विकास की दोहरी गति

यह बैठक उसी शहर में थी और उस रामलीला मैदान से ज्यादा दूर भी नहीं थी, जहां कुछ दिन पहले तक भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध में बाबूराव हजारे अनशन पर बैठे थे। उनके इस अनशन ने सरकार, संसद और खबरिया टेलीविजन चैनलों को हिला कर रख दिया। लेकिन एक पांच सितारा होटल के वातानुकूलित और शांत माहौल में कारोबारी शिक्षा के भविष्य पर चल रहा साक्षात्कार मानो किसी अलग ही दुनिया में था। ऐसी दुनिया, जो देश भर में मध्य वर्ग के प्रदर्शनों और इनसे छुटकारा पाने की राजनीतिक तबके की काल्पनिक कोशिशों से परे थी।

गुडग़ांव के व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र में कदम रखते ही अन्ना पक्ष और सरकार के बीच चल रही तनातनी तो और दूर की चीज होती, बशर्ते टेलीविजन चैनलों पर लगातार इसका प्रसारण नहीं हो रहा होता। इस शहर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और बढ़ती निजी पहल की टक्कर स्वेच्छा से सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की गैर मौजूदगी से होती है। भारत के विकास की दोहरी गति का यह सबसे बेहतरीन उदाहरण है।

हरियाणा का आधे से ज्यादा राजस्व अकेले गुडग़ांव से आता है। लेकिन यहां रहने वाले ज्यादातर लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर हैं। चाहे वह बहुमंजिला आवासीय परिसर हो, जिनमें बिजली और पानी की वैकल्पिक व्यवस्था हो या फिर झुग्गी झोपड़ी वाले, जिन्हें बिजली और पानी जैसी सुविधाओं के लिए गैर-कानूनी ढंग से बिचौलिए को पैसे देने पड़ते हैं।

हालांकि गुडग़ांव ने निजी रियल्टी क्षेत्र में अचानक से आई तेजी के लिए एक अलग सी ही परिभाषा गढ़ी है। आज भारत में शायद ही कोई ऐसी जगह होगी जहां अपार्टमेंट इन बुनियादी सुविधाओं के बिना खरीदे जाते हैं। इन बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराने का जिम्मा निजी पक्षों का होता है और ग्राहक के साथ समझौते में ही इसका जिक्र कर दिया जाता है। शायद इसी वजह से आर्थिक मंदी के दौर में भी भारत में रियल एस्टेट के भाव आसमान छूते रहते हैं।

आज आलम तो यह है कि इन चमचमाते विशालकाय मॉल के अंदर चहलकदमी करना लोगों को ज्यादा सुविधाजनक लगता है (कुछ मॉल तो कारोबारी घंटों के शुरू होने से पहले अपने यहां बुजुर्गों के लिए सुबह की सैर का इंतजाम भी करने लगे हैं) और हर सम्मानित व्यक्ति अपने शहर की सड़कों पर पैदल चलने में खुद को इतना सहज महसूस नहीं करेगा। मॉल अपेक्षाकृत अधिक साफ सुथरे होते हैं और शहर की सड़कों की तरह इनमें चलते वक्त आपको गड्ढों का सामना भी नहीं करने पड़ेगा जिसकी वजह से आपकी एड़ी में मोच आ जाती है। न ही आपको इस बात का खतरा होगा कि शॉपिंग की थैली उठाकर चलते वक्त अचानक कोई चोर-उचक्का आपका सामान छीनकर भाग निकलेगा। एक ऐसी आदर्श स्थिति जिसका सरकार दावा तो करती है, पर जिन लोगों से वह कर वसूलती है उनके लिए ऐसी परिस्थिति का विकास वह आज तक नहीं कर पाई है।

नए भारत में मौजूद विरोधाभास को जितना ज्यादा पिछले 30 दिनों में महसूस किया गया उतना कभी नहीं। यह मौका था देश में आर्थिक उदारवाद के 20 वर्ष पूरे होने का। हजारे के अगस्त अनशन से राजनीतिक वर्ग और आम नागरिकों के बीच उभरते तनाव की झलक साफ देखने को मिलती है। मुंबई खुद को देश की आर्थिक राजधानी कहकर भले ही इठलाती हो मगर हर साल बारिश के मौसम में सड़कों पर भरा पानी इस शहर की रफ्तार रोक देता है और पिछले हफ्ते ऐसा ही कुछ नजारा देश की राजधानी दिल्ली में भी देखने को मिला।

आज एक युवा पेशेवर भी खुद का मकान, एक से अधिक गाडिय़ां खरीदने की सोच सकता है जिसकी एक दशक पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मगर यह गौर करने लायक है कि अगर ये सकारात्मक बदलाव आए हैं तो ये निजी प्रयासों के ही नतीजे हैं- चाहे वह रियल एस्टेट हो, आतिथ्य सत्कार हो, चिकित्सा, शिक्षा, दूरसंचार या फिर विनिर्माण क्षेत्र हो।

इन सबसे एक सशक्त उभरते बाजार का संकेत मिलता है। फिर भी आज संसद, राज्य की विधानसभाओं (जहां की घटनाओं का प्रसारण हम टेलीविजन पर देख सकते हैं), सरकारी दफ्तरों और सार्वजनिक संस्थानों जैसे कि नगर निगम, पुलिस स्टेशनों, अदालतों, पासपोर्ट कार्यालयों और सरकारी अस्पतालों में आज भी जो नजारा देखने को मिलता है वह उदारीकण के पहले का जान पड़ता है। यहां का माहौल, लोगों के काम करने का ढंग, नजरिया सब कुछ पहले जैसा ही है। यही वजह थी कि लोग बड़े पैमाने पर उनकी ओर ख्ंिाचे चले आए और उनके अव्यावहारिक रवैये को भी राष्ट्रीय समर्थन मिला।

भारत की यह दोहरी रफ्तार समान और परस्पर विपरीत बल पैदा कर रहे हैं। जब तक नेता अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली सेवाओं में सुधार लाने से इनकार करते रहेंगे तब तक निजी क्षेत्र इस मौके का लाभ उठाता रहेगा। हालांकि यह भी सच है कि बुनियादी ढांचों के अभाव में देश का निजी क्षेत्र भी एक सीमा तक ही विकास कर सकता है और बात जब बड़े पैमाने पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की आती है तो इसमें सरकार की ही भूमिका हो सकती है। कुछ जानकार नेताओं ने इस बात को समझते हुए खुद को निजी क्षेत्र के मॉडल पर चलने के लिए तैयार किया है। उदाहरण के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जो खुद को राज्य का मुख्य कार्याधिकारी कहलाना पसंद करते हैं, इच्छुक कारोबारियों को अपने राज्य की जमीन पर लुभाने की कोशिश करते रहे हैं (यह अलग बात है कि बात जब खुद पर सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देने के आरोपों को झुठलाने की आई तो उन्होंने भी नेताओं के नक्शे कदम पर इसके विरोध में उपवास की घोषणा कर दी)।

हालांकि इस कड़ी में शायद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अधिक यथार्थ नजर आते हैं। वह अपनी परियोजनाओं को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए मुख्य कार्याधिकारी नियुक्त करने में यकीन रखते हैं। वह परंपरागत अंदाज में नेता ही बने रहना पसंद करते हैं। वह इसी अंदाज में लोगों को बेहतर सुविधाएं देने और राज्य को विकास के पथ पर तेजी से बढ़ाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। दुख की बात है कि उनके उदाहरण को देश के अन्य हिस्सों के नेता नहीं अपना रहे हैं।

- कनिका दत्ता
साभार: बिजनेस स्टैंडर्ड