सरकारी कंपनियों में टोपी बदलने का खेल

सरकारी कंपनियों को घाटे से उबारने और उनके प्रदर्शन को बेहतर बनाने का एकमात्र तरीका उनका निजीकरण करना ही है। हालांकि विनिवेश के माध्यम से भी सरकारी कंपनियों के प्रदर्शन पर निगाह रखी जा सकती है, लेकिन ऐसा तभी संभव है जबकि कंपनी के कम से कम 51 प्रतिशत शेयर बाजार के पास हो और 49 प्रतिशत व इससे कम ही कंपनियों के पास हो। हालांकि होता अबतक उल्टा ही रहा है। जानेमाने स्तंभकार 'भरत झुनझुनवाला' द्वारा लिखित व  'नवभारत टाइम्स' अखबार में मार्च 26, 2014 को प्रकाशित निम्नलिखित लेख उपरोक्त विषय पर विस्तार से प्रकाश डालता है। आप भी पढ़ेंः 
 
सरकार इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) के शेयरों का विनिवेश करना चाहती थी। कुछ समय पहले इस कंपनी के शेयर सिंगापुर आदि देशों में बेचने के लिए रोड शो किए गए थे। परंतु विदेशी निवेशकों ने रुचि नहीं दिखाई। उनकी चिंता थी कि डीजल वगैरह पर दी जा रही सब्सिडी का बोझ इंडियन ऑयल पर पड़ता है। मान लीजिए, आज निवेशक ने इंडियन ऑयल के शेयर खरीद लिए। दस दिन बाद सरकार ने कंपनी को डीजल का विक्रय मूल्य कम करने का आदेश दे दिया तो इससे कंपनी पर बोझ बढ़ेगा और कंपनी घाटे में आ जाएगी। ऐसे में निवेशक बेवजह ही घाटा खाएगा।
 
विनिवेश का मकसद
निवेशकों की इस बेरुखी से बचने का सरकार ने विचित्र रास्ता निकाला। उसने दूसरी सरकारी कंपनियों को आदेश दिया गया कि वे इंडियन ऑयल के शेयर खरीद लें। ओएनजीसी तथा ऑयल इंडिया ने इंडियन ऑयल के 5-5 प्रतिशत शेयर खरीद लिए और सरकार को लगभग 5000 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया। यह वैसा ही हुआ कि बिक्री बढ़ाने के लिए दुकानदार अपने भाई को माल बेच दे। इससे माल तो परिवार में ही रहता है। यह विनिवेश नहीं, सिर्फ टोपी बदलना है। विनिवेश का उद्देश्य है सार्वजनिक कंपनियों में सरकार का हिस्सा कम करना और इन्हें शेयर बाजार की नजर में लाना। ओएनजीसी द्वारा आईओसी के शेयर खरीदने से ऐसा नहीं होता है क्योंकि इससे इंडियन ऑयल पर बाजार की नहीं, सिर्फ ओएनजीसी की नजर रहेगी।
 
इंडियन ऑयल का रोड शो फ्लॉप होने से हमें एक और संदेश मिलता है। निवेशकों को सार्वजनिक इकाइयों में सरकारी दखल पसंद नहीं है। इंडियन ऑयल पर सब्सिडी का बोझ न होता तो इस कंपनी के शेयर आसानी से बिक जाते। कई अध्ययनों में पाया गया है कि सार्वजनिक इकाइयों में सरकारी कर्मचारियों की संख्या जरूरत से ज्यादा है। इनकी कार्यकुशलता कम है और इन्हें नौकरी जाने का भय नहीं रहता क्योंकि मंत्रीजी के दखल से ये बच जाते हैं। आर्थिक सुधारों के चलते इन इकाइयों का भविष्य संकट में पड़ गया है। तमाम क्षेत्रों में निजी कंपनियों का प्रवेश हो चुका है। पहले बैंकिंग, इंश्योरेंस, टेलिकॉम, तेल, उड्डयन आदि क्षेत्रों में केवल सार्वजनिक इकाइयां कार्यरत थीं। ये ग्राहकों से मनमाना मूल्य वसूल करती थीं। निजी कंपनियों के प्रवेश के बाद ये ऐसा नहीं कर पा रही हैं और घाटे में चलने लगी हैं। सार्वजनिक बैंकों की हालत भी अच्छी नहीं है। बैंकों को कम ब्याज पर रकम बचत व चालू खातों से मिलती है। पाया गया है कि कम सार्वजनिक बैंकों द्वारा जुटाई गई कुल रकम में ब्याज पर हासिल होने वाली जमा राशि का हिस्सा घट रहा है, जबकि निजी बैंकों में यह लगातार बढ़ रहा है। इस समस्या का एकमात्र उपाय यह है कि सार्वजनिक इकाइयों को मंत्रालयों की दखलंदाजी से मुक्त कराया जाए।
 
