बिजनेस को खुलकर सांस तो लेने दें

नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत में कारोबारी माहौल बनाने की होगी 
 
देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले छोटे-बड़े कारोबारियों की अपेक्षा है कि नई सरकार अंग्रेजी राज के समय से चले आ रहे अप्रासंगिक और बेतुके कानूनों से उन्हें मुक्ति दिलाए। इन दिनों दुनिया के आर्थिक संगठन और अर्थ विशेषज्ञ एक स्वर में कह रहे हैं कि आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए नई भारत सरकार को सबसे पहले कारोबारी प्रतिकूलताएं दूर करनी होंगी। पिछले दिनों बोस्टन में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के कैनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट में एक संबोधन के दौरान अमेरिका की सहायक विदेश मंत्री (दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों की प्रभारी) निशा देसाई बिस्वाल ने कहा कि भारत को दक्षिण एशिया का विकास इंजन बनना है तो जरूरी होगा कि वह बिजनेस के अनुकूल नीतियां बनाए। कारोबारी प्रतिकूलता के पैमाने पर 185 देशों की सूची में भारत 132वें स्थान पर है। 
 
रिश्वत का बोझ 
माना जा रहा है कि भारत में देसी-विदेशी निवेश में कमी का सबसे बड़ा कारण कारोबारी माहौल का अनुकूल न होना है। प्राइवेट सेक्टर को लगता है कि कारोबार करने के लिहाज से भारत एक मुश्किल जगह है, क्योंकि यहां कई तरह के जटिल कानून हैं। ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म डेलॉइट ने एशिया पैसिफिक टैक्स कॉम्प्लेक्सिटी सर्वे में बताया है कि एशिया महाद्वीप में भारत सबसे जटिल टैक्स नियमों वाला देश है और निवेशकों के लिए यही सबसे बड़ी चिंता की बात है। डेलॉइट ने बताया कि उसके सर्वे में शामिल 81 फीसदी लोगों का मानना है कि भारत में टैक्स नियम काफी कठोर हैं। 
 
अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम द्वारा जारी किए गए 'डूइंग बिजनेस इंडेक्स' में भी कहा गया है कि कारोबार शुरू करने के मापदंडों और कारोबार चलाने में कठिनाइयों की दृष्टि से भारत दूसरे देशों की तुलना में कहीं ज्यादा निराशाजनक स्थिति में है। देश में कारोबार करने वाले किसी शख्स को टैक्स और विभिन्न कानून संबंधी कार्यवाहियों में आमतौर पर सालाना 271 घंटों का समय लगाना होता है। इतना ही नहीं, भारत में लालफीताशाही और भ्रष्टाचार हमेशा बिजनेस की राह में प्रमुख बाधा बनकर खड़े रहते हैं। किसी बड़ी औद्योगिक इकाई को यहां अपनी सालाना बिक्री का दो फीसदी खर्च रिश्वत देने में करना पड़ता है। छोटी औद्योगिक इकाइयों को तो अपनी सालाना बिक्री का छह फीसदी तक इस मद में खर्च करना होता है। 
छोटी औद्योगिक इकाइयों के प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी कुल कामकाज की अवधि का 12.6 फीसदी समय सरकारी अधिकारियों से निपटने में खर्च करना पड़ता है। देश के कारोबारी माहौल के प्रति न केवल विदेशी कारोबारी असहज अनुभव कर रहे हैं , बल्कि देसी कारोबारी भी खुद को काफी मुश्किलों से घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं। कुछ भारतीय कंपनियां भारत में आ रही दिक्कतों के चलते दूसरे देशों में निवेश कर रही हैं। इन कंपनियों ने खास तौर पर अनुबंधों , भूमि अधिग्रहण , पर्यावरण संबंधी स्वीकृति तथा श्रमिकों और प्रबंधन के रिश्तों को लेकर गंभीर चिंताएं जाहिर की हैं। स्थिति यह है कि निवेश की कमी से चालू बजट घाटा बढ़ गया है और देश की विकास दर बुरी तरह प्रभावित हुई है। 
 
ऐसे में नई सरकार को यह ध्यान रखना होगा कि जब तक कारोबारी माहौल और विश्वास में सुधार नहीं होगा तब तक विदेशी उद्यमियों के लिए भारत आना और देसी उद्यमियों के लिए अच्छा कारोबार करना तथा निर्यात बढ़ाना मुश्किल होगा। विदेशी निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था की ओर तभी आकर्षित होंगे, जब उन्हें बुनियादी ढांचे में सुधार, विनिर्माण क्षेत्र की रफ्तार और कौशल प्रशिक्षण के सार्थक प्रयास दिखाई देंगे। इन सबके साथ - साथ पेंशन और बीमा सेक्टर में सुधार और वित्तीय बाजारों में ज्यादा खुलापन तथा पारदर्शिता के कदम भी विदेशी निवेशकों को भारत की ओर आकर्षित करने में कारगर भूमिका निभा सकते हैं। विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जरूरी है कि सरकार अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती के लिए कदम उठाए। देश की विभिन्न परियोजनाओं में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की आवक को ऊंचाई देने के लिए बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ता , दूरसंचार और परिवहन की उपयुक्तता का कारगर क्रियान्वयन, सरल श्रम कानून, भ्रष्टाचार रहित व्यवस्थाएं और बौद्धिक संपदा अधिकारों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। 
 
नियामक हों जवाबदेह 
नई सरकार को अपने मंत्रालयों और नियामक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। भारत के लिए यह भी जरूरी है कि वह निजी और बहुपक्षीय निवेश को बढ़ावा देने के लिहाज से कारोबार के अनुकूल नजर आए। देश का कारोबारी माहौल सुधारते हुए विदेशी निवेशकों को विश्वास दिलाना होगा कि भारत में विदेशी निवेश सुरक्षित और आकर्षक बना हुआ है। नई सरकार को विश्व बैंक द्वारा दिए गए उन सुझावों पर भी गौर करना होगा , जिनमें कहा गया है कि भारत में सरकारी नियमन और वित्त क्षेत्र में सुधार किए जाने चाहिए। मानव संसाधन विकास , स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार तथा शिक्षा में निवेश जैसे सुधारों को भी गति दी जाए ताकि दुनिया के तमाम निवेशक , चाहे वे सावरेन वेल्थ फंड के हों , या पेंशन फंड के , या फिर निजी पूंजी से जुड़े हों , भारत की ओर अपने कदम बढ़ाएं। आशा करें कि नई केंद्र सरकार कारोबार करने की परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के लिए उपयुक्त मानक तय करेगी और उनके आधार पर देसी - विदेशी निवेश को तेजी से आकर्षित करने की डगर पर बढ़ेगी। 
 
 
जयंतीलाल भंडारी 
साभारः नवभारत टाइम्स

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.