संघर्ष से मिली पहचान अब मिल रहा सम्मान

इस साल जब कमानी ट्यूब की चेयरपर्सन कल्पना सरोज अपना पद्म श्री पुरस्कार राष्ट्रपति से ग्रहण करने जाएंगी तो वह उस अवसर पर हीरों का हार और कांजीवरम साड़ी पहनेंगी। हालांकि इस सम्मान को ग्रहण करने के लिए वह अपने हवाई जहाज से दिल्ली आना चाहती हैं लेकिन खरीद के लिए बातचीत तब तक पूरी होगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता है।  वह पूछती हैं, 'आप क्या सोचते हैं?'  हालांकि उनकी आवाज थोड़ी भारी और गंभीर है लेकिन उनका ठिठोली करने का अंदाज बेहद आकर्षक है।

यह वह महिला हैं, जिनका जन्म महाराष्ट्र के अकोला में बहुत गरीबी में हुआ था। पढ़ाई करने की इच्छा रखने वाली इस लड़की को 12 वर्ष की उम्र में ब्याह दिया गया। लेकिन महज 14 वर्ष की उम्र में वह अपने अत्याचारी ससुराल से तब भाग आई जब वे उन्हें 9वीं से आगे पढ़ाई करने की अनुमति नहीं दे रहे थे।

मुंबई में सिलाई का छोटा-मोटा काम करते हुए उन्होंने 2 रुपये रोजाना पर अपना गुजारा किया। आज उनकी कंपनी का कुल कारोबार 68 करोड़ रुपये है और मुंबई के बलार्ड एस्टेट स्थित कमानी चैंबर्स में उनका दफ्तर है, जो किसी जमाने में कमानी समूह का बोर्डरूम होता था। मुकेश अंबानी के घर से उनका दफ्तर काफी नजदीक है।

अपनी जिंदगी के सबसे मुश्किल दिनों को याद करते हुए वह बताती हैं कि गांव वालों के तानों से बचने के लिए एक बार उन्होंने कीटनाशक पीकर आत्महत्या करने की भी कोशिश की थी। वह कहती हैं, 'मैं अपना ससुराल छोड़कर अपने पिता के घर वापस आ गई क्योंकि मैं बुरा व्यवहार झेलते झेलते थक चुकी थी। लेकिन गांव वालों को लगता था कि गलती मेरी ही थी और यह सब मेरी ही वजह से हुआ है। मैं उन्हें कैसे समझा सकती थी? मेरे पिता एक पुलिस हवलदार थे और हमारे पास कुछ भी नहीं था। ऐसे में जिंदगी कैसे बीतने वाली थी? मैंने खुद से पूछा कि मुझे क्यों जीना चाहिए?' लेकिन वह बच गई और फिर निकल पड़ी खुद को बचाने की यात्रा पर।

सिलाई के काम से उन्होंने अपने कारोबार का विस्तार करने लायक बचत कर ली। उनकी संपत्ति में एक फर्नीचर की दुकान भी जुड़ गई, अपनी बचत से उन्होंने एक जमीन भी खरीदी जिसे उन्होंने बाद में बेच दिया। उनकी जिंदगी में सबसे बड़ा मौका आया विवादित जमीन खरीदने के बाद, जिसे उन्होंने विवादों से निकालने के लिए दृढ़तापूर्वक मुंबई के सरकारी विभागों के कई चक्कर लगाए। उस जमीन पर उन्होंने एक कारोबारी कॉम्प्लेक्स कोहिनूर की शुरुआत इस उम्मीद में की कि शायद एक दिन वह दुनिया के इस सबसे कीमती हीरे जैसा कुछ खरीद पाने में सफल हो सकेंगी।

इस बीच उनकी नजर कुर्ला स्थित कमानी ट्यूब बेचने के लिए दिए गए आईडीबीआई के विज्ञापन पर पड़ी। इस कंपनी की शुरुआत एक गुजराती परिवार ने की थी, जिसकी तुलना किसी जमाने में टाटा और बिड़ला से की जाती थी। तांबा-अयस्क के ट्यूब और पाइप बनाने के लिए डिजाइन किए गए इस संयंत्र को 1985 में बंद कर दिया गया था लेकिन 1988 में उच्चतम न्यायालय के एक आदेश के बाद इसे दोबारा खोला गया और इसके परिचालन की जिम्मेदारी मजदूरों के सहकारी संगठन को सौंप दी गई। लेकिन मजदूर भी इसे नहीं चला सके और 1995 में यह बिकने के कगार पर आ गई। यहां तक कि बीआईएफआर ने उसे लेकर हाथ खड़े कर दिए। 2005 में कुछ मजदूर उनके पास आए और उनसे कंपनी का अधिग्रहण करने की गुजारिश की। उनमें से ज्यादातर दलित थे। वह बताती हैं, 'हालात इतने खराब थे कि उन्हें कई महीनों से वेतन भी नहीं मिला था। कुछ लोगों के पास तो खाने और दवा खरीदने तक के लिए भी पैसे नहीं थे। मुझे उन लोगों के लिए कुछ करने की जरूरत महसूस हुई।' वह आईडीबीआई गईं और बैंक सरोज को कंपनी का अध्यक्ष बनाने को राजी हो गया। उन्होंने तुरंत काम संभाल कर कंपनी के रोजाना परिचालन पर नजर रखनी शुरू कर दी। वह कंपनी के कामकाज के बारे में जितना ज्यादा जानती उतनी ही उनकी हताशा भी बढ़ती जाती।

