूर्व के औसतन 3 प्रतिशत से कम की तुलना में पिछले 30 वर्षों से औसतन 6 प्रतिशत के साथ, दोगुनी हो गई है।

कृषि क्षेत्र को वर्ष 1991 के सुधारों के दौरान मुक्त नहीं किया गया और इसका कारण ‘राजनैतिक’ अर्थशास्त्रियों को ही ज्यादा अच्छे से मालूम होगा। आज भी, किसान अपनी उपज को सरकारी नियंत्रण वाले मंडियों के माध्यम से बेचने के लिए बाध्य हैं। सुधार युक्त नए कानून किसानों को उनके उत्पादों को एपीएमसी और एपीएमसी के बाहर अपनी मर्जी से बेचने की अनुमति देता है। सरकार सभी खाद्यों को एपीएमसी के माध्यम से ही खरीदती है। देश के केवल 6 प्रतिशत किसान ही अपने उत्पादों को एपीएमसी के माध्यम से सरकार को बेचते हैं। इन 6 प्रतिशत किसानों में शामिल सभी किसान मुख्य रूप से दो राज्यों, पंजाब और हरियाणा में रहने वाले बड़े किसान हैं। सरकार द्वारा खरीदे जाने वाले कुल गेहूं का 60 फीसदी हिस्सा आमतौर पर इन्हीं दो राज्यों के किसानों का होता है। जबकि चावल की कुल सरकारी खरीद में इन दो राज्यों की हिस्सेदारी लगभग एक तिहाई है। सरकार इन किसानों से अनाज इसलिए खरीदती है ताकि वह देश की निचली दो तिहाई आबादी के बीच राशन की दुकानों के माध्यम से उसका पुनर्वितरण कर सके। लेकिन इस प्रक्रिया में बहुत सारे रिसाव हैं। इन रिसावों पर पहली बार खुली चर्चा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा सन 1985 में की गई। तब उन्होंने कहा था कि सरकार द्वारा खरीदे गए कुल खाद्यान्नों का मात्र 15 प्रतिशत ही गरीबों तक पहुंच पाता है।  

पंजाब और हरियाणा में कुल किसानों की संख्या 20 लाख से अधिक नहीं होगी और इसमें से मात्र 5 प्रतिशत किसानों के पास ही 10 हेक्टेयर से ऊपर जमीन होगी। मोटा मोटी गणना के हिसाब से पंजाब और हरियाणा के प्रदर्शनकारी किसानों की कुल संख्या 2 लाख से अधिक नहीं है। देश में किसानों (जिसमें सबसे छोटे, छोटे और बड़े सभी किसान शामिल हैं) की कुल संख्या 10 करोड़ है। तो ऐसे किसान जिनके पास प्रदर्शन करने का ‘वाजिब’ कारण है उनकी संख्या देश के कुल किसानों की संख्या का 0.2 प्रतिशत है। और वे यह प्रदर्शन भी किस लिए कर रहे हैं? वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं ताकि देश और दुनिया के सर्वाधिक अमीर किसान बने रहने का उनका लाइसेंस बरकरार रहे। क्योंकि एपीएमसी की कृपा के साथ साथ इन किसानों को आय पर कर नहीं देना पड़ता है। कृषि से होने वाली आय को कर मुक्त रखने का फायदा गरीब किसानों को नहीं मिल पाता क्योंकि उनकी आय ही इतनी नहीं है कि उस पर कर लगाया जा सके।

चावल, गेहूं और दालों के उत्पादन में वृद्धि

 

नोट्स 1) चावल का उत्पादन करने वाले अन्य प्रदेशः आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल
नोट 2) गेहूं का उत्पादन करने वाले अन्य प्रदेशः बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश
नोट 3) दालों का उत्पादन करने वाले अन्य प्रदेशः चावल और गेहूं का उत्पादन करने वाले उक्त वर्णित सभी राज्य

ईमानदार बनें - आप में से कितने लोग दुनिया के सभी 200 में से 195 देशों के ऐसे कानूनों के बारे में जानते हैं जो किसी व्यक्ति को बाजार में उसके माल को बेचने से रोकते हैं? विकसित और विकासशील दोनों प्रकार के बाजारों के अनगिनत पटरी विक्रेताओं (स्ट्रीट वेंडर्स) का ही उदाहरण ले लीजिए। वो अपना माल किसे बेचे, किसे नहीं क्या उन पर किसी प्रकार का कोई रोक है? फिर ऐसी मांग क्यों कि केवल एपीएमसी ही किसानों की उपज की एक मात्र खरीददार हो?

वैचारिक रूप से प्रेरित देशी व अंतरराष्ट्रीय मीडिया के एक बड़े तबके को छोड़कर ये सभी तथ्य हरेक को भली भांति ज्ञात है। ‘खबर’ चलाई जा रही है कि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन चल रहा है और 25 करोड़ कार्यकर्ताओं ने इसमें हिस्सा लिया है। फर्जी खबर (फेक न्यूज) ‘प्रभावी’ तभी हो सकता है जब उस फर्जीवाड़े में कुछ तार्किकता शामिल हो। हमें यह विश्वास करने को कहा जा रहा है कि 2,00,000 अमीर किसानों को 10 करोड़ गरीब किसानों का समर्थन प्राप्त है। वे किसान जो अमीर और कर देयता से छूट प्राप्त किसानों से बहुत कम कमाता है!
शुरुआती पैराग्राफ को याद कीजिए?

