ग्रामीण गरीब और प्राकृतिक संसाधनों में संपत्ति का अधिकार

ग्रामीण भारत में जल और जंगल दो सबसे ज्यादा मूल्यवान संसाधन हैं। लेकिन ये संसाधन इन इलाकों में रहने वाले लोगों के हाथ में नहीं हैं। ये राज्य के हाथ में हैं और राज्य ही इनका प्रबंधन करता है। जल और जंगल ग्रामीण समुदायों की बजाए देश की संपत्ति है। ये राष्ट्रीयकृत संसाधन हैं। इस राष्ट्रीयकरण ने ग्रामीणों को उनके बहुमूल्य आर्थिक संसाधन से वंचित कर दिया है। यह एक ऐतिहासिक अन्याय है। 
 
शहरी जमीन भी कभी जंगल से ढकी हुई थी। जंगलों को काट कर इस जमीन को कृषि, आवासीय या व्यापारिक उपयोग में लाया गया। जिन्होंने जंगलों को काट दिया, उन्हें नई जमीन पर संपत्ति का अधिकार दे दिया गया। शहरी जमीन कमोबेश पूर्णतः निजी आर्थिक संसाधन के रूप में तब्दील हो चुकी है।
 
लेकिन कुछ लोगों ने अपने पेशे और उपयोग में आने वाले क्षेत्र के जंगलों को नहीं काटा और जंगल ही बने रहने दिया। अंग्रेजी शासकों ने लकड़ियों की मांग पूरी करने के लिए इनमें से ज्यादातर जंगलों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। आजादी मिलने के बाद सी नीति को जारी रखा गया। जमीन के स्वामित्व की प्रक्रिया, जिसका शहरी इलाकों में अनुपालन किया गया है, उसे वनवासियों को देने से इंकार किया जा रहा है। जिन वनवासियों ने जंगलों को ज्यौं का त्यौं रखा, अब उन्हें जंगल न काटने की सजा मिल रही है। वे जंगलों का रखरखाव करते हैं, लेकिन अब उनका इनपर कोई अधिकार नहीं। यही नहीं, बल्कि उन्हें अतिक्रमणकारी की उपाधि तक दे दी गई है। न्याय तो इसी में है कि जंगलों और उसके आसपास रहने वालों को इन जंगलों पर संपत्ति का अधिकार दिया जाए। 
 
यही तर्क जल संसाधनों पर भी लागू होता है। जो लोग इनका पारंपरिक तौर पर उपयोग और प्रबंध करते रहे हैं और जो लोग इन जल स्त्रोतों के ईर्द गिर्द रह रहे हैं, उनका इन संसाधनों पर मालिकाना हक होना चाहिए। ये स्थानीय समुदाय हमारे जंगलों और जल संसाधनों के सबसे अच्छे रक्षक होंगे। जैसा कि जिम्बाब्वे के "कैंप फायर प्रोग्राम", नेपाल में "सामुदायिक वानिकी" और कुछ हद तक भारत के "संयुक्त वन प्रबंधन" से साफ है कि वे समुदाय, जिनका दीर्घकालिक आर्थिक हित होता है, वे इन तथाकथित वन रक्षकों - राज्य की कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में बैठे सरकारी नुमाइंदों - से ज्यादा अच्छा का करते हैं।
 
सामुदायिक मिल्कीयत और प्रबंधन से दो समस्याएं क साथ हल हो जाती हैः वन और जल संसाधनों की सुरक्षा और देश के निर्धनतम समुदायों के जीवनयापन की सम्मानजनक व्यवस्था। वे जल और जंगल की प्राकृतिक पूंजी से ही अपने भविष्य का निर्माण कर लेंगे। सबसे अच्छा और उचित समाधान तो यही है कि सभी जल संसाधनों और जंगलों को राज्य के हाथ से निकालकर स्थानीय समुदायों के हाथों में सौंप दिया जाए।
 
गौरतलब है कि जंगलों और वन्य जीवों की सुरक्षा की बात सबसे पहले शहरी शिक्षित वर्ग द्वारा उठाई गई है, परंतु इसकी सुरक्षा का खामियाजा वनवासियों को उठाना पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें उन क्षेत्रों से बाहर निकलने को मजबूर किया जा रहा है, जिन्हें राष्ट्रीय उद्यान या अभ्यारण्य घोषित किया गया है। उनके विस्थापन को शायद ही कभी उजागर किया जाता है। कितनी बार आपने किसी गैर सरकारी संगठन या नामी हस्तियों को इन वनवासियों को बेदखल करने के विरुद्ध खड़े होते देखा है? या बेदखल करने से पहले कम से कम स्थानांतरण और पुनर्वास सुनिश्चित करने का मुद्दा उठाते पाया है? पर्यावरण सुरक्षा के विस्थापितों को कभी समुचित सहानुभूति और मदद नहीं मिली। विकास से होने वाले विस्थापन की बात करने वाले तो अनेक मिल जाएंगे। यह ठीक है, परंतु पर्यावरण सुरक्षा से पैदा होने वाले विस्थापितों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों? यह तो सीधे-सीधे ढोंग है, जो पर्यावरण संबंधी परियोजनाओं से प्रभावित ग्रामीण लोगों के जायज अधिकार की उपेक्षा करता है।
 
यहां प्रस्तावित सामुदायिक मिल्कीयत का दृष्टिकोण निजीकरण की उस अवधारणा से काफी भिन्न है, जिसमें सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को जंगल और नदियां नीलाम कर दी जाती हैं। अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने एक नदी का कई किलोमीटर लंबा हिस्सा एक निजी कंपनी को लीज पर दे दिया। जिसने इस नदी के किनारे बसे लोगों को बगैर अनुमति अथवा मूल्य का भुगतान किए बिना नदी के पानी का उपभोग करने से रोक दिया। इस लीज की मान्यता है कि यह नदी सरकार की है, जिसे वह किसी को भी बेच सकती है। जबकि हकीकत में यह नदी इसके तट पर बसे लोगों और पारंपरिक तौर पर इसके पानी का उपयोग करने वाले लोगों की है। इसे इन्हीं लोगों को वापस लौटाया जाना चाहिए, न कि किसी निजी पार्टी को।
 
अगर ग्रामीण गरीबों के संपत्ति के अधिकार और आर्थिक स्वतंत्रता को पूरी तरह से मान्यता दी जाय, तो वे सरकार या अंतर्राष्ट्रीय अनुदान एजेंसियों से कोई दान लिए बगैर अपना भला कर लेंगे। तभी वे सम्मान और समृद्धि के साथ अपना जीवन जीने में सक्षम हो सकते हैं।
 
- डा. पार्थ जे शाह ("आर्थिक स्वतंत्रता; एक विस्मृत मानवाधिकार" से उद्धृत)