सार्वजनिक नीति - लेख

उत्कृष्ट शिक्षा के माधयम से पहुंच में सुधार

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की अति महत्वपूर्ण परियोजना का नाम स्कूल चयन अभियान है और इसे वर्ष 2007 में आरंभ किया गया था। यह ऐसा अभियान है जिसमें वर्तमान भारत के स्कूली शिक्षा पध्दति में बहुत ही जरूरी सुधार किए जाएंगे और इसके लिए शिक्षा प्रमाणकों, नियामक सुधारों और प्रोत्साहक शिक्षा जिज्ञासुओं की त्रि-भुजा पहुंच का प्रयोग किया जाएगा।

40 प्रतिशत भारतवासी अशिक्षित हैं, और सरकारी स्कूल भारत के बच्चों की जरूरतों पर खरे नहीं उतरते। नागरिक समाज केन्द्र गुण सुधार, विशेषकर गरीबों के लिए शिक्षा की पहुंच पर प्रकाश डालता है। नीति निर्धारकों, शिक्षा विशेषज्ञों और आम कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर स्कूली चयन अभियान हमारा ध्यान दाखिले के अवरोधों को हटाने और शिक्षा प्राप्त करने वालों को प्रोत्साहित में केन्द्रित करता है और स्कूलों और कॉलेजों को लाभप्रद बनाते हुए विधि और विस्तार की गुंजाइश और शिक्षा प्रमाणकों के माधयम से प्रतिस्पर्धाओं की ओर आगे बढ़ता है।

अधिक जानकारी के लिये देखें: स्कूल चयन अभियान

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भारत के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर भले ही निचला हो, लेकिन यहं के सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों के वेतन पर चीन और जापान के मुकाबले भारत ज्यादा खर्च कर रहा है। भारत के 9 राज्यों (यूपी, झारखंड, राजस्थान, पंजाब, तमिलनाडु, कर्नाटक, मिजोरम, छत्तीसगढ़) में सकल घरेलू उत्पाद का 3.0 फीसदी खर्च शिक्षकों के वेतन पर हो रहा है, जबकि शिक्षकों के वेतन पर अन्य एशियाई देश कई गुना कम खर्च कर रहे हैं।

हाल ही में इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में एजुकेशन इकोनॉमिक्स एंड

बहुत पुरानी बात है। गंगा तट पर बसी काशी नगरी को तब भी व्यापार, कला और कारीगरी के क्षेत्र में उत्कृष्ट मुकाम हासिल था। नगर से थोड़ी दूरी पर जुलाहों का एक दल निवास करता था। जुलाहों का मुख्य पेशा बांस की टोकरी आदि बनाना था। आमतौर पर उनके मकान कच्चे थे और बांस, मिट्टी और खपरैल आदि के ही बने थे। उनमें से सिर्फ दो-एक मकान ऐसे थे जो पक्के थे। इन पक्के मकानों में से एक मकान वृद्ध रामदीन का था। दरअसल, रामदीन अन्य जुलाहों की तरह बांस की टोकरी इत्यादि बनाने के स्थान पर रेशम के वस्त्र बनाया करता था। उसके बनाए हुए वस्त्रों की एक अलग खासियत थी। वस्त्र

शिक्षा का अधिकार क़ानून-२००९ लागू होने के बाद यह उम्मीद जताई गयी कि यह क़ानून प्राथमिक स्तर पर देश के गरीब से गरीब बच्चे की शिक्षा को सुनिश्चित करेगा। लेकिन अपने पेंचीदा प्रावधानों की वजह से आज यह क़ानून ही सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है। इससे पहले की हम शिक्षा के अधिकार क़ानून की खामियों पर बात करें, हमे इस बात पर गौर करना होगा कि कोई भी क़ानून लाने का उद्देश्य क्या होता है? बुनियादी समझ की बात है कि क़ानून हमेशा अव्यवस्था को समाप्त कर व्यस्थित ढंग से किसी भी प्रणाली को संचालित करने के लिए लाया जाता है। लेकिन अगर वो क़ानून ही अपनी पेंचीदिगियों

- प्राइवेट अनएडेड स्कूलों ने सरकार पर लगाए सरकारी और निजी स्कूलों में भेदभाव करने का आरोप
- आरटीई की खामियों के कारण बंदी की मार झेल रहे देशभर के स्कूलों ने जंतर मंतर पर किया प्रदर्शन
- प्रधानमंत्री मोदी से पांच लाख अध्यापकों के रोजगार व 3 करोड़ छात्रों के भविष्य को बचाने की गुहार

केंद्र व राज्य सरकारों पर सरकारी और निजी स्कूलों के बीच भेदभाव करने और गैर सहायता प्राप्त स्कूलों को बंद करने की साजिश का आरोप लगाते हुए देशभर के प्राइवेट अनएडेड स्कूल संगठनों ने बुधवार को जंतर मंतर पर

यूपी के 3 हजार स्कूल को बंद करने की साजिश, 'नीसा' ने शिक्षा विभाग पर लगाया आरोप 
 
नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एलायंस (नीसा) ने प्रदेश के शिक्षा महकमे पर 'राइट टू एजूकेशन' को आधार बनाकर राजधानी के 108 स्कूलों को बंद करने की साजिश का आरोप लगाया है। नीसा के पदाधिकारियों ने बताया कि विभाग लो बजट प्राइवेट स्कूलों से स्थाई मान्यता के लिए ऐसी शर्तें पूरी करने का दबाव बना रहा है, जो पूरी नहीं की जा सकती। इससे राजधानी के अलावा प्रदेश के तीन हजार स्कूल बंद हो सकते हैं। राइट टू
- राजधानी में जुटे देशभर के निजी 'बजट' स्कूल संचालक, गिनाई आरटीई की विसंगतियां
 
नई दिल्ली। देशभर के निजी स्कूल असोसिएशनों का मानना है कि शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत स्कूल फीस भरने में असमर्थ आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को दाखिला देने के ऐवज में स्कूलों को फंड दिए जाने की बजाए यदि इसे सीधे छात्रों को दिया जाए तो योजना अधिक प्रभावी साबित होगी। असोशिएशन के प्रतिनिधियों के मुताबिक फंड सीधे छात्रों को दिए जाने से न केवल शिक्षा की
एक समय था जब मैं विश्वास करता था कि मैं एक वैश्विक नागरिक हूं और इस पर गर्व अनुभव करता था कि घास की एक पत्ती बहुत कुछ दूसरी पत्ती की तरह ही होती है। लेकिन अब मैं पाता हूं कि इस धरती पर घास की प्रत्येक पत्ती का अपना एक विशिष्ट स्थान है, जहां से वह अपना जीवन और ताकत पाती है। ऐसे ही किसी भी व्यक्ति की जड़ उस जमीन में होती है जहां से वह अपने जीवन और उससे संबंधित धारणा-विश्वास को अर्जित करता है। जब कोई अपने अतीत की तलाश करता है तो उन जड़ों को मजबूत करने में मदद मिलती है और खुद में आत्मविश्वास आता है। इतिहास
- वार्षिक 'स्कूल च्वाइस नेशनल कांफ्रेस 2014' के दौरान शिक्षा में चयन और तकनीकि के प्रयोग पर हुई चर्चा
 
- शोध और नीतियों के बीच अंर्तसंबंधों पर भी दिया गया जोर
 
नई दिल्ली। जाने माने पत्रकार व स्तंभकार स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर ने कहा है कि स्कूलों में यदि मातृभाषा के माध्यम

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