तेलंगाना और पृथक राज्यो की मांग

श्री कृष्णा आयोग रिपोर्ट आने के बाद पृथक तेलंगाना राज्य की मांग एक बार फिर गरमा गयी है. जस्टिस श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में फरवरी, 2010 में गठित पांच सदस्यीय समिति ने तेलंगाना समस्या के समाधान के लिए सरकार के सामने कई रास्ते खोले हैं, जिस मे प्रमुख सलाह है आंतरिक सुरक्षा और विकास की दृष्टि से आंध्र प्रदेश को ज्यों का त्यों एक संगठित राज्य के रूप मे बनाए रखा जाए.

श्रीकृष्णा कमेटी की इस रिपोर्ट के सुझावों को शुरूआती दौर में कई तेलंगाना समर्थक संगठनों ने रद्द कर दिया है. अलग-अलग संगठनों और पार्टियों की ओर से तेलंगाना के कई इलाकों में बंद और धरने-प्रदर्शन किए गये और हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में उपद्रव शुरू हो गया. विभिन्न राजनीतिक पार्टियां पहले ही अपनी विरोध प्रकट कर चुकी हैं. तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की मांग है कि केंद्र सरकार बजट सत्र में एक विधेयक पेश कर अलग तेलंगाना राज्य बनाने का मार्ग प्रशस्त करे, भले श्रीकृष्ण कमेटी की सिफारिशें कुछ भी हों.

आज़ाद भारत में 1956 में जब आंध्र प्रदेश राज्य की स्थापना की गई तो तीन अलग-अलग क्षेत्रों में रायलसीमा, आंध्र के तटीय प्रदेश के साथ तेलंगाना को भी आंध्र प्रदेश के साथ मिला दिया गया. आंध्र प्रदेश के गठन के बाद तेलंगाना तुलनात्मक रूप से आंध्र के तटीय क्षेत्रों के मुकाबले काफी पिछड़ा रहा. चालीस के दशक में वासुपुनैया ने अलग तेलंगाना की मांग की थी. उसके बाद 1969 से अलग तेलंगाना का आंदोलन शुरु हुआ जो अब तक जारी है. सन 1990 से टीआरएस के. चंद्रशेखर राव तेलंगाना की मांग बार-बार उठाते आ रहे हैं.

कांग्रेस ने 1922 में ही भाषावार प्रांतों के सिद्धांत को मंजूरी दी. साल 1953 में केन्द्र सरकार द्वारा गठित ”राज्य पुनर्गठन आयोग” को भाषायी आधार पर राज्य बनाने का एक नया फार्मूला दे दिया. जवाहर लाल नेहरू भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध करते रहे थे लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामालू की मद्रास से आंध्र प्रदेश को अलग किए जाने की मांग को लेकर 58 दिन के आमरण अनशन के बाद मौत और संयुक्त मद्रास में कम्युनिस्ट पार्टियों के बढ़ते वर्चस्व ने उन्हें अलग तेलुगू भाषी राज्य बनाने पर मजबूर कर दिया था.

तेलंगाना मुद्दे को एक सामूहिक राष्ट्रीय परिक्षेप्य में देखना चाहिए. देश के दूसरे राज्यों से भी समय समय पर छोटे पृथक राज्यों की मांग सुनने में आती रहती है. तेलंगाना के साथ ही, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, पूर्वांचल, विदर्भ, मिथिलांचल आदि की मांग काफी समय से उठती आ रही है और इन्ही मांगो के साथ विभिन्न पार्टियों ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ भी सकी हैं. इन विषयों पर जगह-जगह और बार-बार हिंसक आंदोलनों का सामना भी सरकारों को करना पड़ा है. सवाल ये उठता है कि राज्यों के पुनर्गठन के लिए हमारे देश में क्या आधार है. किसी तय नियमावली के अभाव में लोग भाषाई, आर्थिक, सांस्कृतिक व अन्य दूसरे कारणों को ऊपर रख छोटे राज्य की मांग करते हैं. एक वर्ग है जो ये मानता है कि वर्तमान राज्यों में ही विकास की गाड़ी को तेज़ किया जाए जिस से जनता की समस्याओं का समाधान हो सके और विघटन की मांग ठंडी पड़ जाए. और अगर छोटे राज्य ही समस्या का समाधान होते तो भारत के पूर्वोत्तर राज्य आज सब से अधिक प्रगतिवान और समृद्ध होते.

चूंकि पृथक राज्यों की मांग में कमी होती नहीं दिखती, सरकार को चाहिए कि वो किसी ठोस समाधान को खोजे. इस समाधान में एक ऐसी संस्था की स्थापना हो सकती है जो राज्यों के पुनर्गठन के लिए एक तय नियमावली का निर्माण कर सके. राज्य बनाने के लिए कुछ कड़े नियमो की परिकल्पना की जाए जिनके अंतर्गत ही पूरे देश में कहीं भी विघटन की मांग करी जा सके. और इन नियमो से बाहर पड़ने वाली किसी भी मांग को फौरन  खारिज कर दिया जाए.

- स्निग्धा द्विवेदी