सार्थक पहल की जरूरत

चुनाव सुधारों पर छिड़ी राष्ट्रव्यापी बहस के बीच मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी ने लोकसभा व विधानसभाओं का कार्यकाल चार साल करने का सुझाव देकर नया सुर छेड़ दिया है। कुरैशी ने पांच साल के कार्यकाल को घटाकर चार साल करने के पीछे कोई व्यावहारिक तर्क पेश नहीं किया है।

देश में लंबे समय से चुनाव सुधारों को लेकर बहस चल रही है। मतदाताओं को 'राइट टु रिजेक्ट' या 'राइट टु रिकॉल' का अधिकार देने का मामला हो या अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने का मामला हो या निर्धारित सीमा से अधिक धन खर्च करने वाले प्रत्याशियों को रोकने का मामला, बात बहस से आगे बढ़ ही नहीं पा रही। हर राजनीतिक दल साफ छवि के प्रत्याशियों को टिकट देने की बात तो करता है, लेकिन मौका जब टिकट बांटने का आता है, तो राजनीतिक दल साफ छवि की बजाय 'जिताऊ' उम्मीदवार पर दांव लगाने से नहीं चूकते।

यानी कथनी कुछ और करनी कुछ। देश में राजनीति के गिरते स्तर का मुख्य कारण ऎसे लोगों का राजनीति में आना है, जो राजनीति को समाज सेवा के मुकाबले व्यवसाय समझते हैं। ऎसे राजनेताओं के लिए न तो विचारधारा का कोई महत्व होता है और न सिद्धांतों की राजनीति उनके लिए कोई मायने रखती है। अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के मामले में निर्वाचन आयोग भी लाचार ही जान पड़ता है। यही हाल चुनाव खर्च को लेकर है। प्रत्याशी बेतहाशा धन खर्च करते हैं, लेकिन आज तक किसी जनप्रतिनिधि का निर्वाचन इस वजह से रद्द नहीं हो पाया।

दलबदल रोकने के लिए कानून तो बना, लेकिन फिर भी आज धड़ल्ले से दलबदल हो रहा है। सबको समझना होगा, महज बातों से चुनाव सुधार नहीं हो सकते। संगीन आरोपों से घिरे व्यक्ति यदि संसद तक पहुंच रहे हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? वे राजनीतिक दल, जो इन्हें प्रत्याशी बनाते हैं या वे मतदाता, जो उन्हें चुनते हैं। कुरैशी संसद-विधानसभाओं का कार्यकाल घटाने की बजाय आपराधिक छवि वाले प्रत्याशियों को रोकने तथा चुनाव खर्चे को लेकर गंभीरता दिखाएं, तो शायद राजनीति की गिरती छवि सुधर सकती है।

ऎसा होना असंभव नहीं, लेकिन इसके लिए सार्थक पहल की जरूरत है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त तो देश में अनेक लोग हुए हैं, लेकिन इस पद पर रहते हुए जो नाम टी.एन. शेषन ने कमाया, दूसरा कोई शायद ही उसके आस-पास तक पहुंच पाया हो। कुरैशी भी चुनाव सुधार के इच्छुक हैं, तो उन्हें बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देकर सरकार और राजनीतिक दलों को इसके लिए तैयार करना होगा। जरूरत है आगे आकर सार्थक पहल करने की।

- साभार: राजस्थान पत्रिका