भारत में प्राइवेट स्कूल खोलने और चलाने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता

● स्कूल स्थापित करने और चलाने के लिए आवश्यक मौजूदा कठोर नियमोँ को जितनी जल्दी हो सके आसान किया जाना चाहिए
● शिक्षा के क्षेत्र में नव प्रवेशियों के लिए सरकार को ‘स्कूल खोलने और चलाने की सुगमता’ रैंकिंग अभियान की शुरूआत करनी चाहिए और स्कूलों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त करने के नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव करना चाहिए

नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में व्यवसाय शुरू करने हेतु सहूलियत देने के महत्व को समझा है और इस दिशा में उपाय भी किए हैं। विश्व बैंक की रैंकिंग में अपना स्थान ऊपर लाने के लिए वर्ष 2015 से लेकर अब तक सुधारोँ की पूरी श्रृंखला चलाई गई। पिछ्ले तीन वर्षोँ में देश की रैंकिग 142 से बढ़कर 100 तक पहुंच जाना सरकार के उन्हीँ प्रयासोँ का एक नमूना भर है।

इससे अधिक नहीं तो कम से कम इसी तरह की पहल जल्द से जल्द शिक्षा के क्षेत्र में भी करने की जरूरत है जिसके तहत प्राइवेट, गैर सहायता प्राप्त स्कूलोँ को खोलने और चलाने के नियमोँ को भी आसान बनाने की जरूरत है। कुछ लोग इसे शिक्षा के व्यावसायीकरण का नाम भी दे सकते हैं, लेकिन प्राइवेट स्कूलोँ को खोलने और संचालन सम्बंधी कड़े नियमोँ में बदलाव लाकर इन्हेँ आसान बनाने की जरूरत इससे भी कहीँ अधिक महत्वपूर्ण है। भारत में मध्यमवर्ग का दायरा बढ़ रहा है, लाखोँ बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ रहे हैं और प्राइवेट स्कूलोँ में दाखिला ले रहे हैं। समय बढ़ने के साथ यह ट्रेंड और भी मजबूत होगा क्योंकि अधिक से अधिक माता-पिता आर्थिक रूप से सक्षम हो रहे हैं और अपने बच्चोँ की बेहतर शिक्षा के लिए प्राइवेट स्कूलोँ का खर्च वहन कर सकते हैं।

यद्यपि, शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई एक्ट) लागू होने के बाद से स्कूल खोलना और उसे चलाने की सहूलियत मिलना किसी सपने जैसा रह गया है।

स्वराज्य के डिजिटल और प्रिंट पेजेज, दोनोँ पर ही इस लेखक ने काफी विस्तार से लेख लिख कर आरटीई एक्ट की खामियोँ को उजागर किया है। हम हमेशा से इस बात की आलोचना करते रहे हैं कि इस एक्ट के दायरे से अल्पसंख्यक स्कूलोँ को दूर रखा गया है; महत्वपूर्ण प्रावधान जैसे कि सेक्शन 12 जिसके अनुसार प्राइवेट गैर सहायता प्राप्त, गैर-अल्पसंख्यक स्कूलोँ के लिए अपनी 25% सीटेँ पिछ्ड़े और गरीब बच्चोँ के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य है। सेक्शन 13 जो कि बच्चोँ को दाखिला देने के लिए किसी भी प्रकार की जांच पर रोक लगाता है; सेक्शन 16 जो कि बच्चे के प्रदर्शन और उसकी लर्निंग क्षमता को नजरअंदाज करते हुए उसे अगली कक्षा में प्रमोट करना अनिवार्य बनाता है, आदि।

यद्यपि, इस एक्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू ऐसा भी है जिसमेँ स्कूल की मान्यता के लिए सबसे आवश्यक प्रक्रिया स्क्रूटनी की मौलिक जरूरत को नजरांदाज किया गया है। इस सम्बंध में नियम और बाध्यताएँ सेक्शन 18 और 19 में शामिल हैं।

