भारत में व्यवसाय करने की सुगमता संबंधी हमारी समझ की सीमाएं

कुछ दिन पहले विश्व बैंक ने भारत और दुनिया में व्यवसाय करने की सुगमता से संबंधित अपनी वार्षिक सूची को जारी किया था। भारत ने रैंकिंग में 23 स्थान की छलांग लगाकर 2017 में 100 के मुकाबले इस वर्ष 77वां स्थान हासिल किया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह हमारे आर्थिक स्वास्थ्य या हमारे कारोबारी माहौल की स्थिति के अंतिम शब्द से बहुत दूर है। इसके विपरीत सोचना गलत होगा। भारतीय सरकारी व्यवस्था एक जटिल जानवर के समान है। सरकारी मशीनरी, प्रक्रिया और नियमों के स्तर पर राज्यों में बहुत अधिक भिन्नताएं हैं। देश को यदि व्यापक परिदृश्य में चित्रित करें तो हमें उद्योगों के लिए एक सक्षम वातावरण बनाने में प्रयासों और सफलता की उपयोगी पर सीमित तस्वीर प्राप्त होती है।

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के रिलीज से पहले, औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) ने व्यापार सुधार कार्य योजना पर राज्य स्तर की प्रगति का वार्षिक मूल्यांकन जारी किया। इन दो प्रगति उपायों के अलावा, कुछ शोध संस्थानों ने विश्व बैंक के भारत के कारोबारी माहौल के पिछले मूल्यांकन को त्रिकोणीय करने का भी प्रयास किया।

विभिन्न सर्वेक्षणों और रिपोर्टों के बावजूद, अलग-अलग राज्यों में उद्यमों को नियंत्रित करने वाले नियामक ढांचे में वास्तविक और गुणात्मक परिवर्तनों की कोई गहरी समझ नहीं है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों ने निजी स्तर पर सुधार करने के अपने दावों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की है। लेकिन दिल्ली सहित अधिकांश राज्यों के मामले में चेकबॉक्स पर लगे निशान के अतिरिक्त हमारे पास बहुत अधिक जानकारी नहीं होती है।

विश्व बैंक स्वयं ही स्वीकार करता है कि कार्यान्वयन संबंधी खामियां मौजूद हो सकती हैं क्योंकि कभी-कभी "पेपर पर होने वाले सुधार जमीन पर दिखाई नहीं देते हैं" या "एक क्षेत्र में हुआ सुधार अन्य क्षेत्रों में की जाने वाली कार्रवाइयों का विरोधाभासी होता है" या "नियामक सेवा वितरण कुछ के लिए अच्छा है लेकिन दूसरो के लिए नहीं"। जब तक राज्य स्तर पर सुधारों की कार्यान्वयन की स्थिति की पूरी तरह से जांच नहीं की जाती है, हम उस प्रदर्शन पर प्रश्नचिन्ह लगाने में सक्षम नहीं होंगे, जो बैंक की रिपोर्ट या उद्योग जगत के सर्वेक्षण उठाते हैं।

इसका एक उदाहरण वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम 2015 के बाद जिले में वाणिज्यिक अदालतों या बेंच और देश भर में उच्च न्यायालय के स्तर की स्थापना है। इस मामले की सच्चाई ये विशेष अदालतों के रूप में शायद ही योग्य है, क्योंकि वाणिज्यिक मामलों को सुनने के लिए न्यायाधीशों का न तो एक समर्पित रोस्टर है न ही वाणिज्यिक विवादों के लिए समर्पित कोर्टरूम का समय है।

अन्य उदाहरण पारदर्शिता और उचित प्रक्रिया के मानदंडों के तहत निरीक्षण प्राधिकरणों को लिखने के प्रयास हैं। कागज पर कई राज्य सरकारों ने पर्यावरणीय नियमों और श्रम कानूनों को लागू करने के लिए निरीक्षण प्रक्रियाओं को नियमित करने का दावा किया है। सुधार दावों में जोखिम-आधारित निरीक्षण और मानक ऑपरेटिंग प्रक्रियाओं के आवेदन को शामिल करना शामिल है। फिर भी, अधिकांश राज्यों के मामले में, निरीक्षण के लिए उद्यमों का चयन करने या जोखिम की गणना करने के लिए तरीकों, या नियमों के उल्लंघन की सीमा जहां कार्रवाई आवश्यक हो जाती है, अस्पष्ट हैं।

अलग-अलग, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों द्वारा प्रदान की जाने वाली सर्वव्यापी शहरी सेवाओं का सामना करने वाली नियामक चुनौतियों का भी कोई हिसाब किताब नहीं है।  भारत सरकार और राज्य सरकारों ने मेक इन इंडिया पहल के तहत औद्योगिक उद्यमों में बड़े पैमाने पर निवेश लाने के लक्ष्य के साथ व्यापार पर्यावरण सुधार कार्यक्रम शुरू किए हैं। भारत में व्यवसाय करने की आसानी पर रिपोर्ट और सर्वेक्षण केवल कुछ प्रकार के व्यवसायों का अध्ययन कर रहे हैं। पंजीकरण और अनुपालन संबंधी सहायता के लिए विशेषज्ञों तक पहुंच केवल बड़े (कर्मचारियों की संख्या या आय के आधार पर) अथवा मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों वाले उद्यमों तक ही सीमित है। लेकिन परंपरागत खुदरा सेवा उद्यमों के लिए परिचालन माहौल में किस हद तक सुधार आया है, इसका जिक्र तक भी किसी एजेंडे में शामिल नहीं है।

