आखिर किस काम की है आपदा प्रबंधन प्रणाली

 

उत्तराखंड में मलबा हटने के साथ तबाही का जो मंजर सामने आ रहा है, उससे प्राकृतिक विपदाओं से निबटने की हमारी तैयारी की असलियत भी उजागर हो रही है। 2004 में दक्षिण भारत में आए सुनामी और इससे हुई भयानक तबाही के बाद अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदा से निबटने के लिए पूरे देश में एक मजबूत सिस्टम बनाने की जरूरत महसूस हुई। 2005 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया। इसकी अहम जिम्मेदारी थी- सभी राज्यों में मजबूत आपदा प्रबंधन केंद्र विकसित करना, आपदा संभावित क्षेत्रों की पहचान करके वहां एहतियाती कदम उठाना, और आपदा की स्थिति में प्रभावित लोगों तक बिना वक्त गंवाए प्रभावी राहत पहुंचाना। नौ रिटायर सीनियर ऑफिसर इसके मेंबर बनाए गए। आंध्र प्रदेश के विधायक शशिधर रेड्डी इसके वाइस चेयरमैन हैं, जिन्हें कैबिनेट मंत्री का और मेंबरों को राज्य मंत्री का दर्जा मिला हुआ है।

मीटिंग तक नहीं हुई

मौजूदा सिस्टम में आपदा प्रबंधन से लगभग 1500 लोग जुड़े हैं और जारी वित्तीय साल में इनके लिए 835 करोड़ रुपए का बजट आवंटित हुआ है। यह वेतन और अन्य प्रशासनिक खर्च के लिए है। पिछले साल 632 करोड़ मिले थे। सभी मेंबरों को पॉश इलाके में बंगले मिले हैं। सीएजी रिपोर्ट इनके कामकाज की असलियत बयान करते हुए बताती है कि पिछले तीन साल में सभी राज्यों में इनकी अगुवाई में एक-एक आपदा प्रबंधन केंद्र बनाने थे, इसके लिए अलग से लगभग 35 हजार करोड़ रुपये भी दिए गए, लेकिन सिर्फ छह राज्यों को छोड़कर कहीं ऐसा नहीं हुआ। उत्तराखंड तक में इस पर काम नहीं हुआ। आपदा से निबटने की तैयारी का जायजा लेने के लिए 2010 के बाद इनकी एक कोऑर्डिनेशन मीटिंग तक नहीं हुई। आपदा के वक्त तमाम एजेंसियों के बीच किस तरह तालमेल होगा इसकी कोई योजना नहीं। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे राहत कार्य के दौरान संयोजन की कमी को स्वीकारते हैं लेकिन ऐसा क्यों हुआ, इस बारे में कुछ बोलने से बचते हैं।

रिसर्च के लिए रिसर्च

भूस्खलन और भारी वर्षा जैसी आपदा का पता लगाने के लिए सैटेलाइट का उपयोग करने और इसके सटीक पूर्वानुमान के लिए योजना बनाने को कहा गया लेकिन तीन साल तक उस पर रिसर्च ही होता रहा। उत्तराखंड में भी भूस्खलन वाले इलाके की पहचान कर वहां खतरनाक हालत से निबटने के उपाय सुझाने का काम भी इन्हें दिया गया था, लेकिन इसकी शुरुआत ही नहीं हो सकी। मौसम संबंधी जानकारियां समय पर देने के लिए सैटेलाइट की मदद से आपदा प्रबंधन को इसरो और नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर से जोड़ने की योजना बनाई गई लेकिन अब तक इनमें आपसी तालमेल नहीं बन पाया है। अधिकारियों ने इस काम को पार्ट टाइम जॉब की तरह लिया। रही-सही कसर आपदा प्रबंधन की ओर से भेजे कुछ प्रस्तावों को सरकार द्वारा डंप किए जाने से पूरी हो गई। 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजना में भी उत्तराखंड के खतरनाक गांवों की पहचान कर वहां एहतियाती कदम उठाने की योजना बनी लेकिन हकीकत में कुछ अमल नहीं हुआ। ऐसा तब हो रहा है जब हर साल पूरी दुनिया में बाढ़ से मरने वाले लोगों में बीस फीसदी भारत के होते हैं।

जब से आपदा प्रबंधन का गठन हुआ है, तब से लेकर उत्तराखंड की ताजी विपदा तक कोई पांच हजार मौतें प्राकृतिक आपदा से हो चुकी हैं। लेकिन इससे निबटने के लिए बना यह सिस्टम तैयारी और योजना के अभाव में हर बार इसके असर को कम करने में विफल रहा। आपदा प्रबंधन और इससे जुड़े सिस्टम को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई दिनों से खाली पड़ी डायरेक्टर जनरल पोस्ट पर नियुक्ति उत्तराखंड त्रासदी के बाद हुई। अन्य विकसित देशों ने हर तबाही से कुछ सीख ली और आगे खुद को इससे निबटने के लिए काबिल बनाया। अमेरिका में तूफान की आशंका वाले इलाके से लोगों को किस तरह सुरक्षित निकाला जाए, इसके लिए हर साल बड़े पैमाने पर ट्रेनिंग दी जाती है। इसके लिए खास कमांडो तैयार किए जाते हैं। वहां इसका सकारात्मक प्रभाव भी दिखा है। तूफान अब भी आते हैं लेकिन जान का नुकसान बहुत कम होने लगा है। तूफान आने से पहले लोग सुरक्षित निकाल लिए जाते हैं, हालांकि दूसरे फैक्टर भी इनकी मदद करते हैं। मौसम की सटीक भविष्यवाणी और आपदा प्रबंधन के सिस्टम के साथ सरकार का सही कोऑर्डिनेशन लोगों की हिफाजत करने और उन्हें वक्त पर संदेश देने में मदद करता है। हालत यह है कि हम अपने देश में बैठे अमेरिका में आने वाले तूफान की तीव्रता की जानकारी पा लेते हैं, लेकिन देश के अंदर चंद किलोमीटर दूर मौसम के बदलते तेवर और इससे जुड़ी प्राकृतिक हलचलों से अनजान रहते हैं।

हम नहीं सुधरेंगे

उत्तराखंड की ही मिसाल लें। मौसम विभाग ने भारी वर्षा के बीच लोगों को प्रभावित इलाकों में न जाने की सलाह दी लेकिन सरकार ने इस पर कान तक नहीं दिया। बेशर्म की तरह बाद में कहा गया कि ऐसी भविष्यवाणी तो रस्म की तरह हर बार ही आती है, इस बार इतनी तबाही का अंदाजा नहीं था! बहरहाल, इन तमाम विफलताओं के बीच राहत और बचाव से जुड़े सैन्य बलों की तारीफ करनी होगी, जिन्होंने नायक की भूमिका निभाते हुए लाख से अधिक फंसे लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया। अब तक का इतिहास बताता है कि आपदाओं से हमने कुछ नहीं सीखा है, और जो भी इतिहास को भूलता है वह उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होता है। सरकार के लिए त्रासदी तब होती है, जब यह आ जाती है। हमने न भूकंप से कुछ सीखा, न सुनामी से और न इस बार की बाढ़ से। जब तक हमारा यह रवैया नहीं सुधरता, तब तक हमें कुदरती ताकतों से ही करिश्मे की उम्मीद रहेगी।

 

 

- नरेन्द्र नाथ

साभारः नवभारत टाइम्स