और लूट जारी है...

मनरेगा को लेकर कैग ने जो कुछ कहा है वह वाकई चौंकाने वाला है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक इस स्कीम में 13 हजार करोड़ रूपए की धांधली हुई है और इसका लाभ भी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच सका है। यूपीए सरकार अपनी उपलब्धियों में इसे सबसे उपर रखती है। कुछ समय पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसकी जमकर तारीफ की थी और कहा था कि इससे दूसरी हरित क्रांति आ सकती है। जाहिर है, कैग की इस रिपोर्ट से यूपीए सरकार को धक्का लगेगा। वह यह कहकर अपना बचाव करने की कोशिश करेगी कि इस स्कीम को अमल में लाने की वास्तविक जवाबदेही राज्य सरकारों की है, मगर कैग की रिपोर्ट में केंद्र की भी आलोचना की गई है।

कैग के मुताबिक मार्च 2011 में इसके तहत करीब 1960.45 करोड़ रुपए निकाले गए, जिसका कोई हिसाब नहीं है। चौदह राज्यों में सवा चार लाख फर्जी जॉब कार्ड्स पाए गए। कैग का कहना है कि मनरेगा से छोटे राज्यों को लाभ हुआ है, लेकिन बड़े राज्य जैसे असम, गुजरात, बिहार, यूपी, कर्नाटक, बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों को कोई खास फायदा नहीं हुआ है। देश के 46 फीसदी गरीब यूपी, महाराष्ट्र और बिहार में हैं, लेकिन सिर्फ 20 फीसदी फंड का ही लाभ इन लोगों को मिल सका है।

कैग की पिछली कुछ रिपोर्टे विवाद में रही हैं और उन्हें लेकर राजनीतिक रस्साकशी भी होती है। संभव है इस रिपोर्ट को लेकर भी विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश करे। लेकिन सवाल यह है कि क्या मनरेगा की असफलता केवल यूपीए सरकार की असफलता है? भ्रष्टाचार के खिलाफ केंद्र सरकार को लगातार घेरने वाली बीजेपी ने आखिर उन राज्यों में मनरेगा को बेहतर ढंग से अमल में लाने के लिए क्या किया, जहां उसकी सरकार है? सच कहा जाए तो कैग की रिपोर्ट देश की नौकरशाही को और कहीं न कहीं समाज को भी एक्सपोज करती हैं। सरकारें चाहे किसी की भी हों, वे नौकरशाही के चरित्र को बदलने में नाकामयाब रही हैं। राजनीतिक सत्ता बदलती रहती है पर उपर से नीचे तक फैले बाबुओं के तंत्र को कोई फर्क नहीं पड़ता। जब तब उनके चेहरे तो बदलते रहते हैं लेकिन उनकी चाल नहीं बदलती।

निचले स्तर पर सरकारी कर्मचारियों, छुटभैये नेताओं, ठेकेदारों और दलालों का एक गठजोड़ सरकारी योजनाओं की लूट में लगा रहता है। मनरेगा तो उसके लिए एक दुधारू गाय साबित हुई है। इसमें ग्राम पंचायत से लेकर जिला प्रशासन तक संसाधनों की बंदरबाट में लगा रहता है। अपने लोगों को लाभ पहुंचाने का यह योजना एक जरिया बन चुकी है। नतीजा यह है कि गरीबों को अब इसके माध्यम से मिलने वाले रोजगार में कमी आ रही है। यानी इसका जो असल मकसद था, वह पूरा नहीं हो पा रहा है। साफ है कि हमारा तंत्र बेशर्मी से गरीबों का हक छीन रहा है। यह हमारे लिए व्यापक चिंता का विषय होना चाहिए। नौकरशाही को सुधारे बगैर और उसमें जड़ जमा चुकी लूट संस्कृति पर रोक लगाए बगैर किसी भी सरकारी स्कीम का कामयाब होना मुमकिन नहीं।

 

- अविनाश चंद्र

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