उदाहरण के लिए, पिछले कुछ वर्षों में, घनी आबादी वाले बाजार क्षेत्रों में स्थित रेस्तरां बार-बार आकार-स्थानांतरण नियमों के कारण सील कर दिए गए हैं। अल्कोहल सर्व करने की मांग को पूरा करने के लिए अनुमति हासिल करने वाले रेस्त्रां संचालकों को पॉलिसी के नाम पर मोरल पुलिसिंग जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। रेस्त्रां संचालकों और जांच अधिकारियों, एक्साईज अधिकारियों और पुलिस के बीच कानूनी तनातनी वाली खबर आम हो गई है। वर्ष 2014 से देश में मीट, विशेषकर पशुओं के मीट के उत्पादन, व्यापार और बिक्री पर जबरदस्त विवाद है। लगातार बदलने वाले नियमों, उद्देश्यों की अस्पष्टता, स्पष्ट प्रक्रिया की अनुपलब्धता के कारण मीट व्यवसायियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। 

बैंक की डूइंग बिजनेस रिपोर्ट उन मुद्दों को उजागर नहीं करती है जो छोटे पैमाने पर खुदरा उद्यमों को प्रभावित करती हैं, खासतौर पर ऐसे उद्यम जो अबतक औपचारिक रूप से पंजीकृत नहीं हो सके हैं। ये मुद्दे आवश्यक और गैर-तुच्छ सुधारों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो स्वयं-नियोजित उद्यमियों और नुक्कड़ की दुकानों के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करते हैं।

सुधार प्रक्रिया में अगले चरण की कार्रवाई से संबंधित स्पष्ट समझ गायब है। यह केंद्र, राज्य और नगर पालिका की शक्तियों और अधिकारों के बीच छेड़छाड़ पर नियमों और प्रवर्तन में सुधारों के लिए विशेष रूप से सच है। सरकार ने उभरते उद्योगों पर उच्च स्तर की सिफारिशें नहीं की हैं।

उदाहरण के लिए, भारत में अपशिष्ट प्रबंधन बड़े पैमाने पर अनौपचारिक उद्यमों के माध्यम से चलाया जाता है। लेकिन ई-कचरे के उद्यम स्थापित करने की राह में इसके लिए आवश्यक पंजीकरण सें संबंधित नियम और प्रक्रियाएं लागत को महंगा और चुनौतीपूर्ण बनाती है। नगर पालिका प्राधिकरणों और इस क्षेत्र की अनौपचारिक उपक्रमों के बीच की सांठगाठ और व्यापार करने की सुगमता से संबंधित गैर-व्यापक अध्ययनों के  के कारण यह क्षेत्र में सुधार की गुंजाईश के प्रति सजग नहीं करता है।

इस साल मैंने और सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के मेरे सहयोगियों ने दिल्ली में व्यवसाय करने की सुगमता से संबंधित वास्तविकताओं में गहरे तक गोता लगाया। यह पता चला है कि दिल्ली में सुधार के अधिकांश दावे दिखावा मात्र के लिए हैं। नुक्कड़ की दुकान वाले छोटे उद्यमी अभी भी लाइसेंस-परमिट-इंस्पेक्टर राज के भार तले दबे हैं और अनुबंध प्रवर्तन के क्षेत्र में कोई भी महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाए गए हैं। दिल्ली में, राज्य सरकार अभी भी 'रियायतों की पेशकश' मोड में है। सिद्धांत-आधारित विनियमन पर उच्च स्तरीय चर्चा करने के बजाय,  राज्य सरकार उद्यमों के लिए विनिर्देशों को व्यापक रूप से निर्धारित करती है, और अराजकतावादी सांस्कृतिक मानदंडों के आधार पर व्यवहार करती है।

015 में, डीआईपीपी और एनआईटीआई (नीति) ने बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान प्रक्रिया की शुरुआत की जो कि आर्थिक स्वतंत्रता के सही उत्तर की ओर पैन-स्टेट आंदोलन को प्रोत्साहित करने के लिए एक प्रशंसा योग्य प्रयास है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस प्रयास का फल डूइंग बिजनेस रैंकिंग में भारत की नाटकीय वृद्धि के रूप में देखने को मिला है।

लेकिन चीजों को परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए प्रस्तावित सुधार योजनाओं में से किसी भी योजना की पृष्ठभूमि में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध शोध आधारित नहीं है। न ही प्रस्तावित योजनाओं के संदर्भ में कोई व्यवस्थित विचार विमर्श ही किया गया जिससे उनके युक्ति संगत अनुपालन पर सहमति स्थापित की जा सके। कार्यवाही वस्तुओं को लागू करने या उनके सुधार पथों पर विभिन्न राज्यों द्वारा किए गए दृष्टिकोणों की सापेक्ष योग्यता को लागू करने की लागत पर कोई चर्चा नहीं है।

भविष्य के लिए, सरकार के प्रत्येक स्तर पर सुधार प्रक्रिया के बारे में एक व्यवस्थित चर्चा करने और इस पर नजर रखने की आवश्यकता है। व्यापार के लिए सुगम माहौल को जानने के लिए विश्व बैंक की डूइंग बिजनेस रैंकिंग जैसे इंडेक्स के अतिरिक्त हमें सुधार के लिए उठाए गए सभी कदमों को समझने की जरूरत है, विशेषकर उन सुधारों को जिनका मापन नहीं किया जाता।

- भुवना आनंद (रिसर्च एडवाइज़र, सेंटर फॉर सिविल सोसायटी)

फोटोः साभारः इंडिया टूडे https://bit.ly/2E9EGEG

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