यह एक्ट कहता है कि कोई भी प्राइवेट स्कूल उपयुक्त सरकारी अथॉरिटी से मान्यता सर्टिफिकेट हासिल किए बिना नही चल सकता है, जिसके लिए कुछ निश्चित अनिवार्यताएँ, तय मानकोँ के हिसाब से पूरी करना आवश्यक है जैसा कि ‘मॉडल रूल्स अंडर द राइट ऑफ चिल्ड्रेन टू फ्री एंड कम्पल्सरी एजुकेशन एक्ट, 2009’ की नियम संख्या 11 और 12 में निश्चित किया गया है।

आखिर, वे कौन से नियम हैं जो इस सूची में तय किए गए हैं? पहला, कक्षा 1 से लेकर 8 तक कक्षा में बच्चोँ की संख्या के हिसाब से कुछ निश्चित अनुपात में शिक्षकोँ का होना अनिवार्य है। दूसरा, भवन सम्बंधी जरूरतेँ (किचन, खेल का मैदान, कक्षाओँ की संख्या आदि)। तीसरा, साल में न्यूनतम कार्य-दिवसोँ की संख्या। चौथा, शिक्षकोँ के लिए प्रति सप्ताह न्यूनतम कार्य घंटे। पांचवाँ, शिक्षा सम्बंधी सुविधाओँ की हर कक्षा में उपलब्धता। छठाँ, लाइब्रेरी। सातवाँ, खेलने के सामान, गेम और स्पोर्ट्स के उपकरण।

मॉडल रूल के नियम 11 और 12 क्या कहते हैं? ऊपर दिए गए सभी नियमोँ के पालन के बाद हर स्कूल को एक फॉर्म 1 भरना होता है, जिसमेँ यह उद्घोषणा होती है:
1
. स्कूल का संचालन सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 (1860 का 21वाँ) के तहत रजिस्टर्ड सोसायटी द्वारा किया जा रहा है अथवा किसी भी कानून के तहत पंजीकृत पब्लिक ट्रस्ट इसे संचालित कर रहा है।
2. स्कूल किसी भी व्यक्ति, समूह, व्यक्तियों के संगठन अथवा किसी अन्य के लिए लाभ अर्जित करने के लिये किया जाने वाला कार्य नहीं है। 
3. स्कूल यह स्वीकार करता है कि वह संविधान में तय मूल्योँ का पालन करेगा।
4. स्कूल के भवन अथवा इसकी संरचना अथवा ग्राउंड का इस्तेमाल शिक्षा और कौशल विकास के अलावा और किसी कार्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
5. स्कूल राज्य सरकार अथवा स्थानीय अथॉरिटी द्वारा निश्चित किसी भी अधिकारी द्वारा जांच के लिए हर समय उपलब्ध रहेगा।
6. स्कूल समय-समय पर ऐसी रिपोर्ट और सूचनाएँ तैयार रखेगा जिनकी जरूरत डायरेक्टरेट ऑफ एजुकेशन/ डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर को होगी और इसमेँ राज्य सरकार/ स्थानीय अथॉरिटी द्वारा दिए गए निर्देशोँ का पूरा पालन होना चाहिए। इसके आधार पर राज्य सरकार अथवा स्थानीय प्राधिकरण स्कूल को चलाने की मान्यता को बरकरार रख सकत है अथवा उसे रद्द भी कर सकता है।
इसके अलावा फॉर्म 1 में विवरणोँ के 8 अन्य टेबल भी भरने होते हैं, जैसे कि:

नामांकन की स्थिति

  कक्षा वर्गों की संख्या छात्रों की संख्या
1. प्री-प्राइमरी    
2. 1 से 5    
3. 6 से 8    

भौतिक संरचना का विवरण और स्वच्छता की स्थिति

  कमरे संख्या आकार (औसतन)
1. कक्षा के कमरे    
2. ऑफिस रूम-सह-स्टोर रूम-सह-हेडमास्टर रूम    
3. किचन-सह-स्टोर    

अन्य सुविधाएं

1. क्या सभी सुविधाएं तक पहुंच बाधा रहित हैं  
2. पठन पाठन सामग्री (सूची संलग्न)  
3. खेल कूद के उपकरण (सूची संलग्न)  
4.

