भारत में सूखा अब बहुत बड़ी आपदा नहीं

इस वर्ष मानसून बहुत कमजोर रहा जैसा 1965 में रहा था। लेकिन इस बार इसे थोड़ी बड़ी असुविधा से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा जबकि 1965 में यह दैत्याकार और भयावह आपदा थी। भारत पर अब सूखे का असर न पड़ना एक यशोगाथा है लेकिन  ऐसी जिसे आमतौर पर गलत समझा गया है।

छठे दशक में भारत अमेरिकी अनाज सहायता  पर बुरी तरह निर्भर था । यहां तक 1964 में जब मानसून बहुत अच्छा रहा तब भी भारत को 70लाख टन अनाज की सहायता लेनी पड़ी थी जो घरेलू उत्पादन के दस प्रतिशत से कहीं ज्यादा थी। उसके बाद भारत में दो साल 1965और 1966 में दो बार सूखा पड़ा और अनाज की पैदावार घटकर 20प्रतिशत रह गई। केवल अभूतपूर्व विदेशी अनाज की मदद ने ही भारत को बड़े पैमाने पर भुखमरी से बचाया। जवाहरलाल नेहरू आत्मनिर्भरता की बड़ी-बड़ी बातें करते थे लेकिन उन्होंने भारत को विदेशी दानधर्म पर बेहद निर्भर बनाया। 1966 के सूखे ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि बगैर विदेशी अनाज सहायता के भूख पर काबू पाना संभव ही नहीं था। भूखे पेटों को केवल विदेशी अनाज सहायता से ही भरा जा सकता है और यह सहायता 1 करोड़ टन के  रेकार्ड आंकड़े तक पहुंच चुकी थी।

विदेशी विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि भारत खुद अपना पेट कभी नहीं भर सकता। विलियम और पाल पौडोक ने महाबिकाऊ पुस्तक –फमिन 1975 –लिखी थी जिसमें दलील दी गई थी कि दुनिया में अनाज खत्म हो रहा है और 1975 में विश्व स्तरपर अकाल पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अनाज की सहायता करनेवाले शायद भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देशों की आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाएंगे। इसलिए पश्चिमी देशों के अतिरिक्त अनाज को उन देशों के लिए बचाया जाना चाहिए जिन्हें बचाया जा सकता है। मानवता के भले के लिए भारत जैसे देशों को भूखे रहने के लिए छोड़ देना चाहिए जिन्हें बचा पाना संभव नहीं है। इस पुस्तक ने भारतीयों को बहुत नाराज किया और डराया भी। इसके बावजूद पश्चिमी देशों में बहुत तारीफ हुई। पर्यावरणवादी और द पापुलेशन बाम्ब पुस्तक के लेखक पाल एहरिच ने माल्थस की चुनौती को सामने लाने के लिए पैडोक भाइयों की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

अमेरिका भारत की गुटनिरपेक्षता से कभी खुश नहीं था। अमेरिकी राष्ट्रपति जानसन ने भारतीय नेताओं और अफसरों को बार-बार ज्यादा अनाज के लिए भीख मांगने को मजबूर किया। इससे भारत सामूहिक भुखमरी से तो बच गया लेकिन भारतीयों को अपमानित होना पड़ा।

उसके बाद हरित क्रांति आई। उसके बारे में गलत कहा जाता है कि उसने अनाज की उपलब्धता को बढ़ाया और आयात पर निर्भरता को खत्म किया। हरित क्रांति ने निश्चित ही पैदावार बढ़ाई। लेकिन इससे प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता नहीं बढ़ीं। वह 1964-65 में 480 ग्राम प्रति दिन के शिखर पर पहुंच गई थी और फिर कई दशकों तक उस स्तर कर नहीं पहुंची। वास्तव में पिछले वर्ष यह उपलब्धता 430 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रति दिन थी। जबकि उच्च श्रेणी के अनाज मांस,अंड़े .सब्जी और खाने के  तेलों की प्रति व्यक्ति  खपत बढ़ी। लेकिन गरीब तो उच्च श्रेणी का अनाज नहीं खरीद सकते।

