स्वतंत्रता दिवस पर मन हताश

अब तक किसी भी स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत का मूड इतना विषादग्रस्त नहीं रहा है। विडंबना है कि पिछला एक दशक भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे सुनहरा काल रहा है। देश विस्मयकारी रूपांतरण के दौर से गुजर रहा है। दशकों से देश प्रगति के पथ पर जा रहा है। देश का प्रत्येक नागरिक तो इस संपन्नता में भागीदारी नहीं कर सका, किंतु काफी बड़ी संख्या में भारतीयों ने महसूस किया कि उनका जीवन उनके माता-पिता के जीवन से बेहतर है और उनके बच्चे उनसे भी बेहतर जीवन जिएंगे। पश्चिम में बुझती आकांक्षाओं के विपरीत हमारी महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग पहले पैदल चलते थे अब साइकिल की सवारी कर रहे हैं, जिनके पास साइकिल थी वे अब मोटरसाइकिल खरीद रहे हैं और जिनके पास मोटरसाइकिल थी, अब कार में घूम रहे हैं। अगर अब सरकार देश के सभी नागरिकों को अच्छे स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सुशासन उपलब्ध करा सके तो देश के सभी तबकों का उद्धार हो जाएगा। किंतु रोजमर्रा की घटनाएं इस शानदार तस्वीर को मुंह चिढ़ा रही हैं।

अगर आप 1820 के दशक में लंदन में होते तो विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक को देख पाते-महान औद्योगिक क्रांति। गोदी में आप टेक्सटाइल निर्यात को देख पाते, उत्तर क्षेत्र से सांसद आपको बताते कि लंकाशायर में मिलों का विस्तार हो रहा है। जबकि इंडिया ऑफिस पर आप भारतीय बुनकरों की दारुण दशा के बारे में जान पाते। तब किसी को भी बड़ी तस्वीर नजर नहीं आती। किंतु आज हमारे प्रधानमंत्री निश्चित तौर पर भारत का उदय देख सकते हैं। उन्हीं के हाथों 1991 में भारत में आर्थिक क्रांति की मशाल जली थी। फिर पिछले सात सालों में देश में आर्थिक या प्रशासनिक सुधार क्यों नहीं हो पाए? इसके बदले भारत में महंगाई, बेकार, लोकप्रिय योजनाएं शुरू की गईं, जिनसे न तो स्थायी रोजगार के अवसर पैदा हुए और न ही संपन्नता आई। इसके बजाए इन योजनाओं से हमारे देश की वित्तीय सेहत खराब हो गई और देश का विकास खतरे में पड़ गया। क्या प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास हिल गया या फिर उनका सुधारों में भरोसा नहीं रहा? विपक्ष ने भी इस दिशा मंज कोई सहयोग नहीं दिया। इसने एक बार भी अधूरे सुधार एजेंडे पर ध्यान केंद्रित नहीं किया। यही कारण है कि स्वतंत्रता दिवस पर मन हताशा से भरा हुआ है।

भारत के सार्वजनिक और निजी जीवन में अंतर भी कष्टप्रद है। भारतीय घर साफसुथरे और ऊर्जा से भरे हैं जबकि सरकारी कार्यालय अस्तव्यस्त, लापरवाह और आलसी हैं। अगर ये भी घर होते तो कुछ ऐसा परिदृश्य होता-बेडरूम में गंदे बरतन पड़े होते, पुराने जूते और अखबार रसोईघर की शोभा बढ़ा रहे होते और हर कोई चाय की चुस्कियां ले रहा होता। दोनों में यह अंतर जिम्मेदारी के एहसास का है। भारतीय घरों में जिम्मेदारी से काम होता है। अगर आप काम नहीं करोगे तो खाने को नहीं मिलेगा। यह जवाबदेही हमारे सार्वजनिक जीवन से विलुप्त हो गई है। भ्रष्टाचार रोग का लक्षण मात्र है। इसीलिए भारतीयों का विश्वास है कि वे बिना राष्ट्र और इस विद्वेषी टिप्पणी के बावजूद आगे बढ़ रहे हैं कि भारत रात को बढ़ता है।

