विनिवेश नहीं निजीकरण

आठवे दशक में कई वर्षों तक भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रासंगिकता पर बहस होती रही। यह माना गया कि आजादी के बाद के शुरूआती वर्षों में निजी क्षेत्र के पास लोहा,इस्पात,भारी मशीनरी,मशीन टूल्स और रेलवे वैगन या बड़े बांध,बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण संयंत्र में निवेश करने के लिए संसाधन नहीं थे।केवल सरकार ही देश या विदेश से ऐसे संसाधन जुटा सकती थी। यही बात एयरलाइन्स ,एयरपोर्ट,और लक्जरी होटलों पर भी लागू होती थी। लेकिन 1980-81 में भारत की बचत दर 18.4 प्रतिशत तक पहुंच गई और उसकी विदेशी निवेश को आकर्षित करने की क्षमता भी बढ़ी।

प्रारंभ के 25 वर्षों में भारत के पास सुविकसित औद्योगिक और प्रबंधकीय कैडर भी नहीं था। सरकारी स्वामित्ववाले उद्योगों में  और राज्य सरकारों द्वारा स्थापित प्रतिष्ठानों में विशेषकर बिजली विभाग में आईएएस अधिकारियों को ही डिपुट किया जाता था। चूंकि सरकार की मालकियत वाले उद्यम सरकार का अंग ही माने जाते थे इसलिए वे विधायिका और मंत्रालय के प्रति जवाबदेह होते थे। इसमें हुआ यह कि नौकरशाह मैनेजर बन गए और राजनीतिज्ञ मालिक और इस गठजोड ने सार्वजनिक उद्य़मों की स्वतंत्रता को खत्म कर दिया।

कई बार अपवाद के तौरपर वी कृष्णमूर्ति ,डीवी कपूर  और एसएम पाटील जैसे अच्छे  मैनेजर भी हुए जिन्होंने रणनीति बनाने,तकनीक को संगठित करने,टीम बनाने, मैनेजमेंट संसकृति विकसित करने दिशा में बेहतर काम किया।जिसके कारण उनकी कंपनियां (भेल,सेल,मारुति,एनटीपीसी,एचएमटी )दशकों तक अच्छी प्रगति करती रहीं।लेकिन ज्यादातर नौकरशाही नियमों और प्रक्रियाओं के नीचे दब गईं ।वहां कार्य निष्पादन उतना जरूरी नहीं था जितना प्रक्रियाओं का पालन।पूंजी आसानी से उपलब्ध और सस्ती थी ।शेयरधारक सरकार ज्यादा डिवीडेंड की मांग नहीं करती थी।सरकारी प्रतिष्ठानों को लाभ कमाने के अलावा रोजगार देना ,कीमते काबू में रखना,सप्लाई सुनिश्चित करना आदि उद्देश्यों को पूरा करना होता था। निवेश ,भर्ती,रणनीतिक दिशा ,तकनीक और उसके स्रोत के बारे में फैसले सरकार करती  न कि प्रबंधन। सारे वित्तीय फैसलों की सीएजी,सीवीसी और सीबीआई पड़ताल करती थी इससे फैसले लेने की इच्छा खत्म हो जाती थी।क्योंकि सभी प्रबंधकीय फैसलों की तरह वे अपर्याप्त जानकारी पर आधारित होते थे इसलिए जोखिमभरे भी थे क्योंकि उनसे आर्थिक हानि हो सकती थी और  जिससे भ्रष्टाचार के आरोप लगते।प्रबंधकीय फैसलों से सरकारी नौकरशाही को दूर ऱकने के लिए कई प्रयास किेए गए। मंत्रालयों और उपक्रमों के बीच एमओयू साइन हुए जिनमें जिम्मेदारियों को स्पष्टरूप से रेकांकित किया गया था। कुछ उपक्रमों को नवरत्न का दर्जा दिया गया,बोर्ड के नौकरशाह निदेशकों के प्रभाव को कम करने के लिए स्वतंत्र निदेशक बनाए गए।लेकिन बात बनी नहीं।संसाधन बढ़ाने को लेकर चिंतित सरकार  ने एक तरीका खोज निकाला वह सरकारी उपक्रमों के कुछ शेयर  देशी और विदेशी निजी और संस्तायीकृत शेयरहोल्डरों को बेच सकती है।हालांकि भारतीय कंपनी कानून शेयरधारकों को कुछ अधिकार देता है कि  उन्हें अपने निवेश के बदले में उचित लाभ मिले।शेयरधारक उनके लाभों को कम करनेवाले गलत फैसलों के बारे में जवाब मांग सकता है। कोल इंडिया के मामले में ऐसा हुआ भी। यहां समस्या यह है कि कोयला राश्ट्रीयकृत कामोडिटी है।सरकार एक ऐसी कंपनी के जरिये दोहन कर रही है जिसके प्रायवेट शेयरधारक हैं।इससे सरकारी हितों(पावर सेक्टर और कोयले के अन्य उपयोगकर्ताओं को निरंतर और उचित दामों पर सप्लाई सुनिस्चित करना )और निजी शेयरधारकों (जो अपने निवेश अच्छा लाभ चाहते हैं) के बीच टकराव होता है।

