शिवानंद द्विवेदी

एक्सपर्ट कॉर्नर - शिवानंद दिवेदी

शिवानंद द्विवेदी

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वैश्विक स्तर पर उभरे कोविड-19 संकट की चुनौतियों से देश दो तरफा जूझ रहा है। शहरी आबादी के सामने कोविड से बचाव व पलायन की वजह से पैदा हो रही परिस्थिति से निपटने की चुनौती है, वहीँ दूसरी तरफ ग्रामीण भारत के सामने आजीविका के सुरक्षा का सवाल है। भारत की बड़ी आबादी गांवों में रहती है तथा उसकी आजीविका निर्भरता भी श्रम संबंधी उपक्रमों पर टिकी है। ऐसे में जब लॉक डाउन की वजह से श्रम के अवसर कम हो गये हैं, तब शहरों के साथ-साथ गांवों में आजीविका और नकदी का संकट पैदा होना स्वाभाविक है। यह संकट लॉक डाउन की स्थिति में आम जन के धैर्य व भरोसे को भी डिगा सकता है...
Published on 29 Apr 2020 - 18:48
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत की चुनाव प्रणाली आज बहस के केंद्र में है। सत्ताधारी दल भाजपा के साथ-साथ अनेक दलों, संस्थाओं और बुद्धिजीवियों का मानना है कि देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों, इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। हालांकि एकसाथ चुनाव कराने के विचार से असहमति रखने वाले दलों की भी कोई कमी नहीं है। कांग्रेस सहित अनेक दल- जैसे तृणमूल कांग्रेस, बसपा, टीडीपी और कम्युनिस्ट पार्टी, ने एक साथ चुनाव कराने से असहमति व्यक्त की है। इस बहस में सहमति और असहमति के पाटों पर खड़े दो खेमों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन यह बहस आज के दौर...
Published on 6 Sep 2018 - 13:13
एक प्रश्न है कि किसी भी व्यक्ति के सशक्त होने का व्यवहारिक मानदंड क्या है? इस सवाल के जवाब में व्यवहारिकता के सर्वाधिक करीब उत्तर नजर आता है- आर्थिक मजबूती. व्यक्ति आर्थिक तौर पर जितना सम्पन्न होता है, समाज के बीच उतने ही सशक्त रूप में आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। निश्चित तौर पर आर्थिक मजबूती के लिए अर्थ को अर्जित करना ही पड़ता है। भारतीय अर्थ परम्परा में धर्म और अर्थ को परस्पर पूरक तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए महर्षि चाणक्य ने भी कहा है- धर्मस्य मूलम अर्थम्। यानी, धर्म के मूल में अर्थ अनिवार्य तत्व है। ऐसी स्थिति में...
Published on 30 Dec 2017 - 17:39

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