पुस्तकालय में पुस्तकों की सुविधा

  • पुस्तकें (संख्या)
  • पत्र/पत्रिकाएं
 
5. पेय जल की सुविधा और प्रकार  
6. स्वच्छता की स्थिति  
  1) मूत्रालय और शौचालय की संख्या  
  2) बालकों के लिए अलग मूत्रालयों/शौचालयों की संख्या  
  3) बालिकाओं के लिए अलग मूत्रालयों/शौचालयों की संख्या  

शैक्षणिक कर्मचारियों से जुड़े विवरण

1. प्राइमरी/अपर प्राइमरी कक्षा में शिक्षण (सभी शिक्षकों के विवरण अलग अलग)

  शिक्षक का नाम

        (1)

पिता/पति का नाम

          (2)

जन्मतिथि

    (3)

  शैक्षणिक योग्यता

       (4)

व्यावसायिक योग्यता

          (5)

शिक्षण अनुभव

       (6)

            कक्षा में नियुक्ति

          (7)

नियुक्ति की तिथि

          (8)

प्रशिक्षित अथवा अप्रशिक्षित

           (9)

2. प्राथमिक और माध्यमिक दोनों कक्षाओं में शिक्षण (प्रत्येक शिक्षक की जानकारी अलग अलग विस्तार से)

               शिक्षक का नाम
        (1)
पिता/पति का नाम
          (2)
जन्मतिथि
    (3)
  शैक्षणिक योग्यता
       (4)
व्यावसायिक योग्यता
          (5)
शिक्षण अनुभव
       (6)
  कक्षा में नियुक्ति
          (7)
नियुक्ति की तिथि
          (8)
प्रशिक्षित अथवा अप्रशिक्षित
           (9)

3. प्रधान अध्यापक

  शिक्षक का नाम
        (1)
पिता/पति का नाम
          (2)
जन्मतिथि
    (3)
  शैक्षणिक योग्यता
       (4)
व्यावसायिक योग्यता
          (5)
शिक्षण अनुभव
       (6)
  कक्षा में नियुक्ति
          (7)
नियुक्ति की तिथि
          (8)
प्रशिक्षित अथवा अप्रशिक्षित
           (9)

इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) एक इंस्पेक्शन करता है और यह सुनिश्चित करता है कि सभी आवश्यक जरूरतोँ को पूरा किया गया है या नहीं, इसके बाद ही वह स्कूल को मान्यता सम्बंधी सर्टिफिकेट जारी करता है। हालांकि, यह प्रक्रिया अस्थाई होती है और सिर्फ 3 साल तक के लिए ही मान्य रहती है। इतना ही नहीं, यह मान्यता सिर्फ प्राथमिक कक्षाओँ से लेकर कक्षा 8 तक के लिए ही मान्य होती है। इससे ऊपर की कक्षाओँ के लिए, अलग से और इसी के समान नियम हैं। ऐसे स्कूल जो सर्टिफिकेट हासिल किए बगैर संचालित किए जाएंगे, उन उपर एक लाख रुपये तक और 10,000 रुपये प्रति दिन तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

इन अनिवार्यताओँ को पूरा कर लेना, खासतौर से वे जो ऊपर के पैराग्राफ में बताया गया है, भी काफी नहीं होता है। यह जान लेना भी जरूरी है कि ये सारे वे नियम हैं जो सेंट्रल एक्ट के तहत अनिवार्य हैं। राज्य के अपने नियम भी होते हैं, यानि कि नियमोँ की अतिरिक्त परतेँ। इनमेँ सबसे महत्वपूर्ण है ‘एसेंशियालिटी सर्टिफिकेट’ यानि ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ जो कि राज्य सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा हर पांच साल में जारी किया जाता है।

