पूंजीवाद से पहले लोकतंत्र

भ्रष्टाचार की दुर्गंध बहुत तेजी से फैलती है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की बेटी कनिमोझी पर सीबीआई द्वारा जल्द ही केस दायर करने की खबर के साथ ही लगता है कि अब शिकंजा कसा जाने लगा है। डीएमके की पीआर मशीन 13 अप्रैल को तमिलनाडु में होने वाले चुनाव से पहले ‘ईमानदार झूठ’ का प्रसार करने के लिए कमर कस चुकी है।

डीएमके और एआईएडीएमके दोनों को तकरीबन एक तिहाई मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है। डीएमके की जूनियर पार्टनर कांग्रेस का नियंत्रण लगभग 12 से 15 फीसदी वोटों पर है और एआईएडीएमके के सहयोगी विजयकांत की मुट्ठी में लगभग 9 फीसदी वोट हैं। एआईएडीएमके को एंटी इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का फायदा हो सकता है, लेकिन मुकाबला नजदीकी होगा और पूरी संभावना है कि तमिलनाडु में गठबंधन सरकार बने। लेकिन हमारे लिए यह चिंतनीय होना चाहिए कि राजनीतिक नैतिकता को चुनौती देने के लिए भ्रष्टाचार का एक अन्य स्वरूप तेजी से उभर रहा है और बहुत संभव है कि वह उत्तरप्रदेश जैसे अन्य राज्यों को एक वायरस की तरह अपनी चपेट में ले ले।

डीएमके को यह भरोसा है कि उसने पिछला चुनाव मुफ्त रंगीन टीवी के वादे के आधार पर जीता था। वादा करना एक बात है और उसे निभाना दूसरी, लेकिन डीएमके सरकार ने वाकई लाखों लोगों को टीवी बांटे। इन टीवी सेटों ने न केवल गरीबों के घर की शोभा बढ़ाई, बल्कि वे मध्यवर्गीय घरों में भी शोभायमान हुए, क्योंकि वितरण का मानदंड था प्राप्तकर्ता का राशनकार्डधारी होना। ये टीवी सेट पार्टी फंड नहीं, बल्कि सरकारी खजाने के पैसे से बांटे गए थे। आगामी चुनाव में मतदाताओं को केबल कनेक्शन, पंखे, मिक्सर, ग्राइंडर, वॉशिंग मशीन, लैपटॉप कंप्यूटर, प्रतिमाह २क् किलो चावल, निर्धन वधू के मंगलसूत्र के लिए चार ग्राम सोना वगैरह दिए जाने के वादे किए गए हैं। इन घोषणाओं से तमिलनाडु के करदाता आक्रोशित हैं, लेकिन कनिमोझी कहती हैं, ‘लोगों को उनकी जरूरत की चीजें देने में आखिर क्या हर्ज है?’

तमिल बुद्धिजीवियों को फिक्र है कि इस तरह की ‘मुफ्तखोरी’ तमिलनाडु की कार्य संस्कृति को नुकसान पहुंचा सकती है। इसके बावजूद लोग यही पूछ रहे हैं कि इसके बाद क्या? अब तमिल राजनेता हर व्यक्ति को लाख रुपए नगद देने का प्रस्ताव रखेंगे?

ऐसा नहीं कि तमिलों के मन में ईमानदारी और शुचिता के लिए कोई निष्ठा नहीं है। लेकिन एक सिनिकल रूप से वे यह भी मानते हैं कि राजनीति अंतत: ‘ईमानदार झूठ’ की कला है। वे धृतराष्ट्र का उदाहरण देते हैं, जिसने पाखंड और भाई-भतीजावाद की बुनियाद पर अपना साम्राज्य खड़ा किया था। चेन्नई हस्तिनापुर से अलग नहीं है और तमिल मतदाता कहते हैं कि ईमानदार झूठे राजनेताओं को खुले तौर पर घूस देने से उन्हें कोई परहेज नहीं है। मुफ्त टीवी मिलने पर वे यह कहने से भी नहीं चूकते कि कहीं इसका कोई संबंध इससे तो नहीं कि डीएमके एक महत्वपूर्ण तमिल टीवी चैनल की मालिक है।

