स्वहित और स्वार्थ के फर्क को जानें

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।
 
हम लोगों ने कई सालों तक आर्थिक सुधार की धीमी वृद्धि देखी है जिस दौरान हमने कुछ नुकसानदेह समाजवादी संस्थाओं को विखण्डित किया है। फिर भी एक विशाल कार्य-सूची है जिसे पूरा किये बिना हम खुद को एक सख्त पूंजीवादी लोकतंत्र नही कह सकते। और तो और, यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव के दौरान नेता आज भी एक उदार आर्थिक सुधार के मंच पर प्रचार करने से कतराते हैं। उन्हें लगता है कि पूंजीवादी संस्थाओं का समर्थन राजनीतिक विफलता का रास्ता है।
 
साम्यवाद के पतन के बाद भले ही हमारा पूंजीवाद के प्रति विद्वेष कम हुआ है और कुछ भारतीय यह भी मानते है की बाजार में काफी समृद्धि है लेकिन बहुत से लोग अब भी यही सोचते हैं कि यह एक नैतिक तंत्र नही है।
 
चुंकि पूंजीवाद को नैतिक नही माना जाता इसलिए बहुत लोगों को लगता है की नैतिकता धर्म पर निभर्र है जो की सही सोच नही है। मानव का स्व हित के बारे में सोचना बाजार में अच्छे व्यवहार को सुनिश्चित करेगा।
 
मुक्त बाजार नैतिक व्यवहार का एक ताकतवर प्रेरणास्रोत हो सकता है अगर इसके साथ कॉन्ट्रैक्ट इन्फोर्स करने और आपराधिक व्यवहार को सजा देने वाले प्रशाषनिक तंत्र का सहयोग हो।
 
अगर बाजार आंतरिक नैतिकता पर आधरित है तो फिर वहां इतने ठग क्यों है। इसका जवाब है कि हर समाज में कुछ ठग होते हैं और बाजार भी इससे अछूता नही है। इसलिए हमें जरूरत है प्रभावी पुलिस और न्यायाधीशों की जो इन ठगों पर नजर रख सके।
 
कुछ भारतीय यह भी सोचते हैं की पूंजीवाद भारत में अंग्रेजों और विदेशियों द्वारा लाया गया है जो की सही नही है। नोबेल प्राइज़ विजेता फ्रैडरिक हायक ने कहा है कि इंसान के लिए वस्तुओं और सेवाओं का आदान प्रदान करना प्राकृतिक है और हर समाज में पैसा, कानून और नैतिकता होती है जो बाजार व्यवहार का मार्गदर्शन देती है।
 
पूंजीवाद को पसंद ना करने की एक वजह यह भी है की लोग स्व हित और स्वार्थ में भेद नही कर पाते है। लेकिन यह भी एक गलत सोच है। स्व हित वाले व्यवहार से सबका फायदा होता है जबकी एक स्वार्थी आदमी दूसरों के अधिकारों का हनन करते हुए अपना फायदा देखता हैं।
 
अंत में प्रश्न है कि व्यापार की सामाजिक जिम्मेदारिया क्या है? इसका जवाब मिल्टन फ्रीडमेन ने अपने एक लेख में दिया है। उनका लिखना है व्यापार की सामाजिक जिम्मेदारी सिर्फ मुनाफे में इजाफा करना है न कि कम्पनी के संसाधनों का इस्तेमाल समाज सेवा के लिये करना।
 
अगर एक व्यक्ति समाज सेवा करता है तो यह सराहनीय है। अगर बिल गेट्स अपनी संपत्ति गरीबों में दान कर दे तो यह तारीफ के काबिल है पर अगर माइक्रोसॉफ्ट ऐसा करे तो यह आलोचना के योग्य है और यह उसके शेयर होल्डर्स के साथ चोरी होगी।
 
भारत 21वीं सदी में एक प्रकार के पूंजीवादी लोकतंत्र बनने की ओर अग्रसर हुआ है जहां हमारा भविष्य प्रतिस्पर्धा और विकेन्द्रीकरण होगा। इसलिए हम उम्मीद कर सकते है की 21वीं सदी में अधिकतर भारतीयो की जिंदगी उनके पूर्वजों के मुकाबले ज्यादा आज़ाद और ज्यादा समृद्ध होगी।
 
 
-अविनाश चंद्र