मुद्रास्फीति से मुकाबले के लिए संगठित हों किसान

क्या खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कागजी वायदों के सिवाय कुछ ठोस उपायों के बारे में सोच सकती है? हमारा मानना है कि अमूल की तर्ज पर किसानों को कोऑपरेटिव और कंपनियों के रूप संगठित किया जाना चाहिए और इन एजेंसियों के जरिए व्यवस्थित रीटेल बनाया जाना चाहिए।

प्राय: मुद्रास्फीति से निपटने के लिए सरकार फाइलें खोलती है और कुछ कागजी कार्रवाई करती है। इसके बाद कर्ज की उपलब्धता में कमी की जाती है, निर्यात पर रोक लगाई जाती है, आयात के नियमों में ढील दी जाती है और मल्टी-ब्रान्ड रीटेल के दरवाजे विदेशी निवेश के लिए खोलने की जरूरत को लेकर बहस शुरू हो जाती है। इस तरह के कदम उठाना व्यर्थ नहीं है, लेकिन ये ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए हैं।

पिछले अनुभव से यह बात साफ हो जाती है। हालांकि, अधिकारियों के वश में सिर्फ इतना ही करना है। राजनीतिज्ञ वह काम कर सकते हैं और उन्हें करना चाहिए जो सरकारी अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र से परे है। आर्थिक वृद्धि की तेज रफ्तार के साथ आय में बढ़ोतरी और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को वित्तीय सेवाओं के दायरे में लाने की सरकार की कोशिशों के चलते गरीब लोगों की क्रय क्षमता बढ़ जाती है।

इसके चलते खाद्य और गैर-खाद्य कृषि उत्पादों की कीमतें चढ़ती हैं। बढ़ती मांग को पूरी करने के लिए सप्लाई में सुधार करने के लिए कोई ठोस नीति दिखाई नहीं देती। अभी तक सरकार अलग-अलग फसलों की न्यूनतम समर्थन कीमतों में (एमएसपी) में इजाफा करने का उपाय अपनाती रही है। इससे सिर्फ बोई जाने वाली फसल का रकबा और खेती के लिए किसान की पसंद बदल जाती है। इसके चलते उन फसलों की सप्लाई बढ़ जाती है, जिनकी कीमतें ऊपर गई होती हैं और उन फसलों की आपूर्ति घट जाती है, जिनकी कीमतें नहीं बढ़ी होती। यह पर्याप्त नहीं है।

कृषि उत्पादकता बढ़ाने और कुल कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए दूसरी हरित क्रांति की जरूरत है। सिर्फ कागजी कार्रवाई से यह काम पूरा नहीं होगा। पंजाब और हरियाणा के बाद दूसरे राज्यों में भी कृषि में पूंजी का इस्तेमाल करना होगा। किसानों को व्यापक स्तर पर उत्पादन और आपसी सहयोग के फायदों के लिए संगठित करना पड़ेगा। किसानों को कोऑपरेटिव और कंपनियां बनाने के लिए आपस में सहयोग करने की जरूरत है। इससे एक तरफ जहां वे देश में शहरीकरण की प्रक्रिया में हिस्सेदार बन सकेंगे वही दूसरी तरफ वे कृषि और उपभोक्ताओं के बीच बनाई गई सप्लाई चेन का फायदा उठा सकेंगे। आपूर्ति तंत्र में सुधार के लिए कई नए वर्गीज कुरियन को आगे आने की जरूरत है। क्या कोई इस चुनौती को स्वीकार कर सकता है?

- इकोनोमिक टाइम्स