व्यंग्यः सेंट्रल कैडर के गरीब, स्टेट कैडर के गरीब

अंतरिम बजट आने के बाद स्मार्ट विश्वविद्यालय ने बजट और गरीब विषय पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया, इस प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार पानेवाला निबंध इस प्रकार है-

भारत में गरीबी का मामला बहुत पेचीदा है, आप किसी व्यक्ति को गरीब कह दें, तो वह बुरा मान जायेगा। पर कार पर चल रहा बंदा भी अपने सिलेंडर में छूट-सब्सिडी लेने को गरीबी नहीं, मानवाधिकार समझता है। ऐसे ऐसे गरीब हैं भारत में जो सब्सिडी, पेंशन वगैरह लेने के लिए एकैदम गरीब है पर अपने लड़के की शादी का दहेज मांगते वक्त बताते हैं कि उनके दादा फलां स्टेट के जमींदार अथवा लगभग राजा थे। विकट कनफ्यूजन है। जिसे आप सन्यासी समझकर गरीब मानो, वह बताता है कि उसके कारोबार का टर्नओवर 10000 करोड़ बताता है। जिसका टर्नओवर बीस हजार करोड़ समझकर आप उसे कारोबारी समझो,तो वह खुद को राज्यसभा का मेंबर बताता है। जिसे आप राज्यसभा का मेंबर समझो, वह नये साल में सुंदरियों के कैलेंडर छापकर, कंपनी डुबाकर लंदन भाग जाता है, विजय माल्या की कसम।

राजस्थान में सरकार गरीबों को एक तय धनराशि देने की बात कर रही है। केंद्र सरकार ने भी कुछ ऐसा सिलसिला शुरु करने की बात की है। तो राजस्थान के गरीबों को दोहरे स्तर पर लाभ हो सकता हैं-केंद्र स्तर का भी और राज्य स्तर का भी। जो गरीब सिर्फ केंद्रीय स्तर से मदद हासिल करेंगे उन्हे सेंट्रल कैडर का गरीब माना जायेगा, जो गरीब सिर्फ राज्य के स्तर पर मदद हासिल करेंगे उन्हे स्टेट कैडर का गरीब माना जायेगा। जिन्हे केंद्र और राज्य दोनों स्तर की पेंशन मिलेगी, उन्हे डेपुटेशन वाला गरीब माना जायेगा, राज्य से सेंटर आते रहते हैं और सेंटर से राज्य जाते रहते हैं-टाइप। एक तरफ सरकारें कहती हैं कि गरीबों की तादाद कम हो रही है, दूसरी तरफ गरीबों की पेंशन वगैरह की स्कीमों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि गरीबी बहुत करामाती आइटम है। खत्म होती सी दिखती है, पर फिर मजबूती से जम जाती है। बंदा उधर से खुद को जमींदार बताता है उधर से राशन कार्ड पर सस्ता चावल भी लेता दिखता है।

जल्दी शायद गरीबों के कैडर बन जायें, सीनियर गरीब, जूनियर गरीब। पच्चीस साल से गरीबी पेंशन लेनेवाले खुद को सुपर सीनियर गरीब घोषित कर सकते हैं। सरकारों की दिलचस्पी बंदों को कामकाम सिखा कर , पढ़ा लिखाकर किसी ढंग के काम में लगाने की ना लग रही है। गरीब पढ़ लिखकर सवाल पूछ सकता है कि मलाईदार-कमाईदार ठेके नेताओं के दामादों और बेटों को ही क्यों जाते हैं। गरीब नेताओं के प्लाट गिनें, इसे बेहतर है कि वह पांच किलो चावल गिनें और सो जाये। नेता प्लाट अपने दामाद, बेटों, भतीजों को देते हैं और गरीब को दो रुपये की तीन इडली देते हैं। यही गरीबी का राजनीतिक अर्थशास्त्र है। तो हम समझ लें कि गरीबी के बिना देश भले ही चल जाये, नेता ना चल सकते।

 

- डा. आलोक पुराणिक

साभारः दैनिक ट्रिब्यून,5 फरवरी 2019,संपादकीय पेज ,व्यंग्य

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