क्या कन्या भ्रूण हत्या की वजह केवल गरीबी है...कतई नहीं!

 

गर्भ में भ्रूण के लिंग परीक्षण व भ्रूण के कन्या होने की दशा में जन्म लेने से पूर्व ही उसकी हत्या कर देने के कारण देश में पुरूष-महिला लिंगानुपात के बीच की खाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी प्रयासों के बावजूद यह खाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। विश्व स्तर पर हुए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक भारत में प्रति हजार पुरुषों की तुलना में औसतन महिलाओं की संख्या मात्र 940 है। कई राज्यों में तो प्रतिहजार पुरुषों के बनिस्पत महिलाओं की संख्या के बीच 100-120 से ज्यादा का अंतर देखने को मिला है। अर्थात प्रति हजार पुरूषों के मुकाबले मात्र 880 महिलाएं। 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक दमन एवं दीव (618), दादरा एवं नागर हवेली (775), चंडीगढ़ (818) सहित कुछ राज्यों में तो स्थिति भयानक रूप से खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है।

अब सोचने वाली बात यह है कि आखिर कन्या भ्रूण की हत्या होती ही क्यों है?सवाल के जवाब में सरकारी एजेंसियों द्वारा एक मात्र रटा रटाया जवाब यही मिलता है कि गरीबी ही कन्या भ्रूण हत्या का कारण है। चूंकि देश में अब भी दहेज प्रथा जैसी कुरीति का बोलबाला है इसलिए गरीब लड़कियों को बोझ समझते हैं और उसे पैदा होने से पहले ही मार देते हैं। लेकिन क्या यही एक मात्र कारण है जो कन्या भ्रूण हत्या के लिए जिम्मेदार है। इस सवाल का जवाब है ना..। कारण, यदि देश के विभिन्न राज्यों में लिंगानुपात पर दृष्टिपात करें तो यह स्पष्ट होता है कि यह अनुपात संपन्न राज्यों में पिछड़े राज्यों की तुलना में ज्यादा खराब है। इसी प्रकार, गरीब गांवों की तुलना में अमीर (प्रति व्यक्ति आय के आधार पर) शहरों में लड़कियों की संख्या काफी कम है। वैश्विक स्तर पर हुए अध्ययन के मुताबिक भी उन देशों में प्रति हजार लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या काफी कम है जहां हाल के कुछ दशकों के भीतर आर्थिक प्रगति तेजी से हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो गरीब देशों में लड़कों के अपेक्षा लड़कियों की संख्या अमीर देशों की तुलना में कहीं अधिक है। उधर, आर्थिक महाशक्ति बनने का ख्वाब सजाए बैठा भारत लिंग अनुपात के मामले में अपने पड़ोसी देशों व दुनिया के कई बड़े देशों से काफी पीछे है। भारत में हर साल 6 लाख बेटियां पैदा नहीं हो पातीं। देश में 6 साल से कम उम्र के लोगों में लिंग अनुपात महज 914 का है।

अल्टरनेटिव इकोनॉमिक सर्वे के लिए जुटाए गए आंकड़ों में मुताबिक, हर साल ऐसी 6 लाख बच्चियां जन्म नहीं ले पातीं जिन्हें देश के औसत लिंग अनुपात के हिसाब से दुनिया में आना था। 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में प्रति 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं हैं। यह आंकड़ा भी उत्साहवर्धक नहीं है। यूं तो यह सेक्स अनुपात पिछले 20 साल में सबसे बेहतर है लेकिन हमारे पड़ोसी, विकसित या तेजी से विकास कर रहे देशों के मुकाबले बेहद कम है। पड़ोसी देशों की बात करें तो नेपाल में प्रति 1000 पुरुषों पर 1041 महिलाएं हैं। इंडोनेशिया में 1000 पुरुषों पर 1004 महिलाएं व चीन में यह अनुपात 944 का है। पाकिस्तान भी लिंग अनुपात में 938 के आंकड़े के साथ भारत की बराबर पर पहुंच रहा है। स्पष्ट है कि जिन देशों की अर्थव्यवस्था प्रगति कर रही है वहां लड़कियों की संख्या घटती जा रही है।

राष्ट्रीय महिला आयोग और संयुक्त राष्ट्र की पहल पर तैयार रिपोर्ट अंडरस्टिंडिंग जेंडर इक्वेलिटी इन इंडिया 2012 के आंकड़ों के आधार पर भारत के राज्यों में लिंगानुपात की विवेचना करें तो पता चलता है कि दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों में लिंगानुपात की स्थिति पुंडुचेरी, छत्तीसगढ़, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, केरल व उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्यों की तुलना में बेहद खराब है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, चंड़ीगढ़, पंजाब, हरियाणा में प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या क्रमशः 866, 818, 893 व 877 है जो राष्ट्रीय अनुपात 940 की तुलना में कहीं नहीं ठहरता।

दरअसल, गरीबों की तुलना में कन्या भ्रूण हत्या का प्रचलन अमीरों में ज्यादा है। इसकी एक वजह लिंग की पहचान व उसको नष्ट करने की महंगी प्रक्रिया भी है। संभ्रांत परिवार के लोग ही इसका खर्च उठा पाते हैं। ऐसे में संभ्रांत वर्ग में बेटे की चाहत में कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएं ज्यादा हैं और इस वर्ग में बाल लिंग अनुपात कम है। जबकि केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा अलग-अलग चलायी जा रही योजनाओं के तहत कन्या के जन्म, स्कूल जाने व विवाह के दौरान मिलने वाली सहायता राशि के कारण गरीबों में लिंगानुपात अपेक्षाकृत अधिक है। इसी प्रकार ग्रामीण इलाकों में जहां प्रति हजार लड़कियों की संख्या 947 है वहीं शहरी इलाकों में यह संख्या मात्र 926 ही है। तो अब, यह सोच बदलने की जरूरत है कि कन्या भ्रूण हत्या का प्रमुख कारण गरीबी है और गरीबों में यह प्रचलन ज्यादा है।

 

- अविनाश चंद्र