रोमन साम्राज्य के राजनेताओं ने गरीबों के वोट हासिल करने के लिए सस्ता भोजन और मनोरंजन प्रदान करने की योजना बनाई थी। उन्होंने इस योजना को ‘ब्रेड एंड सर्कसेस’ नाम दिया। पंजाब के राजनेताओं ने भी पूरे एक दशक तक किसानों को मुफ्त बिजली और पानी दिया और इससे न केवल पंजाब की वित्तीय स्थिति गड़बड़ा गई, बल्कि किसानों द्वारा ओवर पंपिंग किए जाने से मिट्टी को भी नुकसान पहुंचा। तमिलनाडु में मुफ्त टीवी और मिक्सर बांटने का विचार नैतिक रूप से परेशान करने वाला है। चुनाव आयुक्त ने यह कहते हुए असमर्थता व्यक्त की है कि मुफ्त उपहार वितरित करना केवल चुनाव से पहले ही गैरकानूनी है। सड़कों, पार्को, स्कूलों जैसी सार्वजनिक महत्व की चीजों पर सरकार द्वारा पैसा खर्च करने को हममें से अधिकतर लोग बुरा नहीं मानते, लेकिन टीवी जैसी निजी महत्व की चीजों के लिए सरकारी खजाना खाली कर देना दुखद है। स्कूलों और पब्लिक लाइब्रेरियों को कंप्यूटर देना जायज है, लेकिन समाज के एक वर्ग को मुफ्त लैपटॉप देना कतई जायज नहीं।

समस्या यहां से पैदा होती है कि भारत ने पूंजीवाद से भी पहले लोकतंत्र को अपना लिया था। भारत 1950 में पूर्णत: लोकतांत्रिक राष्ट्र बन गया था, लेकिन वर्ष 1991 तक उसने मुक्त अर्थव्यवस्था के लिए अपने दरवाजे नहीं खोले थे। इस रोचक ऐतिहासिक क्रम का अर्थ यह है कि दायित्वों और बाध्यताओं के बारे में जानने से पहले हम अधिकारों और विशेषाधिकारों के बारे में जान चुके थे। बाजार में उपभोग से पहले उत्पादन करना पड़ता है। टीवी खरीदने से पहले काम करके वेतन अर्जित करना पड़ता है। एक उपभोक्ता के रूप में हम प्रतिस्पर्धी का उत्पाद खरीदकर खराब उत्पादन करने वालों को दंडित करते हैं। एक कर्मचारी नौकरी बदलकर खराब नियोक्ता को सबक सिखा सकता है। इसी तरह चुनावों को प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति में विश्वसनीयता बढ़ाने का कार्य करना चाहिए। मतदाता को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली पार्टी को वोट देना चाहिए। लेकिन तमिल मतदाता उस पार्टी को वोट देंगे, जो उसे घूस के तौर पर मिक्सर भेंट करेगी। चूंकि लोकतंत्र पूंजीवाद से पहले आ गया था, इसलिए हमारे राजनेताओं की यह प्रवृत्ति बन गई कि नौकरियां सृजित करने से पहले ‘लोककल्याणकारी वस्तुओं’ का वितरण करें।

यह विडंबना है कि तमिलनाडु जैसे उच्च शिक्षित, संपन्न और सुप्रबंधित राज्य में यह भ्रष्ट आचरण हो रहा है। तमिलनाडु में अच्छे प्रशासनिक ढांचे की एक लंबी परंपरा रही है, चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो। तमिलनाडु में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का फूड राशन बाकायदा दुकानों पर पहुंचता है और मनरेगा वेतन का वितरण पात्रों को ही किया जाता है। यह राज्य ऑटोमोबाइल निर्माण का हब है और सूचना तकनीक के क्षेत्र में बेंगलुरू के बाद दूसरे स्थान पर है। लेकिन मुफ्त में टीवी बांटने का अर्थ है भविष्य में सड़कों, बंदरगाहों और स्कूलों के लिए कम राशि का निवेश और निवेश के बिना विकास की गति धीमी पड़ जाएगी। यह तमिलनाडु के लिए नुकसान का सौदा साबित होगा।

-गुरचरन दास

गुरचरण दास