सार्वजनिक इकाइयों के सुधार के हमारे सामने चार उपाय हैं। सबसे अच्छा उपाय यह है कि इनका निजीकरण कर दिया जाए। इनके 51 प्रतिशत शेयरों को किसी एक निजी निवेशक को बेच दिया जाए, ताकि कंपनी पर मंत्रालय का नियंत्रण समाप्त हो जाए। मारुति जैसी कुछ कंपनियों में ऐसा ही किया गया था। यहां समस्या रेगुलेशन की है। ऑयल इंडिया का निजीकरण कर दिया जाए तो नया मालिक कंपनी के प्रभुत्व का दुरुपयोग करके भारी रकम कमा सकता है। अतः निजीकरण के साथ-साथ सख्त रेगुलेशन भी जरूरी है, वरना हम कुएं से निकल कर खाई में गिरेंगे। दूसरा उपाय यह है कि सार्वजनिक इकाइयों को विभिन्न मंत्रालयों से हटाकर एक अलग मंत्रालय के अधीन कर दिया जाए। यह रास्ता चीन ने अपनाया है। वहां केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के अधीन लगभग 200 सार्वजनिक इकाइयों का स्वामित्व संबद्ध मंत्रालयों से हटाकर सैसाक नाम के एक संगठन को दे दिया गया।
 
अभी कोल इंडिया का स्वामित्व कोयला मंत्रालय, इंडियन ऑयल का पेट्रोलियम मंत्रालय और एयर इंडिया का उड्डयन मंत्रालय के हाथ में है। नई व्यवस्था में इन इकाइयों को सार्वजनिक इकाई मंत्रालय के हाथ में सौंपा जा सकता है। इससे आधा सुधार होगा। संबद्ध मंत्रालय की भूमिका सार्वजनिक इकाई के उद्देश्य निर्धारित करने तक सीमित होगी। कोयला मंत्रालय बताएगा कि कोल इंडिया द्वारा खनन की मात्रा बढ़ाई जाए अथवा कोयले की क्वालिटी में सुधार किया जाए। इस नीति को लागू करने में कोयला मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं रहेगी। ऐसा करने से तमाम मंत्रालयों की दखलंदाजी एक मंत्रालय में सिमट जाएगी। इस मंत्रालय की नौकरशाही आदि की समस्या बनी रहेगी, लेकिन इसका तीखापन कम हो जाएगा।
 
निजीकरण सबसे अच्छा
तीसरे स्तर का उपाय सार्वजनिक इकाइयों के शेयरों के विनिवेश का है। जैसे ऑयल इंडिया के शेयरों को बाजार में बेच दिया जाए। इस प्रक्रिया में मामूली सुधार होगा। शेयर बाजार की नजर रहेगी, परंतु नियंत्रण मंत्रालय का ही रहेगा। चौथा और सबसे निचले स्तर का उपाय एक सार्वजनिक कंपनी के शेयर दूसरी के द्वारा खरीद लिए जाने का है, जैसा अभी सरकार करा रही है। सरकार को टोपी घुमाने की इस कवायद से ऊपर उठना चाहिए, क्योंकि इससे इन कंपनियों की सेहत में रत्ती भर भी सुधार नहीं आने वाला।
 
 
-  भरत झुनझुनवाला
साभारः नवभारत टाइम्स