वह बताती हैं, 'कंपनी के पास कोई परिसंपत्ति नहीं थी। जिस जमीन पर वह संयंत्र खड़ा था वह भी किराये की थी। इस इमारत में सरकारी किरायेदार थे जो हर महीने 25 पैसे, 50 पैसे किराया दिया करते थे। इसलिए अपनी उधारी हासिल करने तक कोई भी कंपनी को हाथ नहीं लगाना चाहता था। हमारे पास संयंत्र की मशीनरी की सुरक्षा करने की खातिर सुरक्षाकर्मी रखने के लिए पैसे भी नहीं थे।  मजदूर अपने भोजन का इंतजाम करने के लिए मशीनरी की चोरी कर उसे कबाड़ के तौर पर बेच रहे थे।'

सरोज की प्राथमिकता कामगारों और देनदारों का विश्वास हासिल करना था। इसके बाद शुरू हुआ कठिन परिश्रम का दौर, जिसमें सरोज ने दफ्तरों के चक्कर लगाए और महज एक मौका देने के लिए गुहार लगाई। उस समय मिली मदद को वह कृतज्ञता के साथ स्वीकार करती हैं। उनके लिए सबसे अच्छा दिन वह था, जब उन्होंने कंपनी का सारा कर्ज चुकता कर दिया था। पिछले साल अखबारों में खबर आई थी सरोज ने कंपनी के पूर्व मालिक, जो अब करीब 80 वर्ष के हो चुके हैं, नवीनभाई कमानी से मुलाकात की। सरोज ने उन्हें 51 लाख रुपये का चेक सौंपा, जिसमें उनका भविष्य निधि और अन्य बकाया शामिल थे। यह रकम उन्हें केटीएल के पुनर्गठन के तहत दी गई थी।

उन्होंने बताया, 'नवीनभाई की वित्तीय हालत बेहद खराब थी और मुझे लगा इस पैसे से उन्हें काफी मदद मिली।' केटीएल के खातों में इस साल कुछ मुनाफा भी देखने को मिल सकता है। जल एवं सफाई क्षेत्र में कॉपर ट्यूब की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कमानी ब्रांड पश्चिमी एशिया के कुवैत में अल कमानी और दुबई में कल्पना सरोज एलएलसी के जरिये कारोबार कर रहा है।

सरोज की बेटी लंदन से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रही है और उनका बेटा अमेरिका में पायलट बनने का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा है। उनकी योजना महाराष्ट्र में विमानन अकादमी स्थापित करने की है क्योंकि भारत में दलित बच्चों के लिए ज्यादा अवसर मौजूद नहीं हैं।

कल्पना सरोज जैसी उद्यमी ने ही 100 करोड़ रुपये की कंपनी फॉच्र्यून कंस्ट्रक्शन के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक मिलिंद कांबले जैसे उद्यमियों को प्रेरणा देकर दलित उद्यमियों को एक अलग पहचान दी है। एक छोटे से ठेकेदार के तौर पर अपना कारोबारी जीवन शुरू करने वाले कांबले को मिली सफलता ने उन्हें देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए पे्ररित किया। और इस तरह दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (डिक्की) की शुरुआत हुई।

