एजुकेशन सेक्टर को फॉर प्रॉफिट करने में ही भलाई है

वह एक जाने माने अर्थशास्त्री हैं, लेकिन अमेरिका के सांटा क्लारा यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर लॉ पढ़ाते हैं। उन्होंने स्वयं किसी विश्वविद्यालय से लॉ और इकोनॉमिक्स की डिग्री हासिल नहीं की है बल्कि हावर्ड से फिजिक्स और केमेस्ट्री की पढ़ाई की है। हालांकि इकोनॉमिक्स और लॉ पर उन्होनें कई किताबें लिखी हैं जो कि दुनियाभर के इकोनॉमिस्ट्स और लॉ एक्सपर्ट्स के बीच काफी लोकप्रिय है। हम बात कर रहे हैं स्वयं को अनार्किस्ट-अनाक्रोनिस्ट इकोनॉमिस्ट कहलाना पसंद करने वाले प्रो. डेविड फ्रीडमैन की। प्रो. फ्रीडमैन नोबेल पुरस्कार विजेता मशहूर अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन व रोज फ्रीडमैन के बेटे भी है। हाल ही में उन्होंने भारत का दौरा किया और दिल्ली, मुंबई और बैंग्लोर में छात्रों के साथ कुछ समय बिताया। प्रस्तुत है आजादी.मी के संपादक अविनाश चंद्र की उनसे हुई बातचीत के कुछ प्रमुख अंशः

 

प्रश्नः आपके पास इकोनॉमक्सि और लॉ की कोई औपचारिक डिग्री नहीं है, फिर भी सांटा क्लारा यूनिवर्सिटी में आप इन विषयों को पढ़ाते हैं। भारत में ऐसा होना संभव नहीं है। आप को क्या लगता है? वह समय कब आएगा जब किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी डिग्रियों से नहीं बल्कि उसकी क्षमता, काबिलियत और अनुभवों के आधार पर होगा?

डेविडः यूनाइटेड स्टेट्स में अधिकांश प्रोफेसर डॉक्टरेट की उपाधि वाले ही होते हैं, लेकिन सभी नहीं। उदाहरण के लिए, कानून के आर्थिक विश्लेषण के प्रतिपादकों में से एक मेरे अंकल, लॉ स्कूल ऑफ यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के प्रोफेसर थे, जबकि वे मात्र अवर स्नातक (अंडरग्रेजुएट) थे। वह यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो से लंबे समय तक जुड़े रहे और ‘जर्नल ऑफ लॉ एंड इकोनॉमिक्स’ पत्रिका के प्रथम संपादक भी रहे। ऐसे कई और उदाहरण हैं। इसप्रकार, औपचारिक डिग्रीविहीन के लिए कॉलेज व यूनिवर्सिटी में पढ़ाना असंभव तो नहीं है पर ये उतना आसान भी नहीं है। हालांकि इसपर कोई कानूनी रोक भी नहीं है।

किसी यूनिवर्सिटी के लिए संबंधित क्षेत्र के किसी अन्य विषय में डॉक्टरेट प्रोफेसर की नियुक्ति उतनी असामान्य घटना नहीं है। इसप्रकार, फीजिक्स अथवा इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट द्वारा मैथमेटिक्स के किसी डॉक्टरेट की नियुक्ति बहुत आश्चर्य जनक नहीं है।

 

प्रश्नः हाल ही में भारत में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज खुलने का प्रचलन शुरु हुआ है। ये प्राइवेट यूनिवर्सिटीज सुविधाएं तो बहुत प्रदान करती हैं लेकिन उनकी फीस भी हद से ज्यादा होती है। आपको क्या लगता है, ऐसे सिस्टम में मेरिट को तरजीह मिलेगी।

डेविडः उम्मीद है कि आने वाले समय में एक से अधिक प्राइवेट यूनिवर्सिटीज/लॉ स्कूल खुलेंगे। यदि ऐसा होता है तो यूनिवर्सिटीज में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कीमतें (फीस) कम होंगी।

