दुनिया का भरोसा खोने के हालात

एक दशक भी नहीं हुआ है जब उत्साही निवेश विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक भारत की तरक्की के गीत गा रहे थे। वे कहते थे भारत में इतनी क्षमता है कि अगले दो दशकों में यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगा। इसके लिए उन्होंने स्प्रेडशीट मॉडल्स का उपयोग किया। इसमें उन्होंने 8 से 10 फीसदी प्रतिवर्ष की वृद्धि दर डाली और अगले 30 साल का अनुमान निकाला। उन्होंने एमबीए स्कूलों में सीखा था कि कैसे ऐतिहासिक दरों के आधार पर पूर्वानुमान लगाते हैं। जाहिर है, कोई भी चीज जो 10 फीसदी की चक्रवृद्धि दर से बढ़ रही हो, 30 साल में महाकाय हो जाएगी (ठीक-ठीक कहें तो 17.4 गुना)।

वित्तीय संस्थानों के ग्राहक भारत को चमत्कारों की भूमि दिखाने वाली ऐसी गुलाबी तस्वीर से ललचा गए। 1-2 फीसदी की गति से बढ़ रही यूरोप की उबाऊ अर्थव्यवस्था में भारतीय अर्थव्यवस्था वाला तड़का नहीं था। भारत में अरबों डॉलर खिंचे चले आएं और अचानक हुई धन की इस बरसात से कुछ आर्थिक तरक्की भी हो गई। तब की सरकार ने इसका पूरा श्रेय लेने में देर नहीं की। सरकारी प्रवक्ता गाहे-बगाहे कहता रहता था, 'हमने आर्थिक तरक्की कर दिखाई।' जश्न शुरू हो चुका था।

गुलाबी तस्वीर बताने वाले आर्थिक विश्लेषक पुरस्कृत हुए। उन्हें एशिया के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री होने का तमगा मिला। वे साल के अंत में तगड़े बोनस से नवाजे गए। विलय और अधिग्रहण कराने वाले युवा बैंकरों ने मुंबई में रेसकोर्स या समुद्र के नजारे वाले बेशकीमती अपार्टमेंट ख्ररीद डाले। जाहिर है इन रेसकोर्स-व्यू या सी-व्यू अपार्टमेंट के नजदीक पडऩे वाली झुग्गी बस्तियों की उन्होंने अनदेखी कर दी। इस सब में बेचैन करने वाले कुछ सवाल कभी पूछे ही नहीं गए।

मसलन, क्या सरकार कारोबार व आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने वाला माहौल देने के लिए प्रतिबद्ध है? क्या भारतीय राजतंत्र नई पूंजीवादी प्रणाली को स्वीकार करने के लिए तैयार है? हम समाजवादी हैं या बाजार से चलने वाली अर्थव्यवस्था? हर पावर प्लांट या नई सड़क या खनन के लिए मंजूरी लेने में बरसों लग जाते हैं, इसके बावजूद क्या हम इतनी तेजी से आर्थिक तरक्की कर सकते हैं? क्या हमारी कर प्रणाली और नियम-कायदे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के अनुरूप हैं? क्या हमारे पास ऐसी कुशल श्रम शक्ति है जो औसत आमदनी को अगले ३० साल में 17 गुना बढ़ा देगी? क्या हमारे आधारभूत ढांचे की हालत अच्छी है?

नहीं, नहीं, नहीं। जब जश्न चल रहा हो तो आप ऐसे प्रश्न नहीं पूछते। तब आप उस पड़ोस वाले अंकल की तरह नजर आते हैं जो अच्छी-भली चल रही पार्टी में घुस आते हैं और म्यूजिक कम करने को कहते हैं। यह स्प्रेडशीट कहती है कि हमारी तरक्की होगी, तो होगी। इसे गलत बताने वाले सारे ईष्र्यालु हैं, कयामत की बातें करने वाले हैं, जिनसे भारत की तरक्की देखी नहीं जाती। ऐसी विशाल तरक्की के लिए जरूरी मूलभूत चीजें न होने के कारण बाहर से आने वाले पैसे का तरक्की से ज्यादा संबंध नहीं था। यह सही है कि कुछ परियोजनाएं जरूर साकार हुईं। तरक्की के शोर से जो मांग बढ़ी थी उसके कारण आने वाली कंपनियों की चीजें बिक भी गईं। लेकिन जल्दी ही गुब्बारे की हवा निकल गई।

