सरकारी खर्चे पर जरूरी लगाम

सरकार महंगाई पर काबू पाना चाहती है, इसलिए आरबीआइ ने ब्याज दर में वृद्धि की है. इसके पीछे यह सोच है कि ब्याज दर में वृद्धि के कारण कंपनियां कम कर्ज लेंगी और निवेश कम करेंगी. इससे बाजार में सीमेंट, स्टील और श्रम की मांग घटेगी. मांग घटने से महंगाई नियंत्रण में आयेगी. सरकार की इस पॉलिसी से महंगाई पर कुछ नियंत्रण अवश्य होगा, परंतु महंगाई की मूल समस्या का समाधान नहीं होगा. महंगाई का पहला कारण सरकारी खर्चे में वृद्धि है. पिछले दो वर्षो में वैश्विक मंदी से अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए सरकार ने खर्चो में वृद्धि की थी. इससे महंगाई बढ़ रही है. अब इस वृद्धि को वापस लेने की जरूरत है.

लेकिन, ऐसा करने से अर्थव्यवस्था की चाल मंद पड़ सकती है. सरकारी खर्चो में कटौती करते हुए गति को बनाये रखना बड़ी चुनौती है. सरकारी खर्चो की गुणवत्ता में सुधार लाना, इसका उपाय है. रिसाव बंद हो जाये, तो कटौती का दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा. रिजर्व बैंक ने हाल में चेताया है कि सरकार का राजस्व घाटा खतरे के निशान के ऊपर पहुंच गया है.

पिछले वर्षो की चाल अच्छी रहने के कारण राजस्व अधिक मिला है. स्पेक्ट्रम की बिक्री से भी एक मुश्त अच्छी रकम मिली है. इस आय का उपयोग सरकार ने कर्मियों को बढ़ाकर वेतन देने तथा अन्य प्रशासनिक खर्चो में वृद्धि के लिए किया है. लॉटरी खुलने पर लोग कभी-कभी एयरकंडिशनर जैसे उपकरण लगाकर दीर्घकालीन खर्च बढ़ा लेते हैं. लेकिन समय क्रम में एयरकंडिशनर सफ़ेद हाथी साबित होता है. आय कम और खर्च ज्यादा होने लगता है. ऐसा ही सरकारी खर्चो के संबंध में हो रहा है. यह भी गलतफ़हमी है कि राजस्व खर्च अनुत्पादक होते हैं. न्याय, पुलिस एवं प्रशासन चुस्त होने से अर्थव्यवस्था को गति मिलती है.

जरूरत है कि राजस्व खर्च कम किये जायें परंतु प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त की जाये. सरकारी कर्मियों के वेतन एवं सुविधायें बढ़ाने से प्रशासन चुस्त नहीं होगा. ऊंची तनख्वाह वाले कर्मियों में भ्रष्टाचार की भूख भी बढ़ रही है. आवश्यकता सरकारी कर्मियों की कार्य कुशलता बढ़ाने की है. यही बात वित्तीय घाटे पर भी लागू होती है.

वित्तीय घाटे में राजस्व एवं पूंजी घाटे दोनों सम्मिलित होते हैं. अत राजस्व खर्च में कटौती करने से कुल खर्च स्वयं ही कम हो जाता है. साथ-साथ महंगाई भी काबू में आ जाती है. परंतु राजस्व खर्च में कटौती करना बहुत कठिन होता है. सरकारी कर्मियों के वेतन, ब्याज, रक्षा, प्रशासन आदि खर्चो में कटौती नहीं हो पाती है.

मजबूरन सरकार द्वारा पूंजी खर्चो में कटौती की जाती है. आंशिक रूप से इस कटौती की भरपायी प्राइवेट निवेशकों द्वारा हो जाती है. परंतु ग्रामीण क्षेत्रों तथा छोटे शहरों में बुनियादी संरचना में निवेश सरकार को ही करना पड़ेगा. अत वित्तीय घाटे में कटौती करने के लिए सरकारी निवेश में कटौती करना अनुचित होगा. इस समस्या का हल भी निवेश की गुणवत्ता के सुधार में निहित है.

महंगाई का तीसरा कारण ईंधन तेल के बढ़ते वैश्विक मूल्य हैं. तेल से बिजली के दाम में भी वृद्धि होती है. आने वाले समय में तेल के मूल्यों में और वृद्धि होने की संभावना है. अत हमारे सामने एक मात्र विकल्प तेल की खपत को कम करना है.

इसका उपाय है कि तेल पर आयात कर बढ़ाया जाये. इससे तेल महंगा होगा और खपत अपने आप कम हो जायेगी. महंगाई का तीसरा स्त्रोत कृषि उत्पादों के मूल्य में वृद्धि है. इसे कम करने के लिए भारतीय किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिये. सरकार की वर्तमान नीति इसके ठीक विपरीत है. जब वैश्विक मूल्य ऊंचे होते हैं तब किसानों को निर्यात करने से रोक दिया जाता है.

सरकार को भय रहता है कि निर्यात से घरेलू बाजार में माल की कमी हो जायेगी और दाम बढ़ने लगेंगे. जब घरेलू दाम ऊंचे होते हैं और विश्व बाजार में माल सस्ता होता है, तो सरकार आयात करके दामों पर नकेल कसती है. किसान ऊंचे घरेलू मूल्यों का लाभ उठाने से वंचित किया जाता है. ऊंचे मूल्य के अभाव में उत्पादन बढ़ाने का किसान को इंसेंटिव नहीं रह जाता है. यह पॉलिसी तत्काल प्रभावी होती है. यह पॉलिसी भूखे बच्चे को अफ़ीम खिलाकर चुप कराने जैसी है.

सरकार को चाहिए कि देश के कृषि बाजार को विश्व बाजार से जोड़ दे अथवा पूर्णतया विश्व बाजार से अलग कर दे. इन स्थितियों में किसान को कुछ लाभ होगा. महंगाई का चौथा कारण विदेशी निवेश में वृद्धि है. पिछले दो वर्षो में हमारे शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों ने भारी मात्रा में खरीद की है. इस खरीद के लिए विदेशों से बड़ी रकम ने देश में प्रवेश किया है.

अर्थव्यवस्था में दबाव नहीं होगा तो विकास नहीं होगा. फ़िर भी इस आवक से जनित महंगाई को थामने की जरूरत है. इसके लिए आयातों को प्रोत्साहन देना चाहिए. मान लीजिये 100 करोड़ की रकम विदेशी निवेशक लाये. यदि इस 100 करोड़ से फ़र्टीलाइजर, स्टील, कंप्यूटर आदी का अतिरिक्त आयात कर लिया जाये, तो यह रकम बाहर चली जायेगी.

जैसे पंचर रिपेयर करने वाला मिस्त्री टायर से अधिक हवा को धीरे से निकाल देता है उसी प्रकार अर्थव्यवस्था का दबाव कम हो जायेगा अर्थात वित्त मंत्री को आयात करों में कटौती करनी चाहिए. ब्याज बढ़ाकर अर्थव्यवस्था का गला घोंटने के स्थान पर सरकार को उपरोक्त मूल समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए.

- भरत झुनझुनवाला