मांग और आपूर्ति को संतुलित करे सरकार

देश में कमर तोड़ महंगाई ने सब का जीना मुश्किल कर दिया है. खाने की चीजों के दाम में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने मिल कर आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है. भारत में मुद्रास्फीति यानी महंगाई की दर दिसंबर के अंत में 18.32 फीसदी दर्ज की गई है जो कि  वर्ष 2010 में सबसे अधिक थी.

बताया जाता है कि चीनी, दाल, तेल और सब्जियों की महंगाई के लिये इनकी बढ़ती मांग और कम पड़ती आपूर्ति एक बड़ी वजह है. खाद्य पदार्थों की महंगाई को गंभीर चिंता का विषय है बताते हुए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उम्मीद जताई है कि मांग और आपूर्ति दुरुस्त करने के लिए सरकार ने जो कदम उठाए हैं, उनसे स्थिति में सुधार होगा.

प्याज के दामो में बढ़ोतरी से सबसे अधिक बवाल मचा हुआ है. साठ रुपये किलो की दर पर पहुंचे प्याज ने लोगो की आँख में आंसू ला दिए. अपने प्रयासों के चलते, अधिकारियों ने प्याज पर से आयात शुल्क हटा दिया, उन के निर्यात पर रोक लगाई और सरकारी वितरण केन्द्रों पर सस्ती दरो पर प्याज उपलब्ध कराने की कोशिश करी. पर इन सभी प्रयासों से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकेगा. 

समस्या कुछ ज्यादा बड़ी है. भारत में खाद्य उत्पादक (किसान) ज़मीन सम्बन्धी नियमो, पुरातन खुदरा नेटवर्क और खराब आधारभूत ढांचे (खासतौर पर सड़क नेटवर्क) की वजह से उपभोक्ताओं की बढी हुई मांग को पूरा करने में खुद को असमर्थ महसूस करते हैं. इस पूरे खेल में सबसे संदिग्ध भूमिका बिचौलियों की रहती है जो किसानो का मुआवजा काट कर, खुद काफी पैसा बनाते हैं. हमारे कोल्ड स्टोरेज भी इतने अच्छे नहीं हैं कि खाद्य पदार्थों को अधिक समय तक बचा पायें और अगर बचा पाते हैं तो सरकारी नाकामी की वजह से कई बार चीज़ें कोल्ड स्टोरेजों में सड़ तक जाती हैं. दूसरी तरफ ये भी माना जा रहा है कि बढती हुई अर्थव्यवस्था के साथ लोगों की आय पिछले कुछ सालो में कई गुना बढ़ी है और इसी के साथ उनकी मांग में भी बढ़ोत्तरी हुई है. पर आपूर्ति व्यवस्था दुर्भाग्यवश इस बढती हुई मांग के साथ कदम नहीं मिला पायी है और इसलिए भी महंगाई में तेज़ी आई है.

उद्योग चेम्बर फिक्की ने महंगाई पर काबू करने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं जिन में प्रमुख है जल्दी खराब होने वाली और बागवानी सम्बंधित वस्तुओं को विशेष दर्जा दिया जाए और बागवानी सम्बंधित वस्तुओं को APMC एक्ट में अधिसूचित चीजों की लिस्ट से हटा लिया जाए.

चेम्बर ने ये भी सुझाव दिया कि रीटेल में एफ डी आई (सीधा विदेशी निवेश) को तभी अनुमति मिलनी चाहिए जब ये शर्त रखी जाये कि संगठित रीटेल चेनें सीधे किसानो से उनके उत्पाद खरीदेंगी और उनको बेहतर तकनीक आदि का ज्ञान देकर उनकी गुणवत्ता बढाने में सहयोग करेंगी. ये एक बहुत महत्त्वपूर्ण सुझाव है जिसे सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए. निश्चित ही इस महंगाई का सम्बन्ध आपूर्ति सम्बन्धी दिक्कतों से है. विभिन्न राज्यों में काम करने वाली APMC किसी भी मार्केट में जारी होने वाले लाइसेंसों को नियंत्रित करती है और इसी के साथ वो कम्पटीशन को आगे नहीं बढ़ने देती और बिचौलियों की ताकत बढती जाती है. इसी वजह से किसी विशेष वस्तु की आपूर्ति कम होने की स्थिति में, उसकी कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ जाती हैं. और इन के पीछे बिचौलियों और चालाक व्यापारियों का हाथ होता है.

सरकार को चाहिए कि वो APMC एक्ट में ज़रूरी संशोधन कर के किसानो के विश्वास को जीते और मांग-आपूर्ति की स्थिति का समाधान करे.

- स्निग्धा द्विवेदी