बड़े सुधार नहीं होने से शेयर मार्केट में निराशा

यदि किसी असाधारण उत्प्रेरक की संभावना को छोड़ दें तो मई महीने में शेयर बाजार में अक्सर सुस्ती देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए पिछले साल बड़े बड़े रिफार्म का वादा कर सत्ता के करीब पहुंच रही मोदी सरकार से बाजार ने बड़ी उम्मीदें लगाई थीं। परिणाम स्वरुप शेयर बाजार में जबरदस्त उछाल देखने को मिला था। किंतु सरकार के कार्यकाल के एक साल पूरा होने को है लेकिन अबतक कोई बड़ा रिफार्म धरातल पर उतरता दिखाई नहीं दे रहा है। इसके अलावा घरेलू स्तर पर मानसून ही एक ट्रिगर होता है जो बाजार को सांत्वना देता है। लेकिन अल नीनो इफेक्ट के कारण इस वर्ष मानसून के औसत से कम रहने की भविष्यवाणी भी बाजार की मुश्किलों को बढ़ाने का काम कर रही है। इसके अलावा विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के चीन और वियतनाम का रुख करने से भी बाजार पर विपरीत असर पड़ा है।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक एफआईआई ने पिछले एक पखवाड़े में लगभग 13 हजार करोड़ रुपए की बिकवाली की है। 6 मई को भी एफआईआई ने करीब 1700 करोड़ रूपए की बिकवाली की थी तब सेंसेक्स 723 अंक टूटा था। इसके अतिरिक्त कंपनियों की कमजोर आय, सुधारों का धीमा क्रियान्वयन, छह महीने में कच्चे तेल की कीमतों में 40 फीसदी उछाल, ग्रीस के डिफॉल्ट होने की आशंका, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की तरफ से ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रूपये में कमजोरी, बेमौसम बारिश के कारण बर्बाद हुई रूरल इकोनॉमी ने भी बाजार के माहौल को बिगाड़ने का काम किया है।

बाजार की गतिविधियां आमतौर पर पांच अव्यवों पर निर्भर करती हैं; आय, जोश, पूर्वानूमान, अर्थव्यवस्था और वैश्विक हलचल। इस प्रकार भारतीय शेयर बाजार में गिरावट के प्रमुख कारण:

 

प्रतिकूल वैश्विक परिस्थितियां

अमेरिकी और यूरोपीय के बाजारों में बिकवाली से भारतीय बाजार में दबाव की स्थिति देखने को मिल रही है। अमेरिका में मंगलवार को आए कमजोर आर्थिक आंकड़ों से डाओ जोंस में बड़ी गिरावट दर्ज हुई थी। ग्रीस कर्ज संकट ने भी बाजारों पर भारी दबाव बनाया है। बेलआउट को लेकर बातचीत किसी नतीजे पर पहुंचती नहीं दिख रही है। आईएमएफ और यूरोपियन यूनियन के बीच इस संकट के बादल छंटते दिखाई नहीं दे रहे हैं।

क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों में उछाल आने से भी बाजार में भारी गिरावट है। कीमतों में तेजी आने से निवेशकों का रुझान फिर से कमोडिटी की ओर बढ़ने लगा है,जिसका असर वैश्विक शेयर बाजारों पर देखने को मिल रह है।

सरकार के फैसलों से विदेशी निवेशकों में निराशा

मोदी सरकार के कदमों से विदेशी संस्थागत निवेशकों का माहौल लगातार खराब हो रहा है। पहले मैट का विवाद अब वित्त विधेयक में टैक्स की परिभाषा बदलने से कंपनियों पर निगेटिव सेंटिमेंट बनना तय है।

संसद में प्रमुख विधेयक लटके

बाजार विश्लेशकों का मानना है कि संसद सत्र खत्म हो जाने के बाद बाजार को ड्राइव करने के लिए पॉजिटिव ट्रिगर मौजूद नहीं है। सरकार ने जीएसटी बिल को विपक्ष के विरोध के बावजूद लोकसभा से पारित करा लिया है लिहाजा बाजार पर अब इसका भी असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। लैंड एक्युजिशन बिल पर सरकार और विपक्ष की तनातनी ने भी असमंजस पैदा किया है।

 

- अविनाश चंद्र