सरकार, समस्या का समाधान नहीं, स्वयं एक समस्या हैः शरद जोशी

वयोवृद्ध किसान नेता व शेतकारी संगठन के संस्थापक शरद जोशी का शनिवार, 12 दिसंबर को निधन हो गया। 2004 से 2010 तक राज्य सभा के सांसद रहे शरद जोशी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उनकी पहचान मझे अर्थशास्त्री, ब्यूरोक्रेट व राजनैतिक दल 'स्वतंत्र भारत पक्ष' के संस्थापक के तौर पर भी होती है। वर्ष 1977 में वे वह स्विटजरलैंड में इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) के काम को छोड़कर भारत लौटे और किसानों के हक की लड़ाई लड़नी शुरू की। शरद जोशी को श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं आर्थिक मामलों के जानकार कुमार आनंद..

 
शेतकरी संगठन के संस्थापक शरद अनंतराव जोशी (3 सितंबर 1935- 12 दिसंबर 2015) का आज तड़के पुणे स्थित उनके निवास स्थान पर निधन हो गया। वह 81 वर्ष के थे।
 
आरंभिक जीवन में वह एक प्रोफेसर और ब्यूरोक्रैट थे किंतु उन्हें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि और आदर उनके द्वारा किसानों के अधिकारों के लिए छेड़ी गई मुहिम के कारण प्राप्त हुई। वे एक ऐसे विरले भारतीय उदारवादी चिंतक थे जिन्होंने वातानुकूलित कमरे की बजाए धरातल पर काम किया।
 
भारत सरकार की नौकरी छोड़कर स्विटजरलैंड से लौटने के बाद उन्होंने खेती का काम शुरू किया। किंतु शीघ्र ही उन्होंने यह जान लिया कि खेती का एक नुकसान वाला का धंधा है। किसान नेता के तौर पर उभरने के पूर्व जिस प्रश्न का हल उन्होंने तलाशना शुरु किया था वह था, 'क्या कारण है कि किसान अपनी लागत निकालने में भी असमर्थ है और गरीबी व कर्ज के तले जीवन जीने को मजबूर है?' पूर्व में अर्थशास्त्र का प्रोफेसर रह चुके होने और खेती के काम का अनुभव हो जाने के कारण उन्होंने इस प्रश्न का जवाब आखिरकार तलाश ही लिया। 
 
उनका निष्कर्ष यह था कि 'ऐसा समाजवाद के कारण है। चूंकि समाजवादी व्यवस्था में सरकारें व्यवसायों और लाभ अर्जित करने वाली फैक्टरियों को चलाती है, वे चाहती हैं कि कृषि से उत्पन्न होने वाला कच्चा माल सस्ता हो और मजदूरों के लिए अनाज भी सस्ता हो। आजादी के बाद से सभी सरकारों की यही नीति रही है।'
 
सरकारों के द्वारा कृषि उत्पादों की कीमतों को जबरन सस्ता रखने की नीति ही किसानों को गरीब और कर्जदार बनाए रखती है। वह कहा करते थे कि कृषि से संबंधित सरकारी नीति यह सुनिश्चित करती है कि भले ही देश में किसान अलग अलग चीजों की बुआई करें लेकिन वे सभी काटें सिर्फ एक चीज, कर्ज।
 
भारतीय किसानों के गम का सर्वश्रेष्ठ जवाब जून 1994 में उनके द्वारा 'द इकोनॉमिक टाइम्स' में प्रकाशित एक लेख में मिलता है, 'कृषि के साथ कोई समस्या नहीं है। जैसा कि मैं हमेशा कहता हूं सरकार किसी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि सरकार स्वयं समस्या है। इसे हमारे पीठ पर से उतार दो, किसान ठीक हो जाएंगे।'
 
किंतु किसानों की समस्या के समाधान के लिए उन्होंने क्या किया?
 
उन्होंने किसानों को अपने उत्पाद का सही मूल्य प्राप्त करने के लिए एकजुट करने के उद्देश्य से सन 1978 में शेतकारी संगठन की स्थापना की। किंतु उनका सबसे बड़ा योगदान किसानों में यह जागरुकता लाना रहा कि गरीबी उनके बुरे कर्मों अथवा किस्मत का परिणाम नहीं बल्कि बुरी सरकारी नीतियों का परिणाम है।
 
सुरेश चंद्र म्हात्रे, जो कि शरद जोशी के अनुसार शेतकारी संगठन के केंद्रीय स्तंभ हैं का कहना है कि, 'जो कुछ जोशी जी कहते हैं, सरकार उसे 25 साल बाद करती है।' मैं किसानों की आर्थिक स्वतंत्रता में विश्वास रखता हूं जो कि अभी तक पूरी नहीं हुई है। शरद जोशी के उदारवादी लेखों और विचारों ने लाखों आम भारतीय महिलाओं और पुरुषों को प्रभावित किया जिन्होंनें सरकारी नीतियों पर प्रश्न खड़े किये और नीतियों की नीयत और परिणाम में फर्क होने के बाबत सवाल पूछे।
 
जोशी जी सदैव अपनी पार्टी 'स्वतंत्र भारत पक्ष' को राजाजी की 'स्वतंत्र पार्टी' का उत्तराधिकारी बताते थे। स्वतंत्रत पार्टी की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर वर्ष 2009 में मुंबई में एक समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा कि, 'पुरानी स्वतंत्र पार्टी के संदर्भ में प्रायः एक वाक्य दोहराया जाता है और मैं भी प्रायः इसका प्रयोग करता हूं कि जो हम भाषण देते हैं वह राजनैतिक तौर पर असंभव है, किंतु हम अपना पताका तबतक फहराते रहेंगे जब तक कि जो चीज राजनैतिक रूप से असंभव है व आर्थिक रूप से अपरिहार्य नहीं हो जाता- यही हमारा दृष्टिकोण होना चाहिए।'
 
ईश्वर शरद जोशी की आत्मा को शांति प्रदान करें