देर तो हुए, दुरूस्त भी हों तो बात बनें..

मोदी सरकारी द्वारा नई शिक्षा नीति के मसौदे को तैयार करने के लिए गठित के. कस्तूरीरंगन कमेटी को हाल ही में चौथा विस्तार प्रदान किया गया है। अब इस कमेटी के पास नई शिक्षा नीति से संबंधित फाइनल ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 15 दिसंबर तक का समय होगा। इसके पूर्व कमेटी को तीसरा कार्य विस्तार 30 अक्टूबर तक के लिए प्रदान किया गया था। मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने सरकार को ‘जीरो ड्रॉफ्ट’ सौंप दिया गया था, लेकिन सरकार की मंशा शायद इसे आम चुनावों तक टालने की ही प्रतीत होती है। खैर..

एक कहावत है कि देर आए, दुरूस्त आए ! शिक्षा नीति तैयार करने में सरकार इतनी देर हुई कि पूरा कार्यकाल समाप्त होने को आ गया लेकिन नई नीति क्या फाइनल ड्रॉफ्ट तक भी न आ सका। शिक्षा जगत को अब बस यही उम्मीद है कि देर तो हुए, दुरूस्त भी हों तो बात बनें..। देश के लगभग 2 लाख से अधिक बजट प्राइवेट स्कूलों ने भी इस कमेटी से बहुत सारी उम्मीदें पाल रखी हैं। यह और बात है कि आरंभिक चरण से कमेटी(यों) ने स्कूलों को ‘ना’उम्मीद ही किया है।

उदाहरण के लिए, बजट स्कूलों को उम्मीद थी कि निजी स्कूलों की लगभग 90% हिस्सेदारी होने के नाते नई शिक्षा नीति के लिए मसौदा तैयार करने के दौरान उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पुरानी (स्मृति ईरानी के कार्यकाल के दौरान गठित) कमेटी के द्वारा तहसील और तालुका स्तर पर रायशुमारी किए जाने की पहल ने भी बजट स्कूलों से उनके सुझाव मांगे जाने की उम्मीद पैदा की लेकिन ऐसा फिर भी नहीं हुआ।

दरअसल, बजट स्कूलों की कुछ अत्यंत ही वाज़िब मांगें हैं जिनपर सरकार को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है जैसे कि मान्यता प्राप्त करने के लिए आवश्यक भौतिक संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) संबंधी मानक। विदित है कि बजट स्कूल सरकार द्वारा प्रतिछात्र प्रतिमाह खर्च की जाने वाले धनराशि से भी कम खर्च में गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने का काम करते हैं। आमतौर पर ये किराए के भवन में संचालित होते हैं और चूंकि इन स्कूलों की फीस इतनी कम होती है कि स्कूल भवन, कक्षाएं, पुस्तकालय, खेल के मैदान आदि के निर्माण के लिए पूंजी जमा ही नहीं हो पाती।

आवश्यक खर्चों जैसे कि वेतन इत्यादि का इंतेजाम कर पाना भी अधिकांश स्कूलों के लिए बड़ी चुनौती होती है। स्कूली शिक्षा का गैरलाभकारी क्षेत्र होने के कारण बैंकों से इन्हें लोन भी प्राप्त नहीं हो पाता। इन स्कूलों पर अधिक भार ने देते हुए यहां पढ़ने वाले छात्रों को सुरक्षा और सुविधा प्रदान करने का एक तरीका सरकार द्वारा स्कूल वित्त निगम (स्कूल फाइनेंस कॉरपोरेशन) की स्थापना करना हो सकता है। यह निगम भौतिक संरचनाएं विकसित करने के लिए बजट स्कूलों को कम ब्याज दर पर लोन उपलब्ध करा सकता है जिससे स्कूल धन जुटाने की चिंता करने की बजाए शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार आधारित पद्धतियां शामिल करने पर ध्यान केंद्रीत कर सकें।

हाल ही में मानव संसाधन एवं विकासमंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सीबीएसई बोर्ड द्वारा लर्निंग आऊटकम के आधार पर स्कूलों को मान्यता दिए जाने जैसे बड़े सुधारात्मक कदम की घोषणा की है। नई शिक्षा नीति में इसे लिखित तौर शामिल करते हुए लर्निंग आऊटकम की जांच के लिए स्कूलों का मूल्यांकन तीसरे पक्ष के द्वारा (थर्ड पार्टी असेसमेंट) कराए जाने का प्रावधान इसे अधिक कारगर बनाएगा।

- संपादक

फोटोः साभार द इंडियन एक्सप्रेस

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