सरकार ने जरूर आर्थिक वृद्धि के इस अस्थायी दौर का इस्तेमाल अपनी मिनी-पार्टी में किया। साल-दर-साल बजट में आमदनी बढ़ती नजर आई पर खर्च उससे ज्यादा बढ़ा। वादा यह था कि अगले साल खर्च घटाएंगे पर यह कभी हुआ ही नहीं। सरकार ने अपनी पार्टी में पैसा लगाने के लिए इतना कर्ज लिया  कि निजी क्षेत्र को पैसा उधार लेने के लिए 15 फीसदी तक का ब्याज देना पड़ा। सरकार ने इतने नोट छाप डाले कि बाजार में बाढ़ आ गई और रुपए की खरीद क्षमता कम होती गई। जब परदे के पीछे यह सब चल रहा था तो आंकड़े तरक्की बता रहे थे। इसलिए सबकुछ माफ कर दिया गया। समाचार माध्यमों के बजट विश्लेषण में वित्तमंत्री के कपड़ों की नफासत और भाषण में उद्धृत शेर-ओ-शायरी शामिल होती। 17 गुना आर्थिक वृद्धि होने वाली है बाकी तो सिर्फ औपचारिकता है। हर कोई खुशफहमी की इस जन्नत में मस्त था।

जल्द ही वास्तविकता सामने आने लगी। फायदा न मिलने से विदेशी निवेशकों ने हाथ खींच लिया। स्थानीय निवेशकों ने भी पैसा निकाल लिया। आर्थिक वृद्धि दर धीमी हो गई। सरकार ने मीडिया, विपक्ष, विदेशियों और मध्यवर्ग तक को इसका दोषी ठहरा दिया। सरकार ने खर्च और बढ़ा दिया। इस तरह कर्ज महंगा हो गया तथा महंगाई और भी बढ़ी।

एक दिन पार्टी बंद हो गई। लोगों को लगा कि अरे, यह तो गुब्बारा था। स्प्रेडशीट जोड़-घटाव करती हैं, अनुमान नहीं लगातीं। वास्तविकता कोई माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल का फॉर्मूला नहीं है। एक समाजवादी देश को रातोंरात बाजार से संचालित अर्थव्यवस्था में नहीं बदला जा सकता। एक भ्रष्ट देश दुनिया में प्रतिस्पद्र्धा नहीं कर सकता। एक विभाजित आबादी तेजी से कोई फैसला नहीं ले सकती। एक साल निवेशकों का स्वागत कर अगले साल उन्हें धोखा नहीं दिया जा सकता।

सरकार कहे न कहे पर हम आर्थिक संकट में फंसे हैं। अगले दो साल में कई कंपनियां बंद होती नजर आएंगी, बड़े पैमाने पर छंटनी होगी और महंगाई व बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ेगी। हम इससे बच नहीं सकते। सरकार राहत के कदम उठाने की बजाय पेट्रोल पम्प जल्दी बंद करने, किफायत बरतने की निरर्थक मुहिम चलाने और खपत पर नियंत्रण लगाने जैसे प्रतीकवादी कदमों की बातें कर रही है। देश को चलाने का आधारभूत तरीका बदलने की जरूरत है और इस बदलाव को निवेशकों के साथ आम जनता तक पहुंचाना होगा। इसकी बजाय सरकार सत्ता में बने रहने के लिए लोकलुभावन राजनीति करने में व्यस्त है। आर्थिक हालात तो बुरे हैं ही, हम उससे भी खराब स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं-भरोसा खोने के संकट की ओर।

कुछ साल पहले जो आर्थिक विश्लेषक भारत की विरुदावली पढ़ रहे थे, अब अपने निवेशकों को बता रहे हैं कि कैसे भारत व इसकी बे-भरोसे की शासन व्यवस्था से पल्ला झाड़ लें। यदि दुनिया ने भारत में भरोसा खो दिया तो इसे हासिल करने में फिर बरसों लग जाएंगे। 30 साल में 17 गुना तरक्की तो छोडि़ए, ठीक-ठाक वृद्धि दर बनाए रखना भी कठिन हो जाएगा। या तो सरकार भरोसा कायम करने के लिए व्यापक या आधारभूत बदलाव लाए या जितनी जल्दी हो सके चुनाव करवा लें ताकि फोकस राजनीति से हटकर अर्थव्यवस्था पर आ जाए। वरना पूरी पीढ़ी का भविष्य दांव पर लगा है। और हां अगली बार समुद्र के नजारे के साथ झुग्गी के नजारे की अनदेखी न करें।

 

चेतन भगत (प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार)

साभारः दैनिक भास्कर