सही उपचार का इंतजार

प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्रालय का कामकाज छोड़ दिया है और इसके साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वह अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकें। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स की खराब रेटिंग के बाद एक और रेटिंग एजेंसी फिच द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाम को लेकर जब नकारात्मक रेटिंग दी गई तो इसे लेकर काफी हो-हल्ला मचा और केंद्र सरकार ने यह कहकर बचाव किया कि यह तात्कालिक नजरिये का परिणाम है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधारभूत ढांचा काफी मजबूत है और भारत उच्च विकास दर की पटरी पर वापस लौट आएगा, जैसा कि वर्ष 2008 की मंदी के बाद हुआ था। कहने का आशय यही था ये रेटिंग एजेंसियां भारत को लेकर किसी न किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं।

इस बीच एक और रेटिंग एजेंसी मूडी के सकारात्मक रुख से भी इस बात को बल मिला है, लेकिन यहां विचार करने की आवश्यकता है कि ये रेटिंग एजेंसियां किसके लिए काम करती हैं-भारत सरकार या फिर अपने ग्राहकों के लिए। निश्चित ही इन्हें भारत सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि वे जो भी रिपोर्ट तैयार करती हैं उनका एक निर्धारित अंतरराष्ट्रीय मानदंड होता है, जो पूरी दुनिया में निवेश करने वाले ऐसे निवेशकों के लिए होता है जो उनके ग्राहक होते हैं। अब यहां सवाल है कि यदि ये गलत रिपोर्ट पेश करेंगी तो इससे नुकसान किसका होगा? नुकसान उन निवेशकों का जो इनके ग्राहक हैं। इसलिए यह कतई संभव नहीं है कि ये रेटिंग एजेंसियां किसी पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर काम करें, क्योंकि ऐसा करने में खुद उसी का नुकसान है। यहां एक और पहलू पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि ये एजेंसियां एक लंबे समय से काम कर रही हैं और इनकी पूरी दुनिया में अपनी एक अलग साख है। इसलिए इन एजेंसियों को गलत बताना किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं, क्योंकि इससे तो निवेशकों में भारत के प्रति अविश्वास और बढ़ेगा। यहां हमें इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि यही एजेंसियां अभी तक भारत को निवेशयोग्य बेहतर देशों की सूची में रख रही थीं? आखिर तब उन पर भरोसा क्यों किया जाता था? जाहिर है कि सरकार अपनी कमजोरियों और कमियों को दूर करने के बजाय उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली तर्ज पर चल रही है और स्थिति को संभालने के बजाय अवसरों को गंवा रही है।

भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी अब किसी से छिपी नहीं है। अप्रैल तिमाही में हमारी जीडीपी घटकर 5.3 प्रतिशत पर पहुंच गई तो औद्योगिक विकास दर महज 0.1 प्रतिशत है। डॉलर की तुलना में रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और बीते एक साल में यह तकरीबन 25 प्रतिशत तक कमजोर हुआ है। यदि हालात पर काबू पाने के लिए बड़े आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम नहीं उठाए जाते तो शीघ्र ही डॉलर के सामने रुपये का विनिमय मूल्य 60 तक पहुंच जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। रुपये की गिरती कीमत को रोकने के लिए जो घोषणाएं हुईं वे नाकाफी हैं। समझ में नहीं आता कि जब सरकार के हाथ बंधे हुए हैं और उसमें ईमानदार इच्छाशक्ति का अभाव है तो उसने ऐसे संकेत देने की कोशिश ही क्यों की कि मानो अब सब कुछ बदल जाएगा? जी-20 से लौटने के बाद प्रधानमंत्री ने भी कुछ ऐसे ही संकेत दिए, लेकिन अंत में सरकार ने अपनी तरफ से कोई घोषणा करने के बजाय गेंद रिजर्व बैंक के पाले में डाल दी और तमाम उम्मीदों के बावजूद रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में न तो कटौती की और न ही इसके कोई संकेत दिए। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि वर्तमान में विकास दर की तुलना में महंगाई बढ़ने की दर कहीं ज्यादा है। महंगाई बढ़ने का मुख्य कारण आपूर्ति पक्ष से जुड़ा हुआ है इसलिए रिजर्व बैंक महज मौद्रिक नीतियों से इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता। रिजर्व बैंक आपूर्ति पक्ष में सुधार लाने के साथ-साथ बढ़ते राजकोषीय घाटे को कम करने, सरकारी खचरें में कमी लाने की बात सरकार से कह रहा है और जब तक सरकार ऐसा नहीं करती है तब तक न तो महंगाई कम होगी और न ही रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटाने वाला है।

अब सरकारी बांड में विदेशी निवेशकों को 20 अरब डॉलर निवेश करने की छूट दी गई है, जो कि पहले से महज 5 अरब डॉलर ज्यादा है। मेरे विचार से इसे कम से कम 30 अरब डॉलर किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत में विकास दर धीमी होने की वजह उपभोक्ताओं की तरफ से मांग में कमी आना नहीं है और न ही ऐसा है कि यहां निवेश की मांग कम है। दरअसल निवेशकों को यह विश्वास नहीं हो पा रहा है कि उन्हें पर्याप्त लाभ मिल पाएगा। इसके लिए जरूरी है कि सरकार टैक्स सुधारों समेत लंबित आर्थिक सुधारों की दिशा में कदम उठाए, देश के प्रति बन रहे नकारात्मक माहौल को दूर करे, विदेशी निवेशकों समेत घरेलू निवेशकों को प्रोत्साहित करने वाले कदम उठाए। यहां यदि वोडाफोन मामले को ही लें तो सरकार इसकी टैक्स देनदारियों को 1962 से तय करने की बात कह रही है। इस तरह की नीतियां प्राकृतिक सिद्धांतों के खिलाफ हैं, जिस कारण विदेशी निवेशकों में भारत के प्रति अविश्वास बढ़ रहा है। इस तरह की नीतियां भारत की विकासपरक छवि को तोड़ती हैं और उसे पुराने समाजवादी प्रतिबंधों वाले युग में ले जाती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री द्वारा वित्तमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद इस नीति पर पुनर्विचार किया जाएगा। सौभाग्य से इसके संकेत भी नजर आए हैं।

यदि यह नीति जारी रहती है तो विदेशी निवेशकों में भारत के प्रति एक तरह का डर बैठेगा। सवाल यही है कि क्या प्रधानमंत्री सरकार के पहले के कामकाज के तरीके में बदलाव लाएंगे या फिर सब कुछ वैसा ही चलता रहेगा? ऐसा इसलिए, क्योंकि माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री और प्रणब मुखर्जी के बीच आर्थिक नीतियों को लेकर कुछ मतभेद थे। अब यूरोजोन संकट की बात को भी बंद किया जाना चाहिए, क्योंकि भारत की समस्या उससे पहले की है। वास्तविकता यही है कि भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार की नीतियों का लाभ संप्रग-1 सरकार को मिला और संप्रग-1 सरकार की सब्सिडी और समावेशी विकास की नीतियों का दुष्परिणाम संप्रग-2 सरकार में ताजा आर्थिक संकट के रूप में दिख रहा है। इसीलिए अभी तक मनमोहन सिंह सरकार की कोई खास उपलब्धि नहीं रही है।

- लार्ड मेघनाद देसाई
साभारः दैनिक जागरण