देश में उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने की जरूरत

विश्व को भारत में संभावनाएं दिखाई दे रही है। वो हमारे देश को बाजार की तरह देखते हैं। उन्हें यहां 1 अरब से अधिक खरीददार दिखाई देते हैं। जहां वे अपने उत्पादों को बेच सकते हैं। हमारी मानवीय संपदा विश्व के लिए आकर्षण का केंद्र है। यही कारण है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे देश में व्यवसाय के लिए आ रही है। उन्हें, यहां बेहतर आर्थिक भविष्य की संभावनाएं दिखती हैं। जबकि हम सवा सौ करोड़ लोग पूरी दुनिया के लिए उत्पादन करने में सक्षम हैं। आगे आने वाले समय में भारत को बाजार नहीं, उत्पादक देश बनना है। इसके लिए हमें अपने युवा शक्ति में भरपूर संभावनाएं दिखती हैं।

यह अपने आप में रोचक तथ्य है कि हमारे देश में नए उद्यमी, जिन्हें हम आन्ट्रप्रन्योर कहते हैं, उनके बारे में कोई सुनियोजित रिकॉर्ड नहीं है, जिससे इनके विकास और अर्थव्यवस्था में योगदान का ठीक-ठीक पता चल सके। एक अनुमान के अनुसार लगभग 0.09 प्रतिशत की दर से सालाना बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है, जिसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। फिर भी देश में ऐसे युवाओं की कमी नहीं जिन्होंने अपने बलबूते छोटे निवेश से अपने कारोबार शुरू किए और उसे बड़े आर्थिक संस्थानों में बदल दिया। जहां हजारों बेरोजगारों को नौकरी मिली, साथ ही देश के आर्थिक विकास और उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई।

हमारे लिए यह कोई कठीन काम नहीं है। विश्व का शायद ही कोई देश हो, जहां भारतीय बौद्धिकता का उपयोग न हो रहा हो। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय युवा प्रतिभाएं रीढ़ की हड्डी की तरह हैं। लेकिन क्या कारण है कि हमारे देश में सभी संसाधन होते हुए भी हम अपने देश में नए उद्यमियों के लिए अवसर पैदा नहीं कर सकते। जिससे प्रतिभाशाली युवाओं को मजबूरी में देश के बाहर जाना पड़ता है। नई सोच, नए विचार यहां अंकुरित नहीं हो पाते। उन्हें यहां पनपने और विकसित होने का मौका नहीं मिलता। जबकि नए विचारों का स्वागत होना चाहिए, उन्हें उभरने का मौका देना चाहिए। जिससे उनकी बौद्धिकता का लाभ देश के विकास के लिए उपयोगी साबित हो सके।

देश के अंदर जो भी नए उद्यमी हैं, वो उनका अपना प्रयास और संघर्ष का परिणाम है। जबकि सिस्टम ऐसा होना चाहिए कि वो नए उद्यमियों को प्रोत्साहित करे, उन्हें हरसंभव मदद करे। हाल के दिनों में उद्योग जगत ने युवाओं की नई सोच को निखारने और उन्हें उभरने का मौका दिया है। आन्ट्रप्रनर्शिप के अन्तर्गत प्रतिभावान युवाओं को खुला माहौल उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे वे नई संभावनाओं को तलाश कर उसे साकार रूप दे सके। इसके सुखद परिणाम भी सामने आ रहे हैं, और अर्थव्यवस्था को फायदा भी मिल रहा है।

जबकि हकीकत यह है कि देश के आकार और जनसंख्या के हिसाब से यहां करोड़ों प्रतिभाएं है। लेकिन उस  हिसाब से यह पहल बहुत छोटी है। कारण है कि सरकार की तरफ से अभी तक आन्ट्रप्रनर्शिप को लेकर कोई सुनियोजित योजना तैयार नहीं की जा सकी है। जबकि आज की जरूरत है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में तत्काल बदलाव किए जाए, जिससे उन युवाओं को प्रोत्साहित किया जा सके जो अपने व्यवसायिक संस्थान शुरू करना चाहते हैं । जबकि आज हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी है कि शिक्षण संस्थाओं में युवाओं को नौकरी के लिए शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाता रहा है। शिक्षण संस्थानों में युवाओं को नौकरी खोजने के लिए नहीं, बल्कि नौकरी पैदा करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। जिससे देश के संसाधनों का उचित इस्तेमाल किया जा सके।