यहाँ तक कि सीबीएसई जैसे सेंट्रल बोर्ड भी स्कूलोँ को अपनी सम्बद्धता देने से पहले इन्हेँ पूरा करने की अनिवार्यता जैसी खर्चीली प्रक्रिया को प्राथमिक शर्त मानते हैं। इस सबसे ऊपर एक और बात है, इसके लिए कुछ परमिशन और प्लान और भी हैं जैसे भवन, स्वास्थ्य, पानी, भूमि का इस्तेमाल आदि आदि जिसका परमिट नगर निगम से हासिल करना होता है।

हालत इतनी खराब है कि दशकोँ से बेहद सफलतापूर्वक चल रहे बेहतरीन स्कूलोँ, जो कि बहुत अच्छी शिक्षा और सेवा दे रहे हैं, उन्हेँ भी प्राधिकारियोँ की लाल-फीताशाही का सामना करना पड़ता है। सचिन तेंदूलकर का स्कूल शारदाश्रम विद्यामंदिर कक्षा 1 से 4 तक के लिए मान्यता में परिवर्तन (अमेंड इन अफिलिएशन) कर एसएससी (राज्य बोर्ड) से आईसीएसई बोर्ड की सम्बद्धता चाहता था और स्कूल का नाम भी बदलना चाहता था। लेकिन इन दोनोँ ही आवेदनोँ को बीएमसी ने खारिज कर दिया। तर्क यह दिया गया कि स्कूल को 2020 तक के लिए एसएससी का एनओसी मिल चुका है, ऐसे में तब तक उसे इसी तरह से चलाना होगा। स्कूल यह सोचने की हिम्मत भी कैसे कर सकता है कि बच्चोँ के सीखने की क्षमता में सुधार के लिए वह मौजूदा बोर्ड में परिवर्तन कर उपयुक्त बोर्ड से सम्बद्धता हासिल कर लेगा। स्कूल ऐसा सोच भी कैसे सकता है कि बोर्ड में परिवर्तन करना बीएमसी के अधिकारियों के द्वारा एक अतिरिक्त फार्म भरने के कार्य से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

अगर इतने प्रतिष्ठित और नामचीन लोगोँ के स्कूलोँ के आवेदन पर म्यून्सिपल कॉरपेशन का यह रवैया है तो कोई भी यह अंदाजा आसानी से लगा सकता है कि उन आम ईमान्दार लोगोँ की क्या हालत होती होगी जो इस क्षेत्र में प्रवेश करना चाहते हैं। ये नियम ऐसे हैं कि ये बेहद उत्साही एड्यूप्रन्योर्स के लिए भी परेशानी का सबब बन सकते हैं।

आरटीई एक्ट की भाषा और अन्य नियम यह दर्शाते हैं कि राज्य वास्तव में हर किसी को शिक्षा का अधिकार दिलाने से अधिक प्राइवेट स्कूलोँ की प्रगति पर लगाम लगाने में रुचि रखता है। नियमोँ में आर्थिक दंड के ऐसे प्रावधान हैं जो मान्यता न मिलने पर स्कूल के बंद होने का कारण भी बन सकते हैं, मगर उन सरकारी अधिकारियोँ के लिए दंड का कोई प्रावधान नहीं है जो स्कूलोँ द्वारा सभी आवश्यकताओँ को पूरा करने के बावजूद उन्हेँ समय पर सर्टिफिकेट देने में असफल रहते हैं। हरियाणा की सरकार राज्य में वर्ष 2003 से चल रहे लगभग 32 सौ प्राइवेट स्कूलोँ को अब तक मान्यता नहीं दे सकी है। मान्यता के बिना वे हरियाणा बोर्ड से सम्बद्धता के लिए आवेदन भी नहीं कर सकते हैं। हैरानी होती है कि सरकार को इस देरी के लिए किसी दंड का प्रावधान करने वाला कोई अधिनियम मौजूद नहीं है। उनपर भी तो स्कूलों को समय पर मान्यता देने अथवा उसे रिजेक्ट करने में असफल रहने (नियम के मुताबिक) पर अर्थदंड लगाया जा सकता है, जैसे कि प्रति स्कूल प्रति दिन 10 हजार रुपये का जुर्माना। इतना सब होने के बाद भी इन स्कूलोँ को यदि मान्यता मिलेगी भी तो सिर्फ एक साल के लिए। यही स्थिति ओडिसा और केरल में भी है। देश के हजारोँ स्कूल इस तरह की परेशानियोँ से हर साल गुजरते हैं, जिनके सिर पर मान्यता रद्द होने की तलवार हमेशा लटकी रहती है।