भारत भ्रमण के दौरान एक बात मुझे देखने को मिली कि विचारधारा (आइडियोलॉजी) के मामले में भारत भी अन्य समानाधिकारवादी (इगैलिटेरियन) देशों की ही भांति प्रतीत होता है। यहां कीमती वस्तुओं से भरे बड़े बड़े प्रतिष्ठान देखने को मिलते हैं और सड़कों पर सो रहे गरीब भी। मुझे इस बात में संदेह है कि विचारधारा और परिणाम के स्तर पर दोनों एक दूसरे से अविभाजित नहीं है। एक ऐसे समाज में जहां प्रत्येक गतिविधि के लिए आपको सर्टिफिकेट और परमिट की आवश्यकता पड़ती है वहां तरक्की करना अत्यंत मुश्किल कार्य है। ऐसा यूएस में भी होता है, जहां तमाम तरह की बंदिशें होती हैं जिनमें से अधिकांश राज्य और स्थानीय स्तर पर आरोपित (इम्पोज्ड) होती हैं। ‘द इंस्टिट्यूट फॉर जस्टिस’ (आईजे) प्रतिबंध के तमाम मामलों में, जैसे कि किसी व्यवसाय विशेष में प्रवेश के लिए किसे अनुमति मिलनी चाहिए, याचिकाएं (लिटिगेशन) दाखिल करता है। कई बार वह इसमें सफल भी होता है। ऐसे प्रतिबंध उन लोगों के लिए तरक्की की राह को काफी मुश्किल कर देते हैं जिनके पास पैसा नहीं होता है और जिनके कनेक्शन्स नहीं होते हैं। इस प्रकार मुझे आश्चर्य होता है कि वास्तव में भारत सरकार की शासन प्रणाली ही यहां मौजूद भारी गरीबी का कारण है।

 

प्रश्नः भारत में शैक्षणिक संस्थानों को, चाहे वे प्राइमरी हों, सेकेंडरी हों या टेरटियरी, ‘नॉट-फॉर-प्रॉफिट’ होना होता है। शिक्षा को परोपकारी गतिविधि माना जाता है और किसी को लाभ कमाने की अनुमति नहीं है।

डेविडः यदि लोगों के पास शिक्षा प्रदान करने के बेहतर और सस्ते तरीके की जानकारी है और वे जानते हैं कि बेहतर शिक्षा कैसे प्रदान की जा सकती है तो अनुमति (परमिट) मिलने की दशा में लाभ अर्जित करने वाले (फॉर प्रॉफिट) शैक्षणिक संस्थाओं को के पास उसके इस्तेमाल का इंसेंटिव होता है। वैसे तर्क के हिसाब से भोजन, शिक्षा से ज्यादा जरूरी है फिर रेस्टोरेंट व्यवसाय को भी नॉट फॉर प्रॉफिट होना चाहिए। यहां भी समान व्यवस्था क्यों नहीं लागू की जाती?

भूखे लोगों को भोजन कराना एक परोपकारी गतिविधि है। मेरी पत्नी एक चर्च में जाती है जहां आए दिन बेघर और भूखे लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है। किंतु भले ही यह एक तथ्य हो कि भोजन कराना परोपकारी गतिविधि है, किंतु इससे रेस्टोरेंट में या फार्म में भोजन बेचना गैरकानूनी और अपराध तो नहीं हो जाता। यदि लोग परोपकार के तौर पर शिक्षा प्रदान करते हैं तो ठीक है, किंतु जो लोग इसे व्यवसाय की तरह देखते हैं उन्हें ऐसा करने से रोकने का कोई कारण नहीं बनता।

मुझे बताया गया है कि भारत में लोग निजी क्षेत्र की नौकरी की बजाए सरकारी नौकरी को ज्यादा तरजीह देते हैं, क्योंकि वहां टर्म्स कंडीशन निजी क्षेत्र की तुलना में ज्यादा आकर्षित होता है। इसका मतलब ये है कि सरकारी अधिकारी अपनी नौकरी से लाभ अर्जित करते हैं। यदि सरकार को लगता है कि लाभ कमाना बुरा है तो सरकारी कर्मचारियों को अपने वेतन में कटौती स्वीकार करना चाहिए और लाभ की बुराई को दूर करना चाहिए।

 

जारी है..