आमतौर पर आन्ट्रप्रनर्शिप को केवल बिजनेस से ही जोड़कर देखा जाता है। जबकि इसकी जरूरत हर क्षेत्र में है। आज हमारे पास नए विचारों के साथ प्रशिक्षित लोग हैं, जो अपनी सोच को साकार करने के प्रति कृतसंकल्प हैं। समस्याओं के बीच संभावनाओं को तलाशते लोगों को अगर मौका दिया जाए तो वो असंभव को संभव करने की ताकत रखते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सांस्कृति विस्तार, समाजसेवा सहित अनेक ऐसे कार्यक्षेत्र हैं जहां युवाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया ।

हमारे देश में निजी क्षेत्र ने आन्ट्रप्रनर्शिप को प्रोत्साहित करने की ओर कदम बढ़ाया है। कई बड़ी कंपनियों ने वेंचर कैपिटल के जरिए आन्ट्रप्रन्योर को आगे बढ़ाने की पहल की है। साथ ही शोध के जरिए नए विचारों को मौका दिया जा रहा है। इसका सबसे बेहतरीन परिणाम सॉफ्टवेयर और ऑटो मोबाइल के क्षेत्र में देखा जा सकता है।

अगर हम 2013 के केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय की रिपोर्ट को देखे तो औसत भारतीय की सालाना प्रति व्यक्ति आय 53,331 रुपए है। यह 15.6 प्रतिशत की दर से सालाना बढ़ रहा है, लेकिन अगर हम अपनी सालाना आय की विश्व के अन्य देशों से तुलना करें तो हमारा स्थान 127वां है। जोकि बहुत उत्साह जनक नहीं कहा जा सकता। लेकिन हम इसे सकारात्मक नजरिए से देखे तो यह हमारे लिए एक मौका है, जब हम तेजी से विकास के लिए योजनाबद्ध तरीके से पहल कर सकते हैं। प्रतिभावान युवाओं को आगे कर हम चहुंमुखी विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ सकते हैं। 

ऐसे में हम समझ सकते हैं कि नए उद्यमियों की भूमिका कितनी अहम् हो गई है। इसके लिए हमें पारंपरिक व्यवसाय के साथ-साथ गांवों की ओर भी देखना होगा। ऐसा देखा गया है कि हस्तशिल्प और स्थानीय कलाएं बेहतरीन होते हुए भी बाजार तक नहीं पहुंच पाती, और इनके उत्पादन से जुड़े लोगों को सही दाम नहीं मिल पाता। जबकि बिना किसी योजनाबद्ध सरकारी सहायता के ये उद्योग धंधे आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हैण्डलूम, पावरलूम, सिल्क, हस्तकला आदि पारंपरिक उद्योग अपनी खास पहचान रखते हैं, इन्हें संरक्षण और प्रशिक्षण की जरूरत है।

एक अनुमान के अनुसार केवल आईटी सेक्टर में ही 8,000 से अधिक नई कंपनियों की जरूरत है, जिससे लगभग 4,35,000 करोड़ रुपए का व्यवसाय किया जा सकेगा। अगले 10 वर्षों में  लगभग 11 करोड़ भारतीयों को नौकरी की जरूरत होगी। जिसमें से 8 से 10 करोड़ ऐसे युवा होंगे, जो अपनी पहली नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहे होंगे।

हमारे देश की युवा प्रतिभाएं विषयों की गहरी समझ रखती है। उसे बिजनस मॉडल के जरिए दुनिया के सामने लाने की जरूरत है। आन्ट्रप्रनर्शिप के लिए एक दशक की योजना बनाने की जरूरत है। जिससे निवेश, लाभ और खरीददारों की समझ को बेहतर ढ़ंग से समझा जा सके। और देश के विकास को एक नई गति मिल सके।

 

- डा. केडी सिंह (लेखक राज्य सभा के सदस्य हैं)