इसके साथ-साथ सरकारेँ मनमाने ढंग से कुछ अतिरिक्त नियम भी लागू कर सकती हैं, जैसा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल के दिनोँ में किया है। यहां सभी स्कूलोँ के लिए सीसीटीवी कैमरा और अटेंडेंस के लिए बायोमेट्रिक मशीन लगाना अनिवार्य कर दिया गया है, और ऐसा होने के बाद ही किसी स्कूल को यूपी बोर्ड से मान्यता हासिल होगी। और अगर स्कूल विरोध करते हैं, तो सरकार ऐसे नियम जारी कर सकती है, जिसके अनुसार सरकार का विरोध करने वाले स्कूलोँ की मान्यता रद्द की जा सकती है, जैसा कि चडीगढ़ के शिक्षा विभाग ने इस साल किया है।

इस तरह की स्थिति किसी भी व्यवसाय के लिए दमघोंटू हो सकती है। ऐसे में किसी के लिए भी प्राइवेट शिक्षा के क्षेत्र में काम करना आत्महत्या करने के बराबर हो सकता है जो कि निम्न मध्यमवर्ग और गरीब तबके के लोगोँ के लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ने का एकमात्र जरिया है। हमेँ हर रोज इसी सिस्टम के साथ आगे बढ़ना होता है, हम अपनी जनसंख्या के गरीब तबके के बच्चोँ का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं जो फेल सरकारी स्कूलोँ में पढ़ने के लिए मजबूर हैं। प्राइवेट स्कूलोँ को लाभ कमाने से रोकने की कोशिश में सरकार ने सिर्फ और सिर्फ एकाधिकार हासिल किया है, बल्कि इसे उन लोगोँ के हाथोँ में सौंप दिया है जो पूरे सिस्टम के साथ खेलने में अब एक्सपर्ट हो चुके हैं। सामान्य शिक्षाविद और समाजसेवी इस बाजार में प्रवेश करने की हिम्मत भी नहीं कर सकते हैं।

मोदी सरकार क्या कर सकती है? शुरुआत करने वालोँ के लिए, यह ‘नेशनल ईज ऑफ ओपेनिंग एंड रनिंग ए स्कूल’ रैंकिंग की शुरुआत कर सकती है। दूसरा, यह कि स्कूलों के लिए मान्यता प्राप्त करने के लिए आरटीई एक्ट में तय नियमोँ और प्रक्रियाओं में सुधार कर सकती है। ऐसा सरकार द्वारा आसानी से सिर्फ एक नोटिफिकेशन जारी कर किया जा सकता है जैसा कि अधिनियम के सेक्शन 20 में प्रावधान है। इसे पार्लियामेंट की मंजूरी की भी कोई जरूरत नहीं होती है। 

सार्वभौमिक शिक्षा के लक्ष्य को पूरा करने के लिए, जो कि वहन करने योग्य भी हो, राज्य सरकार को प्राइवेट स्कूलोँ को भी आगे बढ़ने का अवसर देना होगा जिससे प्रतिस्पर्धा विकसित हो। इससे लाभ कमाने के अवसरोँ को रोकने में फीस नियंत्रण अधिनियम जैसे उपायोँ से कहीँ अधिक बेहतर परिणाम देखने को मिलेगा।

- अरिहंत पवरिया (साभारः स्वराज्य मैगजीन)
https://swarajyamag.com/politics/unease-of-doing-business-what-it-takes-...

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