म्यांमार और चीन में लोकतंत्र आवश्यक

म्यांमार की लोकतंत्र समर्थक नेता और सालों से राजनैतिक बंदी रही औंग सान सू ची की हाल ही में हुई रिहाई मानवाधिकार की एक बड़ी जीत है. पिछले 15 सालों  से नज़रबंद रही 65 वर्षीय सू ची ने पूरा जीवन म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के लिए लगा दिया. ख़ुशी की बात ये रही कि उनकी रिहाई म्यांमार में पिछले दो दशकों में पहली बार हुए लोकतांत्रिक चुनाव के ठीक एक हफ्ते बाद की  गई. म्यांमार के सैन्य शासकों से अन्य राजनैतिक बंदियों को रिहा करने की अपील की गयी है जिस से लोकतांत्रिक मूल्यों को और अधिक बल मिलेगा.

नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त नेता सू ची ने रिहा होने के बाद सरकार को गिराने की कोई मांग तो नहीं रखी है पर उनका कहना है कि देश में अभी भी बहुत बदलाव आना बाकी है. सू ची के वकीलों का कहना है कि सौभाग्यवश सरकार ने सू ची को रिहा करने के बदले देश में घूमने-फिरने या राजनीति करने पर रोक जैसी कोई शर्त नहीं लगाई है. सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी से अलग हुए एक धड़े के नेता खिन मांउग स्वे ने कहा है कि सू ची की रिहाई बर्मा में सभी लोकतांत्रिक गुटों के लिए उत्साह बढ़ाने वाली ख़बर है.

इसी तरह विश्व में लोकतंत्र की ताकत को और बढ़ावा तब मिला जब कुछ समय पहले चीन के लोकतंत्र समर्थक आन्दोलनकारी लिऊ ज़ीऔबो को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया. ज़ीऔबो चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकार को समाप्त कर लोकतान्त्रिक सुधारों की एक लम्बे समय से मांग कर रहे हैं. 54 वर्षीय ज़ीऔबो एक लेखक, आलोचक और प्रोफ़ेसर भी हैं. पिछले साल चीनी सरकार ने उन्हे राज्य विरोधी कार्यकलापों के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. नोबेल पुरस्कार मिलने के साथ ही ज़ीऔबो की रिहाई की मांग पूरे विश्व में गूंजने लगी है. चीनी सरकार ने नोबेल शांति पुरस्कार समिति का घोर विरोध किया है और नोर्वे से अपने सम्बन्ध तक समाप्त करने की धमकी दे डाली पर समिति ने राजनैतिक आन्दोलनकारियों, खासतौर पर लोकतंत्र समर्थक लोगों को पुरस्कार देने की अपनी मुहीम जारी रखी है.

नोबेल समिति ने कहा कि जेल में रह कर पुरस्कार पाने वाले ज़ीऔबो पहले व्यक्ति हैं. ऐसे अन्य विजेता या तो नज़र बंद थे या फिर पुरस्कार पाने के पहले जेल में बंद थे. नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अन्य राजनैतिक आन्दोलनकारियों में जर्मन नेता कार्ल वोन ओसिएत्ज़्की (1935 ), सोवियत नेता आंद्रेई साखारोव (1975 ), पोलिश नेता लेच वालेसा (1983 ) और म्यांमारी लोकतंत्र समर्थक नेता औंग सान सू ची (1991 ) शामिल हैं. नोबेल समिति ने ज़ीऔबो के शांतिवादी दृष्टिकोण की प्रशंसा की और चीनी नेताओं के विरोध के बाद भी अपने निर्णय पर अडिग रही.

औंग सान सू ची की रिहाई और लिऊ ज़ीऔबो का नोबेल पुरस्कार जीतना लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों की तरफ बढे बहुत अच्छे कदम हैं. लोकतंत्र किसी भी देश में जनता की ताकत बढ़ाता है, मानवीय मूल्यों को मजबूती देता है और एक बुरी सरकार को हटा कर अच्छी सरकार चुनने का ज़रूरी विकल्प देता है. तानाशाहों को कभी अच्छा नहीं लगेगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था आये और उनसे उनकी ताकत छीन ले पर असली आज़ादी तो एक आम नागरिक को शक्ति प्रदान करने में है. जिन देशों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था बहाल नहीं हो सकी है, वो सही मायने में आज भी आज़ाद नहीं हैं.

-स्निग्धा द्विवेदी