इसका समाधान यह है कि कोल इंडिया पर सरकार का सौ फीसदी स्वामित्व हो (जटिल प्रक्रियाओँ के कारण वह लगभग असंभव है) या उस पर कोयला सप्लाई की सीधे जिम्मेदारी न हो।वह ऐसा कोयले के विराष्ट्रीयकरण और प्रायवेट पार्टीयों को बेचकर कर सकती है ।जैसा उसने तेल और गैस फील्ड के मामलों में किया है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती ।उसे अन्य उत्पादों विशेषकर बिजली के मूल्यों को विनियंत्रित करना होगा जिनमें कोयले का इस्तेमाल किया जाता है।कोई नियामक संस्था अंतिम उत्पाद जैसे कि बिजली और कोयले के इनपुट मूल्य के मूल्यों की निगरानी कर सकती है जो सुनिश्चित करे कि अभाव की स्थिति का कोई गलत लाभ न उठाए।कोल इंडिया और अन्य सरकारी स्वामित्ववाले उपक्रमों को सरकारी स्वामित्व से बचाने के कुछ और भी आयाम हैं।तब हमारे पास ऐसे उपक्रम होंगे जो मालिक के लाभ के लिए चलाए जाएंगे जिनको प्रमोटर या शेयरधारक कहते हैं।जो कार्यकुशलता और लाभ ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने की दिशा में काम करेंगे।

दरअसल हमें विनिवेश नहीं करना चाहिेए जिसमें सरकार जिसमें सरकार अपने उपक्रमों के एक हिस्से को बेच देती है मगर उपक्रमों पर अपना नियंत्रण बनाए रखती है। सरकार को अपने नियंत्रण को  पूरी तरह हस्तातंरित कर देना चाहिए। इस तरह बेचने से  सरकार को एकमुश्त पूंजीलाभ होगा । इससे महत्वपूर्ण बात यह है कि सारी अर्थव्यवस्था की कार्यक्षमता में सुधार होगा।क्योंकि पूरे सरकारी उपक्रम नौकरशाही नियंत्रणों और प्रक्रियाओं से मुक्त होकर अधिकतम लाभ पाने कोशिश करेंगे।

सार्वजनिक क्षेत्र के प्राइवेटाइजेशन पर ज्यादा बात नहीं हो रही। सरकार को उस कालबाह्य विचारधारा को त्याग देना चाहिए जो इन उपक्रमों को कार्यकुशल नहीं बनने देती। उन्हें देश के कानून के तहत अधिकतम लाभ कमाने और देश की आर्थिक कार्यक्षमता को बढ़ाने की छूट दी जानी चाहिए।

- एसएल राव
(फायनेंशियल एक्सप्रेस से साभार)