विरोध की राजनैतिक अर्थव्यवस्था को भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार और विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री रहे कौशिक बसु के द्वारा निम्नलिखित बयान के माध्यम से चित्रित किया गया है। हाल ही में उन्होंने ट्वीट किया हैः “मैंने नए कृषि कानूनों पढ़ा है और अब जाकर यह महसूस किया है कि ये दोषपूर्ण हैं और किसानों के लिए हानिकारक हैं। कृषि के क्षेत्र के हमारे नियमन को बदलने की आवश्यकता है लेकिन नए कानून किसानों के हितों की रक्षा करने से अधिक कॉरपोरेट के हितों का  रक्षा करते हैं। भारत के किसानों की समझदारी और नैतिक शक्ति को सलाम।”

समझदारी वाले हिस्से को समझा जा सकता है कि अमीर अपनी अमीरी जाने नहीं देना चाहते, वह भी तब जब वे इस अमीरी के अधिकारी नहीं है। नैतिकता वाले पहलू का हिस्सा स्पष्ट नहीं है लेकिन शायद आग और विश्लेषण करने पर इसका पता चले। चलिए नैतिक दर्शनशास्त्र का सार पता करते हैं और भारत के गैर सुधार युक्त बाजार ने पंजाब और हरियाणा के कृषि आधारित अर्थव्यवस्थाओं के साथ क्या सुलूक किया है उसकी भी पड़ताल करते हैं। ये दो राज्य हरित क्रांति के अग्रदूत रहे हैं। इन किसानों को घटी दर पर (सब्सिडाइज़्ड) बिजली प्राप्त होती है (ताकि वे भू जल स्तर को बर्बाद कर सकें)। ऐसी ही सुविधा उन्हें उर्वरकों (फर्टिलाइजर्स) के अत्यधिक इस्तेमाल पर भी प्राप्त होती है (जिससे उन्हें इसे जरूरत से ज्यादा प्रयोग करने और पर्यावरण को बर्बाद करने का लाइसेंस प्राप्त हो जाता है)। लेकिन हो सकता है कि पंजाब और हरियाणा के अमीर किसानों ने कृषि के क्षेत्र में तीव्र गति से प्रगति की हो और ऐसा करके उन्होंने राज्य, देश और गरीबों की मदद की हो।

पंजाब और हरियाणा के कृषि उत्पादन में प्रगति की तुलना अन्य राज्यों के कृषि उत्पादन में प्रगति की तुलना करने पर पता चलता है कि इन दो राज्यों की प्रगति तुलनात्मक रूप से कम रही है। उपरोक्त तालिका में तीन प्रमुख फसलों - चावल, गेहूं और दालों के उत्पादन की प्रगति और दो समयावधि की तुलना की गई है। गणना की समयावधि पिछले 15 वर्षों (2004 से 2018) और पिछले 8 वर्षों (2011 से 2018) की है। तालिका में स्पष्ट है कि न तो एपीएमसी, ना ही सब्सिडी और ना ही ‘पक्षपात पूर्ण व्यवहार’ पंजाब और हरियाणा को उत्पादन की उच्च प्रगति दर प्रदान करा सका है। चाहे किसी भी फसल की बात करें या किसी भी समयावधि का अध्ययन ले लें, जो परिणाम आता है वह भ्रामक नीतियों का दुखद प्रतिबिंब ही है। दोनों समयावधियों के दौरान गेहूं के उत्पादन के क्षेत्र में अन्य राज्यों की प्रगति की दर, पंजाब और हरियाणा में हुए गेहूं के उत्पादन की प्रगति दर की दोगुनी से भी अधिक रही। ठीक ऐसा ही दालों के उत्पादन (2011 से 2018 के मध्य पंजाब और हरियाणा में दालों के उत्पादन का प्रगति दर 0.4 प्रतिशत प्रति वर्ष रहा जबकि अन्य 10 राज्यों में इसकी दर 5.7 प्रतिशत प्रति वर्ष रहा) के क्षेत्र में भी देखने को मिलता है। चावल उत्पादन के क्षेत्र में भी अन्य राज्यों ने पंजाब और हरियाणा से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। भले ही इस क्षेत्र में प्रगति आधिक्य पंजाब और हरियाणा में हुए उत्पादन का दोगुना नहीं रहा फिर भी वर्ष 2004 से 2018 के बीच यह फर्क (पंजाब और हरियाणा में प्रगति की दर 2 प्रतिशत रही जबकि 9 अन्य राज्यों में यह 3.7 प्रतिशत) लगभग दोगुने का रहा।

उक्त सारे तथ्य सभी को भली भांति पता हैं और इन पर बहुत चारी चर्चा भी प्रबुद्ध जनों के द्वारा दशकों से की जाती रही है। इतना होने का बावजूद अनेक प्रबुद्ध जनों के द्वारा किसानों के आंदोलन की तरफदारी के लिए दिखाई जा रहा बौद्धिक कलाबाजियां अत्यधिक आश्चर्य पैदा करती हैं। बुद्धिजीवियों की यह ‘मांग’ कि कृषि कानूनों को पारित कराए जाने से पहले इस पर चर्चा कराई जानी चाहिए थी, परम्परागत बेईमानी की सीमा से परे है। 
 

- सुरजीत भल्ला

(इस लेख का प्रिंट संस्करण पहली बार 12 दिसंबर 2020 को ‘सोशलिज्म फॉर रिच फारमर्स’ शीर्षक के तहत प्रकाशित हुआ था। भल्ला, आईएमएफ के कार्यकारी निदेशक हैं जहां वे भारत, श्रीलंका, बांग्लादेश और भूटान का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस लेख में प्रदर्शित विचार लेखक के निजी हैं और ये विचार आईएमएफ, इसके कार्यकारी बोर्ड अथवा आईएमएफ मैनेजमेंट के भी हों, ये आवश्यक नहीं है।)

साभारः इंडियन एक्सप्रेस