इस कारण मैं लोकपाल बिल को लेकर उत्साहित नहीं हूं। लोकपाल बिल के प्रति अपने लगाव को लेकर सिविल सोसाइटी आंदोलन विद्यमान संस्थानों में जवाबदेही की तात्कालिक आवश्यकता पर ध्यान नहीं दे रहा है। लोकपाल के मुकाबले नौकरशाही, न्यायपालिका, पुलिस और राजनीतिक तंत्र में सुधार से भ्रष्टाचार पर अधिक अंकुश लगेगा। उदाहरण के लिए, ईमानदार और पारदर्शी कर संग्रही तंत्र भारत का अधिक भला करेगा। इसी प्रकार न्यायपालिका में सुधार की तात्कालिक आवश्यकता है। इसके तहत मामलों की त्वरित सुनवाई और निचली न्यायपालिका में जजों व वकीलों के गठजोड़ को तोड़ने से कानून-व्यवस्था में सुधार आएगा। फिर भी, लोकपाल आंदोलन से कुछ तो अच्छा निकलेगा और इसके लिए हमें आंदोलनकारियों का आभारी होना चाहिए। पर अंतत: हम कानून का शासन चाहते हैं न कि व्यक्तियों का शासन और हमारी उम्मीद उन शासकों पर टिकी है, जो कानून के शासन के प्रति जवाबदेह हों।

हां, पिछले कुछ समय से भारत की विकास गाथा पर काले बदरा मंडरा रहे हैं-बेलगाम महंगाई, विदेशी निवेश में गिरावट, विदेशों में मंदी का प्रकोप का भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव और लाचार सरकार। किंतु ये अस्थायी बादल हैं और अगर सरकार अब भी चेत जाती है तो भारत फिर से विकास के पथ पर दौड़ सकता है। आज हालात डांवाडोल हैं। प्रधानमंत्री के पास कोई शक्ति नहीं है। भारत अनेक समस्याओं से घिरा है किंतु महान नेतृत्व के लिए यही समय कुछ कर दिखाने का होता है। अगर मनमोहन सिंह आगे बढ़कर सरकार का नेतृत्व करें तो इस हार को जीत में बदला जा सकता है। अतीत में वह ऐसा कर चुके हैं। एक बार नहीं, बल्कि दो बार उन्होंने देश को संकट से उबारा है। 1991 में जब देश दीवालिया होने के कगार पर था, उन्होंने आर्थिक सुधार लागू कर तीव्र विकास का मार्ग प्रशस्त किया था। पुन: 2008 में उन्होंने परमाणु करार के माध्यम से राष्ट्र के अमेरिका के साथ सामरिक संबंधों को प्रगाढ़ किया। वह जानते हैं कि किस तरह जीता जाता है।

प्रधानमंत्री को पता होना चाहिए कि सुधार केवल घोषणा करने से ही लागू नहीं हो जाते। महान नेता नीतियों की घोषणा मात्र से संतुष्ट नहीं हो जाते, बल्कि वे बिगड़े हुए तंत्र के भीतर घुसकर गंदगी को साफ करते हैं, रोजाना के प्रदर्शन की निगरानी करते हैं, बाधाएं दूर करते हैं और कार्यपालिका को प्रोत्साहित करते हैं। वे स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करते हैं और इन्हें क्रियान्वित करने के लिए छोटी-छोटी टीमें बनाते हैं ताकि तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। प्रधानमंत्री आज हारे हुए जरूर नजर आ रहे हैं किंतु वह कल जरूर जीतेंगे। यही संसार का नियम है।

भारत इसलिए सफलता प्राप्त कर रहा है क्योंकि इसके नागरिक आत्मनिर्भर, महत्वाकांक्षी, मेहनती और जोखिम उठाने वाले हैं। ये विशेषताएं आर्थिक वृद्धि की उत्प्रेरक हैं। हम तभी कल्याणकारी राष्ट्र में बदल सकते हैं, जब सरकार इस मानव पूंजी के आधार पर तमाम नागरिकों को अच्छे स्कूल, अस्पताल और सुशासन उपलब्ध कराए। भारत का आर्थिक उदय जाहिर तौर पर देश के 1.2 अरब लोगों के लिए खुशखबरी है, किंतु साथ ही यह सबक भी है कि खुला समाज, मुक्त व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ संबंधों का विस्तार स्थायी संपन्नता का मार्ग हैं।

-गुरचरन दासGurcharan Das

गुरचरण दास