लोकतांत्रिक मूल्यों पर गाज

शांतिपूर्वक तरीके से चल रहे आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और रैलियों को कुचल देने की परंपराएं इतिहास के कई पन्नों मंआ दर्ज हैं। दरअसल किसी भी लोकतांत्रिक सरकार और हुकूमत के पास विद्रोह को बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं होती। यहीं वजह है कि अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को तमाम सरकारें दबा देती हैं। भ्रष्टाचार और काले धन पर शांतिपूर्वक चल रहे  बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के सत्याग्रह के साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया गया।

एक प्रजातंत्र में किसी भी विचारधारा के व्यक्ति को विरोध करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। रामदेव के आंदोलन को जिस तरह आधी रात को रौंदा गया वे संविधान के खिलाफ है। क्या संविधान के उस पन्ने को फाड़ देना चाहिए जिसमें हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी और विरोध करने का अधिकार दिया गया है।

इस पूरे घटनाक्रम से पहले सरकार ने रामदेव के आंदोलन का विरोध और उसे बदनाम करने की पूरी कोशिशें की। अनशन को खत्म कराने के लिए मीडिया की मौजूदगी में जिस तरह का रवैया अपनाया गया उससे तो यही साबित होता है कि मौजूदा सरकार को किसी का डर नहीं है। पीपुल्स फोर डेमोक्रटिक राइटस् ने भी बाबा रामदेव के शांतिपूर्वक चल रहे आंदोलन के साथ आधी रात को किए गए बर्ताव की आलोचना की है। बाबा रामदेव के आंदालेन का हमारा समर्थन बेशक ना हो लेकिन शांतिपूर्वक आंदोलनों को बेरहमी से कुचले जाने की परपंराएं एक लोकतांत्रिक देश में हिटलरशाही का प्रतीक हैं।

केंद्र सरकार का ये गैर जिम्मेदाराना रवैय्या था। देश के कोने कोने में चल रहे किसान आंदोलन, उत्तर पूर्व में चल रहे आंदोलन, कश्मीर में चले रहे आंदोलन और नर्मदा आंदोलन के साथ तो इससे भी बुरा बर्ताव किया जाता रहा है। इतिहास पर अगर नज़र डाले तो उत्तर से दक्षिण तक और पश्चिम से पूर्व तक अपने अधिकारों की मांगों को लेकर शुरू हुए शांतिपर्वूक आंदोलनों को सरकारें यूं ही कुचलती आयी हैं। जिनमें से कई आंदोलनों ने बेरहमी से कुचले जाने के बाद हिंसक रूप धारण कर लिया। भगत सिंह ने भी कहा था कि बहरी सरकारों के कानों तक आवाज पहुंचाने के लिए एक धमाका जरूरी है।

क्या इस लोकतंत्र को तथाकथित लोकतंत्र कहा जाए। क्या जनतंत्र में हमें विरोध करने का भी अधिकार प्राप्त नहीं है? बाबा रामदेव का आंदोलन दिल्ली के एक कोने में शांतिपूर्वक तरीके से आयोजित किया गया था। सरकार इससे इसलिए घबरा गयी थी कि इसे मिल रहा जनसमर्थन मौजूदा सरकार के खिलाफ था। गुलाम भारत में अंग्रेज भी गांधी जी के इस तरह के आंदोलनों से घबराते थे। हमारी सरकारों ने ऐसे आंदोलनों को दबाने और कुचलने की कला ब्रिटिश हूकुमत से ही सीखी है।

- फ्रेंकलिन निगम