चुनाव सुधार के लिये कड़े निर्णय ज़रूरी

सरकार ने चुनाव सुधार पर एक और कमेटी बना दी है. इस खबर से न कोई हैरानी होती है, न किसी के मन में डर पैदा होता है ना ही कोई आस बंधती है. लोक और तंत्र के बीच गहराते फ़ासले को कागजी रपटों से पाटने की कई कवायद पहले भी हो चुकी हैं.

इस नयी कवायद में फ़िलहाल ऐसा कुछ नहीं है, जिससे कुछ नया होने की कोई उम्मीद हो. समिति में एक-दो समझदार विधि विशेषज्ञ जरूर हैं, लेकिन चुनावी राजनीति केवल कानूनी सवाल नहीं हैं. समिति में एक भी शख्स ऐसा नहीं, जिसने खुद चुनाव लड़ा हो या जिसे चुनावी राजनीति की कोई समझ हो. इन सब के बावजूद इस समिति की कारगुजारी पर एक नजर रखने की जरूरत है.

चुनाव सुधार पर चर्चा का मिजाज भले ही न बदला हो, उसका संदर्भ जरूर बदला है. पिछले कुछ वर्षो से देश में लोकतांत्रिक सुधारों के लिए प्रतिबद्ध नागरिकों का एक आंदोलन बन रहा है.  यह आंदोलन कभी-कभी राजनीतिक द्वेष की बीमारी का शिकार हो जाता है. फ़िर भी कुल मिलाकर इनके प्रयास  से लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्थक बदलाव की गुंजाइश बढ़ी है.

पिछले कुछ समय से राहुल गांधी ने युवा कांग्रेस में खुले आंतरिक चुनाव की प्रक्रिया चलायी है. पिछले हफ्ते यह घोषणा भी की है कि इन संगठनों के शीर्ष पदों के लिए मनोनयन की कांग्रेसी रवायत की जगह खुले चुनाव होंगे. सरकार द्वारा इस समिति के गठन को भी इसी संदर्भ में देखने की जरूरत है.

वैसे तो इस समिति ने अपने एजेंडा में वो सब विषय शामिल किये हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए. मसलन, चुनावों में धन और बल का बढ़ता असर, राजनैतिक दलों को मर्यादित करने की जरूरत, चुनाव में राजकीय कोष, चुनावी प्रक्रिया को ज्यादा सुचारु बनाना, चुनावी विवादों का बेहतर निपटारा, दल-बदल विरोधी कानून को बेहतर बनाना. लेकिन पिछले दो दशक से चुनावी सुधारों की कवायद इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द हो रही है.

चुनाव में पैसे के सवाल को ही लें. हर कोई यह मान कर चलता है कि राजनीति में असली समस्या काले धन के असर को रोकना है. इसलिए सारा ध्यान काले धन पर पाबंदी लगाने वाले कानूनों पर रहता है. अगर ये कानून असरदार हो पायें तो जरूर कुछ फ़ायदा होगा. लेकिन काले धन को रोकना सिर्फ़ चुनावी कानूनों और चुनाव आयोग के बस की बात नहीं है. यह मामला पूरी आर्थिक व्यवस्था को बदलने का है.

आशा करनी चाहिए कि यह नयी समिति इस सवाल पर नयी दृष्टि से गौर करेगी. चुनाव व्यवस्था में सुधार करने वालों को कम से कम यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके सद्प्रयासों से हालात पहले से बदतर न हो जायें.

-योगेन्द्र यादव