कांबले कहते हैं, 'मेरे सामने दो बड़े सवाल थे- भारतीय कारोबारियों को फिक्की और सीआईआई जैसे संगठनों की जरूरत क्यों है? मैंने देखा कि नेताओं, सरकारी नीतियों को प्रभावित कर अपने हितों की रक्षा करने में भारतीय कारोबारी घराने पूरी तरह सक्षम हैं। मुझे मेरा जवाब मिल गया। प्रभाव बढ़ाने के लिए लोगों का एक समूह काफी ज्यादा असरदार साबित होता है। मेरे दिमाग में अगला खयाल यह था कि दलितों को भी इस रास्ते पर आगे क्यों नहीं बढऩा चाहिए। कारोबार जैसे मसलों से दूर तक कोई ताल्लुक न रखने वाले और भारत के सामाजिक परिदृश्य से हमेशा बाहर रहे दलितों को तो ऐसे संगठनों की जरूरत भारतीय कारोबारियों से भी ज्यादा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अगर दलित अलग-अलग क्षेत्रों में संगठन बना सकते हैं राजनीतिक दलों से लेकर राजनीति तक अगर दलित अपनी पहुंच बढ़ा सकते हैं तो कारोबार में क्यों नहीं?' फिक्की और सीआईआई जैसे संस्थानों के एकाधिकार को खत्म करने में डिक्की का गठन किया गया। हाल ही में योजना आयोग की देख रेख में डिक्की ने 100 करोड़ रुपये की पूंजीगत सहायता से एक उद्यम पूंजी फंड की शुरुआत की। डिक्की ने अपना पहला बड़ा समारोह मुंबई के ताजमहल होटल में किया जहां नामी गिरामी लोगों को आमंत्रित किया था। डिक्की के सलाहकार चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि सिर्फ पूंजीवाद ही दलितों को बचा सकता है। हालांकि सभी लोग इस बात से इत्तफाक नहीं रखेंगे लेकिन प्रसाद ने कहा कि दलितों को याद रखना चाहिए कि वे कहां से आए हैं। भयानक गरीबी और कष्टï में गुजारे अपने बचपन के दिनों की अपनी दास्तां को वह खुद बताते हैं। वह कहते हैं, '10 साल से भी कम उम्र में मैं चूहे पकडऩे वाले लोगों के समूह में शामिल हो गया था। परंपरा के मुताबिक जो लोग चूहे मारते थे उन्हें ही चूहे खाने का हक था। चूंकि मैं उस वक्त चूहे मारने के लिए काफी छोटा था इसलिए अपनी दावेदारी को पुख्ता करने के लिए मैं उन लोगों के साथ रहा करता था। इसके बाद मुझे खाने के लिए चूहे का थोड़ा सा मांस खाने को मिलता था, अक्सर यह कोई छोटा चूहा होता था।'

वह आगे बताते हैं, 'मैदान में रहने वाले चूहे दलितों के लिए प्रोटीन का एक स्रोत हुआ करते थे। हालांकि हम चूहों का शिकार प्रोटीन के लिए नहीं करते थे। हम तीन मौसम का इंतजार करते थे, जिसमें अप्रैल में गेहूं की फसल कटाई, अक्टूबर में धान की कटाई और जून की आखिर में पहली बारिश के वक्त चूहे पकडऩा काफी आसान होता है। फसलों के वक्त चूहे पकडऩे के दो तरीके थे, हम जमीन खोद दिया करते थे या फिर चूहों की बिलों को पानी से भर देते थे। हम जमीन खोदने के उपकरण और बाल्टियां साथ लेकर चलते थे। जब जमीन सूखी होती थी मसलन अप्रैल में तब चूहों के लिए सांस लेना मुश्किल करने के लिए हम उनके बिलों में पानी भर दिया करते थे। पास के तालाब से लाए गए पानी से बिलों के भर जाने के बाद चूहे  बाहर आते थे। उनके आने के पहले ही बाहर आने की आहट मिल जाती थी। पानी के ऊपरी तल पर उथल-पुथल शुरू हो जाती थी और हम सांस रोककर उनका इंतजार करते थे। जैसे ही एक चूहा बाहर आता वैसे ही या तो उसे हाथ से पकड़े जाते थे या फिर भागना शुरू कर देते थे। अपने हाथों में डंडे लेकर हम उनका पीछा किया करते थे। पकड़े गए चूहों को मैदान में पकाया जाता था और नमक के साथ उन्हें वहीं खाया जाता था। एक बार उच्च जाति से ताल्लुक रखने वाले मेरे एक दोस्त ने पूछा था अब तुम्हारी आर्थिक स्थिति पहले से काफी बेहतर हो चुकी है तो तुम अब भी चूहे या सूअर का मांस क्यों खाते हो?  मैं सोचता हूं कि काश मैंने उनसे पूछा होता कि मुझे तुम्हारे घर पर होने वाले सार्वजनिक भोजों में अलग बैठने के लिए क्यों कहा जाता है जबकि मैं तुम्हारे ही जितने अच्छे कपड़े पहनता हूं?'

- आदिति फडणीस
हिंदी बिजनेस स्टैंडर्ड से साभार