फिर भुखमरी का नजारा कैसे खत्म हुआ ? मुख्यरूप से बेहतर वितरण के कारण। कम बारिश वाले इलाकों में रोजगार योजनाओं के द्वारा खरीद की क्षमता पैदा की गई जहां उसकी सख्त जरूरत थी। धीमी लेकिन निरंतर गति से रास्तों का जाल फैला जिससे अभावग्रस्त इलाकों में अनाज पहुंच बढ़ी । सार्वजनिक वितरण प्रणाली का निरंतर फैलाव हुआ। इसके बावजूद भूख तो रही लेकिन वह भुखमरी में तब्दील नहीं हुई। नौंवे दशक में भूख भी कम हुई।

दूसरा, सिंचाई के विस्तार ने फसलों के नुक्सान को रोका। सिंचित क्षेत्र का अनुपात जो पहले एक तिहाई था वह 55 प्रतिशत हो गया। पहले ज्यादातर  सिंचाई नहरों से होती थी और जब सूखे के कारण जलाशय ही सूख जाते थे उन पर भी असर होता था।छठे दशक में ट्यूबवैल सिंचाई तेजी से बढ़ी अब 80प्रतिशत सिंचाई ट्यूबवैल से होती है। ट्यूबवैल सूखे से प्रभावित नहीं हुए।

ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि ठंड की कम बारिश में होनेवाली रबी की फसल को टयूबवैल ने मदद की । पहले रबी की फसल खरीफ की फसल की एक तिहाई होती थी।अब दोनों बराबर होती हैं।इससे इस बात की वजह पता चलती है कि 2009 में एक सदी का सबसे बुरा मानसून रहा तब भी कृषि उत्पादन में 1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। रबी की अच्छी फसल ने खरीफ की फसल में आई गिरावट को पूरा कर दिया।

लेकिन सूखे के बेअसर होने की सबसे बडड़ा कारण कृषि क्षेत्र के बाहर था। सकल घरेलू उत्पाद में उत्पाद में कृषि और घरेलू क्षेत्र का हिस्सा तेजी से बढ़ा। 1950 में सकल घरेलू उत्पाद का 52 प्रतिशत हिस्सा कृषि से आता था तो 1990 में 29प्रतिशत । यह अब और गिरकर 14 प्रतिशत रह गया है। यदि इसका बारहवां हिस्सा भी सूखे को भेंट चढ़ गया तो भी सकल घरेलू उत्पाद में एक प्रतिशत का ही नुक्सान होगा।

फिर 1960 में लौट चले । तब भारत आयात करने में सक्षम नहीं था और विदेशी मदद पर निर्भर था। लेकिन आज सकल घरेलू उत्पाद 2ट्रीलियन डालर है और उत्पादों और सेवाओं का निर्यात 300 अरब डालर और विदेशी मुद्रा भंडार 280 अरब से ज्यादा है।इसलिए यदि हमें आज की महंगी दरों से भी एक करोड़ टन गेंहू आयात करना पड़े तो  उसकी कीमत 3 अरब डालर होगी।दरअसल आयात की जरूरत ही नहीं है क्योंकि सरकार के पास अनाज का आठ करोड़ टन का भंडार है। यही असली वजह है जिसके कारण सूखा अब आपदा नहीं रहा। हरित क्रांति के बावजूद अनाज की उपलब्धता छठे दशक की तरह की कम है। लेकिन उद्योगों और सेवाओं का हिस्सा बड़े पैमाने पर बढ़ने से सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी हुई है। इसने कृषि को तुलनात्मक रूप में छोटा बना दिया है और अर्थव्यवस्था की  बारिश पर निर्भरता को कम कर दिया है। यहीं एक फंदा है।सूखे के कारण सामूहिक भुखमरी नहीं फैलेगी लेकिन अनाज के दाम जरूर बढ़ेगे।

- स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर