आर्थिक स्वतंत्रता लाती है खुशहाली

कनाडा के  फ्रेजर इंस्टीट्यूट और नई दिल्ली स्थित सेंटर फार सिविल सोसायटी द्वारा पिछले दिनों जारी की गई विश्व आर्थिक स्वतंत्रता : वार्षिक रपट 2012 दुनिया भर में आर्थिक स्वतंत्रता की स्थिति  के बारे में रपट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।ईमानदारी से जीवन यापन करने के लिए बिना किसी अनावश्यक दखल के उत्पादन और व्यापार करने की स्वतंत्रता ही आर्थिक स्वतंत्रता का सार है।इसके अंतर्गत आते हैं संपत्ति रखने,उसका उपयोग करने और बेचने का अधिकार ,विवादों का समुचित और शीघ्र समाधान करने और अनुबंधों को लागू करने का अधिकार और जीवन और संपत्ति की संपूर्ण सुरक्षा ताकि हर कोई सुरक्षित और शांति पूर्ण तरीके से अपनी जीविका चला सके। यह रपट इस बात की गणना करती है देश की नीतियां और संस्थाएं किस मात्रा में आर्थिक स्वतंत्रता का समर्थन करती हैं।

दुनियाभर सें राजनीतिक और सामाजित स्वतंत्रता पर तो काफी विचार किया गया है लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता पर काफी कम ध्यान दिया गया जबकि आर्थिक स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।  कर् वर्षों से हर वर्ष प्रकाशित होनेवाली यह रपट इस महत्वपूर्ण कमी को पूरा करने की कोशिश है। इस वर्ष आर्थिक स्वतंत्रता रपट के मुताबिक दुनियाभर में विश्व आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में थोड़ी सी वृद्धि हुई और वह  2010 में 6.83 रही।2009 में वह तीन दशक में सबसे कम स्तर पर यानी 6.79 पर पहुंच गया था। इस रपट के मुताबिक    में भारत 144 देशों में 111 वे स्थान पर रहा है। भारत पिछले वर्ष भी 103 वे स्थान पर था। भारत की कुल रेटिंग 6.26 रही इस तरह से वह चीन,बांग्लादेश,तंजानिया और नेपाल से पीछे रहा।

अमेरिकी और यूरोपीय देशों के ऋण संकट के मद्देनजर  विश्वभर के देशों ने कठोर रेगुलेशन बनाए और बड़े पैमाने पर खर्च किया है। इसके कारण तात्कालिक तौरपर आर्थिक स्वतंत्रता कम हुई है और दीर्घकालिक दृष्टि से समृद्धि घटी है।लेकिन इस वर्ष विश्वभर में आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में थोड़ी सी वृद्दि होना उत्साहवर्धक है।

विश्व की आर्थिक स्वतंत्रता रपट को हर वर्ष कनाड़ा के प्रमुख लोक नीति थिंक टैंक फ्रेजर इंस्टीट्यूट द्वारा 90 देशों और क्षेत्रों के स्वतंत्र इंस्टीट्यूटों के सहयोग से तैयार किया जाता है। इस वार्षिक रपट को इकानामिक फ्रीडम नेटवर्क के सहयोग से प्रकाशित किया गया है।यह 90देशों और क्षेत्रों के स्वतंत्र शोध और शैक्षणिक संस्थाओं का समूह है।रपट 2012 को जेम्स वार्टने,फ्लोरिडास्टेट यूनिवर्सिटी,ए लासन, सदर्न मेथोडिस्ट कालेज और बेलियाट कालेज ने तैयार किया है।इस के प्रकाशन में 144 देशों को अनुक्रमित किया गया ।इन देशों में 2010 में दुनिया की 95 प्रतिशत आबादी रहती है।

दुनिया के जिन 144 देशों का सर्वे किया गया उनमें हांगकांग फिर अव्वल रहा। उसके बाद सिंगापुर,न्यूजीलैंड,स्विटजरलैंड,आस्ट्रैलिया और कनाड़ा का स्थान रहा। बड़े औद्योगिक देशों में अमेरिका को लंबे समय से आर्थिक स्वतंत्रता का चैंपियन माना जाता रहा है।इस वर्ष उसका स्थान बहुत नीचे गिर गया है।

विश्व आर्थिक स्वतंत्रता रपट आर्थिक स्वतंत्रता का प्रमुख पैमाना है जिसे 42 कारकों के आधार पर तैयार किया गया है ताकि आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देनेवाली नीतियों के आधार पर विश्वभर के देशों का एक अनुक्रम तैयार किया जा सके। आर्थिक स्वतंत्रता के आधारस्तंभ हैं व्यक्तिगत चुनाव,स्वैच्छिक विनिमय,प्रतियोगिता की स्वतंत्रता,निजी संपत्ति की सुरक्षा।इसके आधार पर आर्थिक स्वतंत्रता को नापने के लिए एक आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक भी विकसित किया गया  है।

जिन 144 अधिकार क्षेत्रों में गणना की गई उनमें वेनेजुएला में आर्थिक स्वतंत्रता का स्तर सबसे कम म्यांमार,जिम्बाब्वे रिपब्लिक आफ कांगो और अंगोला सबसे नीचे रहे।

पिछले दशक के दौरान कुछ वर्षों में आए बदलावों के कारण उनके क्रम को समायोजित करने पर कुछ अफ्रिकी देशों और पूर्व साम्यवादी देशों में आर्थिक स्वतंत्रता में सबसे ज्यादा वृद्धि दिखाई दी।

शोध से स्पष्ट होता है कि उच्च स्तर की आर्थिक स्वतंत्रतावाले देशों में रहनेवाले लोग ज्यादा समृद्ध है ,उन्हें ज्यादा राजनीतिक और नागरिक स्वतंत्रताएं हासिल हैं। उनकी जीवन की संभाव्यता भी ज्यादा है। दुख की बात यह है कि सबसे नीचे के देशों में ,जीवन की गुणवत्ता बहुत निम्न स्तर की है।समृद्धि कम और विकास के अवसर सीमित हैं।

रपट ने इस बात पर गौर किया है कि अनुक्रम में उच्च स्थान पर स्थित देशों में सबसे गरीब 10 प्रतिशत लोगों की आय 11382 डालरहै जबकि  कम आर्थिक स्वतंत्रतावाले देशों में उनकी आय 1209 डालर है।औसतन सबसे अधिक आर्थिक स्वंतंत्रता वाले देशों में सबसे गरीब 10प्रतिशत लोग कम आर्थिक स्वतंत्रतावाले देशों की औसत आबादी की तुलना में  लगभग दोगुने अमीर हैं ।यह इस बात का प्रतीक है कि आर्थिक स्वतंत्रतावाले देशों में भले ही असमानता हो लेकिन वहां लोगों का जीवन काफी खुशहाल है,जीवन स्तर काफी ऊंचा है। जबकि जिन  देशों में आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है वहां असमानता भी है और सामान्य जनता गरीब है उसका जीवन स्तर बहुत निम्न स्तर का है।

क्या आर्थिक स्वतंत्रता का उपयोग केवल अमीरों के लिए है ? इसकी जरूरत उनके लिए ज्यादा है जो समाज के सबसे ज्यादा निम्न आर्थिक वर्ग में गिने जाते हैं।एक गरीब फेरीवाले बड़ा मुक्त उद्यम का हिमायती कोई हो नहीं सकता।आर्थिक स्वतंत्रता के साथ विभिन्ना लाइसेंसों और निरर्थक कानूनों को हटाना भी जुड़ा है जिनके दायरे में लोग जीते हैं स्वतंत्रता के अभाव और अत्याधिक नियंत्रण से गरीब लोग ही सबसे ज्यादा कुप्रभावित होते हैं। अमीर लोग तो सरकारी नियंत्रण के बावजूद भी अपना रास्ता निकाल लेते हैं जबकि गरीबों के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं हैं।

-सतीश पेडणेकर